उसके मन में उतरना-सुमन केशरी

उसके मन में उतरना

मानो कुएँ में उतरना था

सीलन-भरी

अन्धेरी सुरंग में

उसने बड़े निर्विकार ढंग से

अंग से वस्त्र हटा

सलाखों के दाग दिखाए

वैसे ही जैसे कोई

किसी अजनान चित्रकार के

चित्र दिखाता है

बयान करते हुए–

एक दिन दाल में नमक डालना भूल गई

उस दिन के निशान ये हैं

एक बार बिना बताए मायके चली गई

माँ की बड़ी याद आ रही थी

उस दिन के निशान ये वाले हैं

ऐसे कई निशान थे

शरीर के इस या उस हिस्से में

सब निशान दिखा

वो यूँ मुस्कुराई

जैसे उसने तमगे दिखाए हों

किसी की हार के…

स्तब्ध देख

उसने मुझे हौले से छुआ..

जानती हो ?

बेबस की जीत

आँख की कोर में बने बाँध में होती है

बाँध टूटा नहीं कि बेबस हारा

आँसुओं के नमक में सिंझा कर

मैंने यह मुस्कान पकाई है

तब मैंने जाना कि

उसके मन में

उतरना

माने कुएँ में उतरना था

सीलन-भरे

अन्धेरी सुरंग में

जिसके तल में

मीठा जल भरा था..!

.

( सुमन केशरी )

मोल-प्रताप राव कदम

भीमकाय

चकित करने वाली विशालता

बिना प्रयास जहां आप ऊपर जा सकते हैं

नीचे भी।

भरसक कोशिश आपको

बरगलाने, ललचाने की

कि आप जरूरत, पसंद की चीजों के अलावा

गैर-जरूरी चीजों को भी रखें धकियाते ट्राली में।

शहर के बड़े होने का अहसास

जुड़ा इस विशालता से

ज्यादा खाने, बे-जरूरत बे-वजह खाने से भी

जुड़ा है बड़े होने का अहसास।

लादे-लादे इसे

घूम रहे हैं जहां-तहां

देख रहे हैं पुतलों को,

सिर नहीं है जिनके

पहने हैं उन्होंने आकर्षक कपड़े

सब आ-जा रहे हैं ऊपर-नीचे

दूसरे तीसरे चौथे माले

सब बे-फिक्र हैं, मस्त हैं, खरीददार हैं

और बेचने वाले आश्वस्त हैं।

.

( प्रताप राव कदम )

.

|| મોલ ||

મહાકાય

ચકિત કરનારી વિશાળતા

વિના પ્રયાસ જ્યાં તમે

ઉપર જઈ શકો

નીચે પણ

પૂરેપૂરી કોશિષ

તમને ભરમાવવા, લલચાવવાની

જેથી તમે જરૂરિયાત અને પસંદગીની વસ્તુઓ ઉપરાંત

બિનજરૂરી ચીજો પણ મૂકતા જાઓ ટ્રોલીમાં

નગરના વિકાસની અનુભૂતિ

જોડાઈ છે આ વિશાળતા સાથે

વધારે પડતું ખાવા, અનાવશ્યક, અકારણ ખાવા સાથે પણ જોડાયેલ છે આ વિશાળતાનો સંદર્ભ

એ બધું લાદીને જ્યાં જ્યાં ફરો છો

એ બધે જુઓ છો પૂતળાં

જેમને શીર્ષ નથી

પણ એમણે પહેર્યા છે આકર્ષક કપડાં

બધા ભાગમભાગ કરે છે ઉપર નીચે

બીજા – ત્રીજા – ચોથા માળે

બધા બેફિકર

બધા મસ્ત

બધા ગ્રાહક

અને વિક્રેતાને નિરાંત છે..

.

( પ્રતાપ રાવ કદમ, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

रात के साढ़े तीन बजे हैं-शिवांगी गोयल

रात के साढ़े तीन बजे हैं
जाने कैसी सोच में गुम हूँ
कितनी रीलें देख चुकी हूँ
मन फिर भी तो बुझा हुआ है
जीत गई या हार रही हूँ
अब तक कोई खबर नहीं है
अम्मा-बाबा जगे हुए हैं, हैराँ से हैं
भाई मुझसे लिपट गया था
रो उट्‌ठा था
उसके आँसू याद आ रहे
उसकी बेचैनी भी मेरे पोर-पोर में जाग उठी है
सब अन्दर से टूट गया है

.

तुम पूछोगे किसने तोड़ा
एक नाम ले पाऊँगी क्या ?
मेरी आँखें आसमान के उस तारे को देख रही हैं
तुम भी देखो
देखो मेरे नानाजी हैं तारा बनकर
बोल रहे हैं मुझसे लोगों की मत सुनना
उम्र, पढ़ाई, नाम, पदक – सब बेमानी है
लोग कहेंगे चुप रहना, सब सह लेना
लोगों की परिभाषाएँ सब बेमानी है

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दरवाज़े पर खटके से दिल काँप गया है
छुपकर देखा – कोई नहीं है-बेचैनी है
रात अँधेरी, कोई नहीं है, बेचैनी है
नींद कहाँ है?
शायद बिस्तर के नीचे है, झुककर देखें?
डर लगता है – किससे लेकिन?
एक नाम ले पाऊँगी क्या? सख़्त मनाही है

.

डरना हो तो डर सकती हो लेकिन सख़्त मनाही है
न! तुम कोई नाम न लेना!
रोते-रोते मर जाना पर – नाम न लेना
बड़े लोग हैं, बड़े नाम हैं
कल की लड़की – कौन हो तुम?
तुम्हें कौन सुनेगा?

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रात समेटो, नींद उठाओ
ठीक तो हो तुम; ठीक नहीं क्या?
क्या पागलपन रोना-धोना
मुँह पर कस के पट्टी बाँधो
चुप – सो जाओ!

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( शिवांगी गोयल )

मैं फटी जींस नहीं पहनती, लेकिन प्रगतिशील हूँ-पंकज प्रसून

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मैं फटी जींस नहीं पहनती।
क्योंकि मेरी प्रगति
कपड़ों के छेदों से नहीं मापी जाती।
मेरी आज़ादी
घुटनों से झांकती खाल में नहीं है।
वो तो मेरी रीढ़ की उस सीध में है
जो भीड़ की तालियों पर नहीं डगमगाती।

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मेरा नारीत्व
कपड़ों के चिथड़ों में नहीं टंगा,
वो मेरी आवाज़ में बसता है —
जो झूठ को झूठ कहने की हिम्मत रखती है।
मेरा नारीवाद
शरीर की परतें खोलकर वाहवाही पाने में नहीं,
सच बोलने की ताकत में है।

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मुझे दिखावे की आज़ादी नहीं चाहिए।
मेरी आज़ादी वो है
जो अपने घर की देहरी से लेकर
दुनिया की पंचायत तक
अपना सच कह सके।

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हाँ, मैं जींस पहनती हूँ —
वो जींस जो मेरे डीएनए में बुनी है।
वो जींस जिसमें गार्गी की बुद्धि है,
मीराबाई की जिद है,
रानी लक्ष्मीबाई की जंग का साहस है,
कल्पना चावला का आकाश छू लेने का सपना है,
पी.वी. सिंधु की हर स्मैश में गूंजती गरज है,
मेरी कोम की हर मुक्के में भरी असंभव जीत है,
और इसरो की उन बेटियों की वो आग है
जिन्होंने मंगल की ज़मीन पर
भारत का निशान जड़ दिया।

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मेरी प्रगति उस लड़की की तरह है
जो गाँव से शहर आई,
किताबें उठाईं, सपनों की सीढ़ियाँ खुद बनाई।
जो रैम्प पर नहीं चढ़ी,
पर अपनी मेहनत से
ज़िंदगी की ऊँचाईयों पर पहुँची।

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मैं जानती हूँ —
फटी जींस पहनना आसान है।
उससे ज़्यादा मुश्किल है
सोच के छेदों को सीना,
संस्कारों की सिलाई को बचाना।

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अब बाजार में
जींस के छेद बिकते हैं,
आत्मा की सच्चाई नहीं।
दिखावे का गर्व बिकता है,
विचारों की गहराई नहीं।

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अब सवाल ये नहीं कि कपड़े कितने फटे हैं,
सवाल ये है कि सोच कितनी बची है।
सवाल ये नहीं कि घुटने दिखे या छुपे,
सवाल ये है कि हिम्मत कितनी सच्ची है।
सवाल ये नहीं कि तुमने क्या ओढ़ा है,
सवाल ये है कि आँधियों के सामने
तुम कितना अडिग रह सके।

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( पंकज प्रसून, लखनऊ )

आषाढ़, तुमने ये क्या किया ?-भानु प्रताप सिंह

आषाढ़,

तुमने ये क्या किया?

अमलतास के बदन से

पीली मोतियां छीन लीं!

.

ज़मीन पर बिखरी

बारिस की बूंदों में लिपटी

धूल में सनी

ये पीली मोतियां

कितनी बेबस दिख रही हैं

.

मेरे अमलतास !

तुम अपने मौसम में

फिर खिलना

अपने यौवन को फिर पाना

.

आषाढ़ नहीं आ सकता

चैत, बैसाख और जेठ में

वरना तुम्हारे यौवन को देख

मचल जाता

.

फिर नहीं आती

पृथ्वी के हिस्से ये बारिस

.

मेरे अमलतास!

मैंने

तुम्हारी अनगिनत पीली मोतियां

अनगिनत प्रेमी जोड़ों के पास

संभाल के रख दी हैं

.

तुम्हें मिट्टी होते

ये जोड़े नहीं देख सकते

.

( भानु प्रताप सिंह ) 

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था-विनोदकुमार शुक्ल

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

व्यक्ति को मैं नहीं जानता था

.

हताशा को जानता था

ईसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया

.

मैंने हाथ बढाया

मेरा हाथ पकडकर वह खडा हुआ

.

मुझे वह नहीं जानता था

मेरे हाथ बढाने को जानता था

.

हम दोनों साथ चले

दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे

.

साथ चलने को जानते थे

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( विनोदकुमार शुक्ल )

तुम आओ तो जरा बता देना⁣-हेमन्त परिहार

तुम आओ तो जरा बता देना⁣

मैं थोड़ा घर अपना सजा दूंगा⁣

बहुत काँटे चुभते हैं यूँ तो⁣

तन्हाई की इस राह पर मुझे⁣

तुम आओ तो जरा बता देना⁣

मैं कुछ फूल प्रेम के बिछा दूंगा⁣

⁣.

बायीं तरफ से टूटा हुआ है सोफा⁣

जरा दायीं तरफ ही बैठना तुम⁣

मैं चाय बना कर लाऊं तब तक⁣

दीवार पे अपनी तस्वीरें देखना तुम⁣

ऊब लगे तुम्हें तो,बेहिचक जता देना⁣

मैं कोई गीत तुम्हारे लिए गा दूंगा⁣

⁣.

घर के हर कोने में रखी हैं यादें⁣

प्रतीक्षा में पथरा गई हैं अधूरी बातें⁣

उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता छूना तुम⁣

छूना मेरी आँखों के आंसुओं को भी⁣

इंतज़ार में ठोस हुए हृदय को छूकर⁣

पुनः पत्थर से अहिल्या करना तुम⁣

असहज हो मन भीतर तो इशारे से बता देना⁣

मैं दो चेयर बालकनी में लगा दूंगा⁣

⁣.

आ ही जाओ तो जरा ⁣

शाम तक ठहरना तुम⁣

खाना अच्छा बना लेता हूँ अब⁣

चख कर जरूर देखना तुम⁣

मुझे देखना,घड़ी मत देखना तुम⁣

जान बूझ कर बिखराई है मैंने किताबें⁣

अपने हाथों से एक बार समेटना तुम⁣

जाने का हो समय जब⁣

अपना सर मेरे कांधे से बस सटा देना⁣

मैं यह कविता तुम्हें सुना दूंगा।⁣

.

तुम आओ तो जरा बता देना⁣

मैं थोड़ा घर अपना सजा दूंगा⁣।

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⁣.( हेमन्त परिहार )⁣

हर तरफ़ तेज़ आँधियाँ रखना-ध्रुव गुप्त

हर तरफ़ तेज़ आँधियाँ रखना
बीच में मेरा आशियाँ रखना

.

धूप छत पर हो, हवा कमरे में
लॉन में शोख़ तितलियाँ रखना

.

चाँद बरसे तसल्लियों की तरह
घर में दो-चार खिड़कियाँ रखना

.

अपनी दुनिया है दिल-फ़रेब बहुत
एक दिल को कहाँ कहाँ रखना

.

तूम रहोगे, जहाँ ज़मीं है तेरी
मैं जहाँ हूँ, मुझे वहाँ रखना

.

लफ़्ज़ मिल जाएँ तो बयाँ होगा
होंट काँपे तो उँगलियाँ रखना

.

बाँह फैले तो तुम को छू आए
फ़ासला इतना दरमियाँ रखना

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मेरे लफ़्ज़ों में दर्द दे या रब
मेरे मुँह में मेरी जुबाँ रखना

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( ध्रुव गुप्त )

गीत गाते हुए लोग-पार्वती तिर्की

गीत गाते हुए लोग

कभी भीड़ का हिस्सा नहीं हुए

धर्म की ध्वजा उठाए लोगों ने

जब देखा

गीत गाते लोगों को

वे खोजने लगे उनका धर्म

उनकी ध्वजा

अपनी खोज में नाकाम होकर

उन्होंने उन लोगों को जंगली कहा

वे समझ नहीं पाए

कि मनुष्य जंगल का हिस्सा है

जंगली समझे जाने वाले लोगों ने

कभी अपना प्रतिपक्ष नहीं रखा

वे गीत गाते रहे

और कभी भीड़ का हिस्सा नहीं बने।

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( पार्वती तिर्की )

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|| ગીત ગાતા લોકો ||
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ગીત ગાતા લોકો
ક્યારેય ભીડનો હિસ્સો બન્યાં નહીં
ધર્મની ધજાવાળા લોકોએ
જ્યારે જોયાં
ગીત ગાતા લોકોને
એ લોકો શોધવા લાગ્યા એમનો ધર્મ
એમની ધજા
પોતાની શોધમાં નિષ્ફળ ગયા પછી
એમણે એ લોકોને જંગલી કહ્યા
એમને એ સમજાયું નહીં
કે મનુષ્ય જંગલનો જ હિસ્સો છે
જંગલી કહેવાયેલા લોકોએ
ક્યારેય પોતાનો પ્રતિપક્ષ રજૂ ન કર્યો
એ લોકો ગીત ગાતા રહ્યા
અને ક્યારેય ભીડનો હિસ્સો ન બન્યા..
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( પાર્વતી તિર્કી )
– હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી

इक जोड़ा कश्मीर गया था-मन मीत

 

इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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घूम रहे थे घाटी घाटी

तैर रहे थे झील में पंछी

हाथ में पंछी आंख में पंछी

आकाशों के नील में पंछी

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नाव चली थी मद्धिम मद्धिम

और बुलबुले प्रिज्म हुए थे

उन दोनों में प्यार हुआ था

उन दोनों ने हाथ छुए थे

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साजन को पंछी चुग बैठे

बदली से बस सजनी लौटी !

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इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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कहवे से उठती भापों से

दो लोगों ने चित्र बनाया

अनजाने अपने लोगों को

दो लोगों ने मित्र बनाया

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कुल्फी खाई दूध जलेबी

पुचके खाए पानी वाले

उन दोनों का जुर्म यही था

उन दोनों ने सपने पाले

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दिन को लूट गई संध्याएं

लुटी पिटी – सी रजनी लौटी !

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इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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बर्फ़ घाटियां श्वेत वसन की

बुझती थी जब प्यास बदन की

लेकिन कैसा विकट समय है

चाट गईं बंदूक अगन की

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इक मज़हब का राक्षस सपना

लील गया मंदिर के दीये को

भूल गए जो भी साझा था

भूल गए सब लिए दिए को

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सांपों को था दूध पिलाया

हम तक अपनी करनी लौटी !

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इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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दो सांसों का मेला उजड़ा

यह वीरानी किसके सर है?

मेरे घर का कब्ज़ा छोड़ो

ये मेरा पुश्तैनी घर है!

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तुम कश्मीरी धरती छोड़ो

सारा हिंदुस्तान हमारा

अल्लामा इक़बाल को छोड़ो

चीन ओ’ पाकिस्तान हमारा

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गठजोड़े में आग लग गई

बिना अंगूठी मंगनी लौटी !

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इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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( मन मीत )