विनोद कुमार शुक्लजी को विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

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सुप्रसिद्ध कवि-कथाकार, साहित्य अकादेमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल जी (1937-2025) को विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

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उनकी सरल भाषा में गहन जीवन दर्शन वाली रचनाएँ, जैसे ‘नौकर की कमीज’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, हमें हमेशा प्रेरणा देती रहेंगी।

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(१)

रात दस मिनट की होती

तो पाँच मिनट में आधी रात हो जाती –

रातें ऐसी ही बीतीं

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दिन दस मिनट का होता

तो पाँच मिनट में आधा दिन बीत जाता –

दिन ऐसे ही बीते

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मै दो दिन की जिंदगी जी सकता हूँ

एक दिन मै तुम्हारे पास रहूँगा

दूसरे दिन तुम मेरे पास रहना

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(२)

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

व्यक्ति को मैं नहीं जानता था

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हताशा को जानता था

इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया

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मैंने हाथ बढ़ाया

मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ

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मुझे वह नहीं जानता था

मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था

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हम दोनों साथ चले

दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे

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साथ चलने को जानते थे।

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(३)

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे

मैं उनसे मिलने

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उनके पास चला जाऊँगा।

एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर

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नदी जैसे लोगों से मिलने

नदी किनारे जाऊँगा

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कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा

पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब

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असंख्य पेड़ खेत

कभी नहीं आएँगे मेरे घर

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खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने

गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।

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जो लगातार काम में लगे हैं

मैं फ़ुरसत से नहीं

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उनसे एक ज़रूरी काम की तरह

मिलता रहूँगा—

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इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह

सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।

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(४)

प्रेम की जगह अनिश्चित है

यहाँ कोई नहीं होगा की जगह भी कोई है।

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आड़ भी ओट में होता है

कि अब कोई नहीं देखेगा

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पर सबके हिस्से का एकांत

और सबके हिस्से की ओट निश्चित है।

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वहाँ बहुत दुपहर में भी

थोड़ी-सा अँधेरा है

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जैसे बदली छाई हो

बल्कि रात हो रही है

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और रात हो गई हो।

बहुत अँधेरे के ज़्यादा अँधेरे में

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प्रेम के सुख में

पलक मूँद लेने का अंधकार है।

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अपने हिस्से की आड़ में

अचानक स्पर्श करते

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उपस्थित हुए

और स्पर्श करते हुए विदा।

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(५)

अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं

और पूरा आकाश देख लेते हैं

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सबके हिस्से का आकाश

पूरा आकाश है।

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अपने हिस्से का चंद्रमा देखते हैं

और पूरा चंद्रमा देख लेते हैं

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सबके हिस्से का चंद्रमा वही पूरा चंद्रमा है।

अपने हिस्से की जैसी-तैसी साँस सब पाते हैं

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वह जो घर के बग़ीचे में बैठा हुआ

अख़बार पढ़ रहा है

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और वह भी जो बदबू और गंदगी के घेरे में ज़िंदा है।

सबके हिस्से की हवा वही हवा नहीं है।

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अपेन हिस्से की भूख के साथ

सब नहीं पाते अपने हिस्से का पूरा भात

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बाज़ार में जो दिख रही है

तंदूर में बनती हुई रोटी

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सबके हिस्से की बनती हुई रोटी नहीं है।

जो सबकी घड़ी में बज रहा है

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वह सबके हिस्से का समय नहीं है।

इस समय।

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(६)

आँख बंद कर लेने से

अंधे की दृष्टि नहीं पाई जा सकती

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जिसके टटोलने की दूरी पर है संपूर्ण

जैसे दृष्टि की दूरी पर।

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अँधेरे में बड़े सवेरे एक खग्रास सूर्य उदय होता है

और अँधेरे में एक गहरा अँधेरे में एक गहरा अँधेरा फैल जाता है

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चाँदनी अधिक काले धब्बे होंगे

चंद्रमा और तारों के।

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टटोलकर ही जाना जा सकता है क्षितिज को

दृष्टि के भ्रम को

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कि वह किस आले में रखा है

यदि वह रखा हुआ है।

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कौन से अँधेरे सींके में

टँगा हुआ रखा है

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कौन से नक्षत्र का अँधेरा।

आँख मूँदकर देखना

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अंधे की तरह देखना नहीं है।

पेड़ की छाया में, व्यस्त सड़क के किनारे

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तरह-तरह की आवाज़ों के बीच

कुर्सी बुनता हुआ एक अंधा

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संसार से सबसे अधिक प्रेम करता है

वह कुछ संसार स्पर्श करता है और

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बहुत संसार स्पर्श करना चाहता है।

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(७)

मैं स्वभाविक मौत तक ज़िंदा रहना चाहता हूं

अगर रोज़ कर्फ्यू के दिन हों
तो कोई अपनी मौत नहीं मरेगा
कोई किसी को मार देगा
पर मैं स्वाभाविक मौत मरने तक
ज़िन्दा रहना चाहता हूँ
दूसरों के मारने तक नहीं
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और रोज़ की तरह अपना शहर
रोज़ घूमना चाहता हूँ
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शहर घूमना मेरी आदत है
ऐसी आदत कि कर्फ्यू के दिन भी
किसी तरह दरवाज़े खटखटा कर
सबके हालचाल पूछूँ
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हो सकता है हत्यारे का
दरवाज़ा भी खटखटाऊँ
अगर वह हिन्दू हुआ
तो अपनी जान
हिन्दू कह कर न बचाऊँ
मुसलमान कहूँ
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अगर मुसलमान हुआ
तो अपनी जान
मुसलमान कह कर न बचाऊँ
हिन्दू कहूँ
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हो सकता है इसके बाद भी
मेरी जान बच जाय
तो मैं दूसरों के मारने तक नहीं
अपने मरने तक जिन्दा रहूँ
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(विनोद कुमार शुक्ल)

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