
मैं जो बोलती हूँ
वह नहीं है मेरी भाषा
क्योंकि वह हो सकती थी किसी और की
जैसे कि कोई और बोल रहा है मेरी भाषा अभी
कहीं किसी दूरदराज के शहर में।
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जन्म के वक़्त
मैं रोई थी किस भाषा में
अब याद नहीं
पर वही थी शायद मेरी भाषा।
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प्रथम रुदन की भाषा से अलग होकर
जीती रही हूँ मैं हमेशा से
पर अब मुझे डर है
अचानक किसी सुबह उठकर
मैं बोलने लगूँगी वह अनजान भाषा
किसी ऐसे देश की
जिसकी भूमि पर
मैंने कभी नहीं रखे हैं पाँव।
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मेरे घर के पालतू पक्षी को
कुछ नए शब्द सिखाते हुए
अक्सर मैं भूल जाती हूँ मेरी अपनी भाषा
और वह अब बोलने लगा है
अपने ही किसी और जन्म की भाषा।
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मेरे घर में बोलता रहता है एक पक्षी
कभी किसी वन्य प्राणी की भाषा
तो कभी किसी समुद्री जीव की भाषा।
मैं सुन रही हूँ
उसका प्रथम रुदन।
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( मनीषा लक्ष्मीकांत जोशी )