-
धीरे बोल-खलील धनतेजवी
एक ने बोला जोर से बोलो,दूजा बोला धीरे बोल, फिर मुजको समझाने आया पूरा टोला धीरे बोल. रात का सन्नाटा केहता है परी उतरने वाली है, हो सकता है यहीं पे उतरे उडनखटोला धीरे बोल. आंधी भी कुछ दूर हवा का भेस बदल कर बैठी है, तू क्या जाने, किस ने पेहना किस का चोला…
-
છું હું શૂન્ય-સાહિલ
છું હું શૂન્ય-શૂન્યની ન્યાતમાં-ન તમારી કોઈ મિસાલ છે, રૂંવેરૂંવે લોહી-લુહાણ હું-ને તમારું હોવું ગુલાલ છે. હું અને વીતેલા સમયની વચ્ચે ફરક લગારે નથી મળ્યો, હુંય પણ અધૂરો ખયાલ છું-એય પણ અધૂરો ખયાલ છે. રહ્યા જીવજીને પરમ મુકામે લઈ જવામાં રચ્યા-પચ્યા, તમે જેને શ્વાસ કહો છો એ તો સ્વયં હરિના હમાલ છે. મેં દિવસ ને રાત…
-
ફૂલની ખુશ્બૂ તમે-ખલીલ ધનતેજવી
ફૂલની ખુશ્બૂ તમે, કોયલનો ટહુકો પણ તમે, મખમલી ઝાકળ તમે, સૂરજનો તડકો પણ તમે. સ્મિતની માફક તમે મરકો છો સૌના હોઠ પર, બ્હાવરી આંખોમાં સળવળતો અચંબો પણ તમે. એટલે તો ચાલવાનો થાક વરતાતો નથી, મારી મંજિલ પણ તમે છો, મારો રસ્તો પણ તમે ! કાં તરીને પણ ઊતરું, ક્યાંક હું ડૂબી મરું, મારી હોડી પણ…
-
कभी हंसा के गया-खलील धनतेजवी
कभी हंसा के गया, फिर कभी रुला के गया, गरज कि मुजको वो हर रुख से आजमा के गया. मैं अपने मूंह से बडी बात तो नहीं करता, यहां का जिल्लेइलाही भी घर पे आ के गया. गजब तो ये कि उजालों की सल्तनत वाला, मेरे चिराग से अपना दिया जला के गया. जिसे बुला…
-
यूं भी कब-खलील धनतेजवी
यूं भी कब नींद से नजदीक भी होने देती, तु न होता तो तेरी याद न सोने देती राह में मेरी हर इक मोड पे इक दरिया है कोई तो होती नदी, होंठ भीगोने देती रात बच्चे की तरह दिल ने परेशान किया, नींद आ जाती तो ख्वाबों के खिलोने देती मछलियां घास पर जीने…
-
सोचा क्या है ?-खलील धनतेजवी
आज वो घर, वो गली या वो मुहल्ला क्या है ! तु नहीं है तो तेरे शहेर में रख्खा क्या है ? मैं संवारुंगा किसी रोज यकीनन तुजको, जिन्दगी, तूने मेरे बारे में सोचा क्या है ? गौर से सुनना मुखातिब को मेरी आदत है, आंख चहेरे को भी पढ लेती है लिख्खा क्या है…
-
लम्हें लम्हें पर-चिनु मोदी
लम्हें लम्हें पर तुम्हारा नाम था मैं सफर में इस तरह बदनाम था जूस्तजू थी, जूस्तजू थी, जूस्तजू, तैरती मछली का अब भी काम था मौत को आवाज दे कर भी बुला, अब शिकस्ता जिन्दगी का जाम था बंद दरवाजे पर दस्तक रात-दिन साँस का यह आखरी पैगाम था मैंकदे मैं बैठकर पीते रहे इस…
-
दो कविता-चिनु मोदी
(१) पुराना सा हो गया है यह मकान- अब पहेले सी शान नहीं- बीच बीच में बत्तियां गुल हो जाती है टूटी खिडकीयों से बारिश अंदर आ जाती है परछांईसे भी दीवार बैठ जाने का डर लगता है यह मकान दुरस्त नहीं हो सकता, मालिक ! ईसे जमीनदोस्त करने का हुकम दो वर्ना यह अपनेआप…
-
तोड देती है-खलील धनतेजवी
तोड देती है मशक्कत, काम के अंजाम तक, बोल उठती है बदन की हड्डीयां भी शाम तक ! ऐ हवा, मेरे चिरागों से अदब से बात कर, अब भी शरमिन्दा है मुजसे गर्दिशे-ऐयाम तक. चल बता साकी वो तेरे मयकदे का क्या हुआ ? क्यूं नजर आते नहीं हैं टूटेफूटे जाम तक ! गूंज उठती…
-
चार दीवारों में-खलील धनतेजवी
चार दीवारों में रेह कर तुमने घर देखे नहीं, मैंने अपने घर में छत, दीवारो-दर देखे नहीं. यूं दरख्तों पर नजर पडते ही पागल हो गई, जैसे आंधीने भी पहेले शजर देखे नहीं. क्यूं सुनाते हो उन्हें केहरे-कफस की दास्तां, जिन परिन्दोने अभी तो बालो-पर देखे नहीं. उम्रभर का साथ तो अब सोचना भी है…
-
Home