अब के खफा हुआ तो है ईतना खफा भी हो
तू भी हो और तुझमें कोई दूसरा भी हो
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यूँ तो हर बीज की फितरत दरख्त है
खिलते हैं जिसमें फूल वो आबो-हवा भी हो
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आँखें न छीन मेरी नकामें बदलता चल
यूँ हो कि तू करीब भी हो और जुदा भी हो
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रिश्तों के रेगजार में हर सर पे धूप है
हर पाँव में सफर है मगर रास्ता भी हो
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दुनिया के कहने सुनने पे ईंसानियत न छोड
ईंसान है तो साथ में कोई खता भी हो
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( निदा फाजली )
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[ फितरत = प्रकृति, रेगजार = मरुस्थल ]
Nice one.
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दुनियाके कहने सुननेपे ईन्सानीयत ना छॉड..बहोत ही अच्छी गझल नीदा फाज़लीकी..आप जरुर आये और हमारी बहेन नज़मा मरचंटके अशार नीचेकी लिन्कमे पढे..
http://najmamerchant.wordpress.com
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