
कुछ कपड़े,
कुछ किताबें
और एक झोला भर सामान,
इतना ही तो लेकर चली थी मैं
जब घर से निकली थी।
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पर, स्त्री का घर
सिर्फ दीवारों में कहाँ होता है ?
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वह तो छोड़ आती है
अपनी हँसी रसोई में,
कुछ अधूरे सपने खिड़की पर,
बच्चों के बचपन की खुशबू
किसी पुराने संदूक में,
और अपनी उँगलियों का स्पर्श
हर उस चीज़ पर
जिसे उसने बरसों से सँवारा।
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घर बदलता है,
तो सामान समेट लिया जाता है।
पर यादों को
किस झोले में बाँधूँ?
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बारिश में भीगी हूँ मैं भी,
कई बार भीतर तक,
मगर हर बारिश के बाद
अपने आँचल से
खुद को ही पोंछा है।
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मेरे लिखे शब्द रहेंगे,
मेरी कविताएँ रहेंगी,
मेरी कहानियाँ रहेंगी !?
और शायद
किसी को याद रहेगा
कि इस घर में
एक स्त्री रहती थी
जो चुप रहकर भी
बहुत कुछ कहती थी।
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नया घर होगा,
नई खिड़कियाँ होंगी,
नई दीवारों पर
फिर से टाँग दूँगी
अपना आसमान।
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क्योंकि स्त्री
घर नहीं छोड़ती ,
वह जहाँ जाती है,
वहीं
एक नया घर
अपने भीतर से बना लेती है।
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( नंदिनी शाह )