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  • मुहब्ब्त का रिश्ता – आशा पाण्डेय ओझा

    उगते सूरज से लेकर डूबती रात तक बता कोई लम्हा जो खाली रहा हो मेरे दिल में कभी तेरे खयाल से यह कहाँ का न्याय मुहब्ब्त का रिश्ता शुरु तूने किया निभा रही हूँ मैं जितनी परेशानी नहीं तेरे भूल जाने की आदत से उतनी परेशान हूँ जालिम अपनी याद रहने की इस आदत से…

  • मेरी आवश्यकता – बृजेश नीरज

    अब तक संजोए था अपना आकाश और एक धरती  . लेकिन जाने कहाँ से तुम आ गए जीवन में तोडकर सारे मिथक औए वे झरोखे बंद हो गए जहाँ से देखता था आकाश टूट गए वो पैमाने जिनसे नापता था धरती  . तुम्हारे प्रेम में कुछ और विस्तार पा गया मेरा आकाश तुम्हारे स्पर्श ने…

  • મારો નશો – ફરીઉદ્દીન અત્તર

    જે શાંત સૌમ્ય માણસો છે એને મારો નશો કદી નહીં સમજાય એ લોકો કદી મારા કાર્યને સમજી નહીં શકે દુનિયાદારીના માણસો તો દેવળમાં જાય છે તેઓ કદી સમજી નહીં શકે નશાબાજ માણસના હૃદયની ગમગીની જે લોકો ગૌરવ અને અહંકાર પહેરીને ફરે છે એ લોકો કદીયે મારા રહસ્યના પડદાની પાછળ જોઈ નહીં શકે જે લોકો કદી…

  • પ્રભુના મહિમાના સ્વીકારની પ્રાર્થના – ઇયાન્લા વાન્ઝાન્ટ

    વહાલા પ્રભુ, હું સ્વીકારું છું તમે ઉદાત્ત છો, તમે અદ્દભુત છો, આશ્ચર્ય અને વિસ્મયથી ભરેલા છો. પ્રભુ, તમે મને દરેક જગ્યાએ મદદ અને સંરક્ષણ આપવા હંમેશ તત્પર હો છો. દરેક પરિસ્થિતિમાં તમે કેટલા શક્તિશાળી અને સામર્થ્યવાન છો એનો મને પૂરેપૂરો પરિચય થાય છે. તમે ચતુર, કુનેહબાજ છો. તમે સ્વસ્થ મધ્યસ્થી છો, તમે કાબેલ અને નિપુણ…

  • खेल – ईमरोज

    रंगो के साथ खेल हो रहा था कि तू आ गयी अपने रंगो मिला कर खेलने…  . खयालों के खाके तस्वीरें बनने लग गये और जिन्दगी अपने आप कविता और कविता अपने आप जिन्दगी हो कर खयालों के साथ आ मिली…  . ( ईमरोज )

  • तराश ही तराश – ईमरोज

    प्यार के रिश्ते बने बनाए नहीं मिलते जैसे माहिर बुत तराश को पहली नजर में ही अनगढ पत्थर में से संभावना दिख जाती है-मास्टर पीस की मास्टर पीस बनाने के लिए बाकी रह जाती है सिर्फ तराश तराश तराश  . उसी तरह दो इन्सानों को भी पहली नजर में एक दूसरे में संभावना दिख जाती…

  • संपूर्ण औरत – ईमरोज

    चलते चलते एक दिन पूछा था अमृता ने- तुमने कभी वुमैन विद माईंड (woman with mind) पेंट की है ? चलते चलते मैं रुक गया अपने भीतर देखा अपने बाहर देखा जवाब कहीं नहीं था चारों ओर देखा- हर दिशा की और देखा और किया इंतजार पर न कोई आवाज आई, न कहीं से प्रतिउत्तर…

  • उस पार – बृजेश नीरज

    सोचता हूँ क्या होगा नीले आकाश के पार  . कुछ होगा भी या होगा शून्य . शून्य मन जैसा खाली जीवन सा खोखला आँखों सा सूना या रात जैसा स्याह  . कैसा होगा सब कुछ होगी गौरैया वहाँ ? देह पर रेगेंगी चींटियाँ ?  . या होगा सब इस पेड की तरह निर्जन और उदास;…

  • याद के बादल – आशा पाण्डेय ओझा

    फिर घिर आये याद के बादल फिर हरिया उठा पीड का पलाश फिर झरी मन की छत पर गीली-चाँदनी ख्वाबों की हल्की-हल्की बयार ने फिर खोली आज चाहत के दिनों से जोडी हुई सुरभिमय अहसास की वो रंग-बिरंगी शीशियाँ जो दबा रखी है मन की तहों के नीचे सबसे छुपकर मैंने और शायद तुमने भी…

  • अपने अंतर में ढालो ! – राहुल देव

    मेरे अंतर को अपने अंतर में ढालो हे इतिवृत्तहीन अकल्मष ! मेरे अंतस के दोषों में श्रम प्रसूति स्पर्धा दो बनूँ मैं पूर्ण इकाई जीवन की गूंजे तेरा निनाद उर में हर क्षण विश्वनुराक्त ! तम दूर करो इस मन का अंतर्पथ कंटक शून्य करो हरो विषाद दो आह्लाद मैं बलाक्रांत, भ्रांत, जडमति विमुक्ति, नव्यता,…

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