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माँ पद्मिनी : मनमीत के दस शब्द चित्र
1. रत्नसिंह उसे “पद्मिनी” कह सकता था तोता उसे “पद्मिनी” कह सकता था अलाउद्दीन तक उसे “पद्मिनी” कह सकता था लेकिन स्वरा भास्कर! तुझे उसे “माँ पद्मिनी” कहना चाहिए था! . 2. अलाउद्दीन! पहचान सके तो इन राख की ढेरियों में पहचान.. पद्मिनी की राख कौनसी है? और बाक़ी स्त्रियों की राख कौनसी है? .…
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जिस तट पर-बुद्धिसेन शर्मा
जिस तट पर प्यास बुझाने से अपमान प्यास का होता हो‚ उस तट पर प्यास बुझाने से प्यासा मर जाना बेहतर है। . जब आंधी‚ नाव डुबो देने की अपनी ज़िद पर अड़ जाए‚ हर एक लहर जब नागिन बनकर डसने को फन फैलाए‚ ऐसे में भीख किनारों की मांगना धार से ठीक नहीं‚ पागल…
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जब घर से निकली थी-नंदिनी शाह
कुछ कपड़े, कुछ किताबें और एक झोला भर सामान, इतना ही तो लेकर चली थी मैं जब घर से निकली थी। . पर, स्त्री का घर सिर्फ दीवारों में कहाँ होता है ? . वह तो छोड़ आती है अपनी हँसी रसोई में, कुछ अधूरे सपने खिड़की पर, बच्चों के बचपन की खुशबू किसी पुराने…
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सारे माता-पिता सावधान हो जाए – तत्वज्ञ देवस्य
🙏🙏🙏*अगर आपके शहर या एरिया में CJP या AAP वाले कोई धरना, प्रदर्शन या आंदोलन का ऐलान करे तो सावधान रहे और अपने बच्चों को समझाए। ये लेख उन्हें जरूर पढ़कर सुनाए। सिर्फ उन्हें फॉरवर्ड करके ‘ड्यूटी डन’ का आश्वासन न ले।* 🙏🙏🙏 . अपने बच्चों का फोन चेक कर लें, 400 पाकिस्तानी हैंडल्स मिले…
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वीर सावरकर के नाम-मनमीत सोनी
हे कुल ऋषि सावरकर! सबसे पहले उसका प्रणाम स्वीकार कीजिये जो इस मातृभूमि के लिए अपना लहू बहा देना चाहता था लेकिन आप जैसे ऋषियों के कारण वह कलम की नीली स्याही से लिख रहा है : वन्दे मातरम! — यही सोचता था मैं कि नहीं हो सकता कोई दधीचि इस कलियुग में फिर मैंने…
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सावरकर तुम वीर हो
सावरकर तुम वीर हो,कालापानी के अंधकार में ध्रुव तारे-से प्रज्वलित थे।ज़ंजीरें तुम्हें बाँध न सकीं,अग्निमय हृदय रुकना जानता न था। .सागर की लहरों ने सुना तुम्हारा गीत,मातृभूमि के लिए जीवन था अर्पित।असह्य यातनाएँ, फिर भी शीश न झुका,देशभक्तों के इतिहास में तुम अमर और अक्षय हो। .कारागार की हर दीवार जानती है,कितने स्वप्न तुमने हृदय…
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इन दिनों-सुजाता
अलसाई सी अबोध कच्ची भोरअपनी झक्क सफेद चादर परअचानक सुर्ख रेशमी धब्बा देखअसहज हो उठी थीऔर घबराकर तलाशने लगी थीवो घाव कि जिससे रिसा होगा वो… . ‘ये बिन घाव का रिसाव है,ये न हो तो स्त्री जीवन ही घाव है.’टुकुर टुकुर आँख फाड़ेदेख रही थी तब वो,पुरानी सूती साड़ी फाड़ तह लगातीबेरुखी और घबराहट…
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नज़्म-उमा त्रिलोक
बिन कहे जो कह सको तो कहो बिन पूछे ही, वह बात, बता सको तो बताओ जो किए ही नहीं तुम ने , वह वादे, हो सके तो निभाओ न हो यक़ी मेरा, मेरी बात का, तो चलो आज़मा लो कोई होगी मजबूरी उसकी, यूँ ही सोच, दिल को समझा लो बन गई हूँ पत्थरों…
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कुछ दिन-रश्मि भारद्वाज
कुछ दिन बड़े कठिन होते हैं जब मेरी आँखों में तैर जाते हैं कामना के नीले रेशे लाल रक्त दौड़ता है दिमाग से लेकर पैरों के अँगूठे तक एक अनियन्त्रित ज्वार लावे-सा पिघल-पिघल कर बहता रहता है देह के जमे शिलाखण्ड से मैं उतार कर अपनी केंचुली समा देना चाहती हूँ ख़ुद को सख़्त चट्टानों…
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मैं जो बोलती हूँ-मनीषा लक्ष्मीकांत जोशी
मैं जो बोलती हूँ वह नहीं है मेरी भाषा क्योंकि वह हो सकती थी किसी और की जैसे कि कोई और बोल रहा है मेरी भाषा अभी कहीं किसी दूरदराज के शहर में। . जन्म के वक़्त मैं रोई थी किस भाषा में अब याद नहीं पर वही थी शायद मेरी भाषा। . प्रथम रुदन…
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