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उस पार – बृजेश नीरज
सोचता हूँ क्या होगा नीले आकाश के पार . कुछ होगा भी या होगा शून्य . शून्य मन जैसा खाली जीवन सा खोखला आँखों सा सूना या रात जैसा स्याह . कैसा होगा सब कुछ होगी गौरैया वहाँ ? देह पर रेगेंगी चींटियाँ ? . या होगा सब इस पेड की तरह निर्जन और उदास;…
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याद के बादल – आशा पाण्डेय ओझा
फिर घिर आये याद के बादल फिर हरिया उठा पीड का पलाश फिर झरी मन की छत पर गीली-चाँदनी ख्वाबों की हल्की-हल्की बयार ने फिर खोली आज चाहत के दिनों से जोडी हुई सुरभिमय अहसास की वो रंग-बिरंगी शीशियाँ जो दबा रखी है मन की तहों के नीचे सबसे छुपकर मैंने और शायद तुमने भी…
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अपने अंतर में ढालो ! – राहुल देव
मेरे अंतर को अपने अंतर में ढालो हे इतिवृत्तहीन अकल्मष ! मेरे अंतस के दोषों में श्रम प्रसूति स्पर्धा दो बनूँ मैं पूर्ण इकाई जीवन की गूंजे तेरा निनाद उर में हर क्षण विश्वनुराक्त ! तम दूर करो इस मन का अंतर्पथ कंटक शून्य करो हरो विषाद दो आह्लाद मैं बलाक्रांत, भ्रांत, जडमति विमुक्ति, नव्यता,…
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गजल कहनी पडेगी – ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र
गजल कहनी पडेगी झुग्गियों पर कारखानों पर ये फन वरना मिलेगा जल्द रद्दी की दुकानों पर . कलन कहता रहा संभावना सब पर बराबर है, हमेशा बिजलियाँ गिरती रहीं कच्चे मकानों पर . लडाकू जेट उडाये खूब हमने रात दिन लेकिन कभी पहरा लगा पाये न गिद्धों की उडानों पर . सभी का हक है…
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सूरज से… – सौरभ पाण्डेय
ये साँझ सपाट सही ज्यादा अपनी है . तुम जैसी नहीं . इसने तो फिर भी छुआ है भावहीन पडे जल को तरंगित किया है बार-बार जिन्दा रखा है सिन्दूरी आभा के गर्वीले मान को . कितने निर्लिप्त कितने विकल कितने न-जाने-से तुम ! . किसने कहा मुठ्ठियाँ कुछ जीती नहीं ? लगातार रीतते जाने…
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साथ-साथ – डॉ. सूर्या बाली ‘सूरज’
बेघर हुए हैं ख्वाब धमाकों के साथ-साथ बहशत भी जिंदा रहती है साँसों के साथ-साथ . जब रौशनी से दूर हूँ कैसी शिकायतें अब उम्र कट रही है अँधेरों के साथ-साथ . दरिया को कैसे पार करेगा वो एक शख्श जिसने सफर किया है किनारों के साथ-साथ . वीरान शहर हो गया जब से गया…
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Found the secret – Andre Breton
You pretend not to notice I am watching you Marvellously I am no longer sure you know Your idleness fills my eyes with tears A swarm of interpretations surrounds each one of your gestures It is the hunt for honey dew There are rocking-chairs on a deck there are branches that could scratch you in…
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બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે – નીરજ મહેતા
રાતો ગજવામાં મૂકે છે, બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે ક્યાં કાન ધરે કોઈ શું કે’ છે, બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે . બધ્ધા ઉપર તાડૂકે છે, નજરુંનું અમરત ડૂકે છે સમજણની ગાય વસૂકે છે, બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે . કોઈ માટે સન્માન નથી, શું બોલે છે-કૈં ભાન નથી કડવીવખ વાણી થૂંકે છે, બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે .…
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એ જ છે ! – નીરજ મહેતા
આ બધું બનવાનું કારણ એ જ છે ના બને તો પણ અકારણ એ જ છે . ઝેર પણ એ છે ‘ને મારણ એ જ છે રામ તો એ છે જ, રાવણ એ જ છે . માગી લે સઘળું ‘ને આપી દે બધું એ જ દાતા છે ‘ને માગણ એ જ છે . લોહીમાં થાતું જે…
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ઉદ્ધવ ગીત – વીરુ પુરોહિત
તમે કહો છો ઉદ્ધવ ! એવો શ્યામ નથી નિર્દોષ ! છે કોઈ જગમાં એના સરખો કપટકલાનો કોષ ? . કર્યાં બ્હાવરાં અરધી રાતે, પીડા ખૂબ વધારી; અમે હશું નાગણીઓ ‘ને એ મીઠી મહુવરધારી ! વેણુ વજાડી, રાસ રમાડ્યાં, ચૂમી લીધાં મુખ; અમે અહીં વલવલીએ, એને સિહાંસનનું સુખ ? ! . એ પણ દાઝ્યો સમજો, જે…
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