कभी आ भी जाना-गुलज़ार

कभी आ भी जाना
बस वैसे ही जैसे
परिंदे आते हैं आंगन में
या अचानक आ जाता है
कोई झोंका ठंडी हवा का
जैसे कभी आती है सुगंध
पड़ोसी की रसोई से

.

आना जैसे बच्चा आ जाता
है बगीचे में गेंद लेने
या आती है गिलहरी पूरे
हक़ से मुंडेर पर

..

जब आओ तो दरवाजे
पर घंटी मत बजाना
पुकारना मुझे नाम लेकर
मुझसे समय लेकर भी मत आना
हाँ , अपना समय साथ लाना
फिर दोनों समय को जोड़
बनाएंगे एक झूला
अतीत और भविष्य के बीच
उस झूले पर जब बतियाएंगे
तो शब्द वैसे ही उतरेंगे
जैसे कागज़ पर उतरते हैं
कविता बन

.

और जब लौटो तो थोड़ा
मुझे ले जाना साथ
थोड़ा खुद को छोड़े जाना
फिर वापस आने के लिए
खुद को एक-दूसरे से पाने
के लिए।

.( गुलज़ार )

.

ક્યારેક એવી રીતે પણ આવ
જેમ
પંખી આવે ફળિયામાં
અથવા
જેમ અચાનક આવે
કોઈ ઠંડી હવાની લ્હેરખી
જેમ ક્યારેક આવે
પડોશમાંથી રસોઈની સોડમ

.

આવ એ રીતે
જેમ બાળક દોડતું આવે
બગીચામાં દડો લેવા
અથવા આવે ખિસકોલી
સંપૂર્ણ અધિકારપૂર્વક
ઘરની પાળીએ

.

જ્યારે આવ ત્યારે
દરવાજે બેલ વગાડીશ નહીં
પોકારજે મારું નામ
સમય નક્કી કરીને પણ ન આવીશ
હા
પોતાનો સમય સાથે લાવજે
પછી બંનેનો સમય જોડીને
બનાવીશું એક હિંચકો
અતીત અને ભવિષ્યની વચ્ચે
એ હીંચકા પર બેસી જ્યારે ગપાટા મારીશું
ત્યારે શબ્દો એમ ઉતરી આવશે
જાણે કવિતા

.

અને જ્યારે પાછો ફર
તો થોડોક મને લઈ જજે સાથે
થોડોક સ્વયંને છોડી જજે અહીં
ફરી પાછા ફરવા માટે

.

અને સ્વયંને એકમેક થકી પામવા માટે..

.

( ગુલઝાર )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

असभ्य हूँ-गोविंद माथुर

मैं असभ्य हूँ क्योंकि

औपचारिक गोष्ठियों में बैठकर

सहित्य, कला, संस्कृति पर

बात नहीं करता

मेरे चेहरे से आभिजात्य नहीं टपकता

मैं कहीं से भी

बुद्धिजीवी नहीं लगता

मैं असभ्य हूँ क्योंकि

मैं हिंदी माध्यम स्कूल में पढ़ा हुआ हूँ

मैं औपचारिक होने का नाटक नहीं कर सकता

शिक्षित लोगों में बैठकर

बात-बात में अँग्रेज़ी शब्दों का

उच्चारण नहीं करता

मैं असभ्य हूँ क्योंकि

मैं व्यवहार कुशल नहीं हूँ

मैं व्यक्तियों का उपयोग करना नहीं जानता

संबंधों को भुनाना मुझे नहीं आता

मुझमें प्रभावित करने के

गुण नहीं हैं न ही मैं

उपयोगी प्राणी हूँ

मैं असभ्य हूँ क्योंकि

मैं झूठ नहीं बोलता

किसी को गाली नहीं देता

किसी को हिक़ारत से नहीं देखता

किसी की चापलूसी नहीं करता

मैं असभ्य हूँ क्योंकि

मैं भावुक हूँ संवेदनशील हूँ

मैं ठहाका लगाकर हँसता हूँ

कभी-कभी

लोगों के बीच रो भी देता हूँ

मुझे सभ्य लोगों के

बीच बैठना नहीं आता

क्योंकि मैं असभ्य हूँ

.

( गोविंद माथुर )

.

હું અસભ્ય છું

કેમ કે

ઔપચારિક ગોષ્ઠીઓમાં બેસી

સાહિત્ય, કળા, સંસ્કૃતિ વિષે

ચર્ચા નથી કરતો

મારા ચહેરેથી આભિજાત્ય નથી ટપકતું

હું કોઈ રીતે બુદ્ધિજીવી નથી લાગતો

હું અસભ્ય છું

કેમ કે

હું સ્થાનિક માધ્યમમાં ભણ્યો છું

હું ઔપચારિકતાનું નાટક નથી કરી શકતો

શિક્ષિત લોકો વચ્ચે બેસી

વાતવાતમાં અંગ્રેજી શબ્દોનું ઉચ્ચારણ નથી કરી શકતો

હું અસભ્ય છું

કારણ કે

હું વ્યવહાર કુશળ નથી

મને માણસનો ઉપયોગ કરતાં આવડતું નથી

સંબંધો વટાવતાં આવડતું નથી

મારામાં સામા માણસને પ્રભાવિત કરવાનો ગુણ નથી

ન તો હું ઉપયોગી પ્રાણી છું

હું અસભ્ય છું

કારણ કે

હું જૂઠ બોલતો નથી

કોઈને ગાળ આપતો નથી

કોઈને તિરસ્કારથી જોતો નથી

કોઈની ચાપલુસી કરતો નથી

હું અસભ્ય છું

કારણ કે

હું ભાવુક છું

સંવેદનશીલ છું

મોટેથી હસું છું

ક્યારેક તો લોકો વચ્ચે

રડી પણ લઉં છું

મને સભ્ય લોકો સાથે ફાવતું નથી

કારણ કે

હું અસભ્ય છું…

.

( ગોવિંદ માથુર, – હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

उसके मन में उतरना-सुमन केशरी

उसके मन में उतरना

मानो कुएँ में उतरना था

सीलन-भरी

अन्धेरी सुरंग में

उसने बड़े निर्विकार ढंग से

अंग से वस्त्र हटा

सलाखों के दाग दिखाए

वैसे ही जैसे कोई

किसी अजनान चित्रकार के

चित्र दिखाता है

बयान करते हुए–

एक दिन दाल में नमक डालना भूल गई

उस दिन के निशान ये हैं

एक बार बिना बताए मायके चली गई

माँ की बड़ी याद आ रही थी

उस दिन के निशान ये वाले हैं

ऐसे कई निशान थे

शरीर के इस या उस हिस्से में

सब निशान दिखा

वो यूँ मुस्कुराई

जैसे उसने तमगे दिखाए हों

किसी की हार के…

स्तब्ध देख

उसने मुझे हौले से छुआ..

जानती हो ?

बेबस की जीत

आँख की कोर में बने बाँध में होती है

बाँध टूटा नहीं कि बेबस हारा

आँसुओं के नमक में सिंझा कर

मैंने यह मुस्कान पकाई है

तब मैंने जाना कि

उसके मन में

उतरना

माने कुएँ में उतरना था

सीलन-भरे

अन्धेरी सुरंग में

जिसके तल में

मीठा जल भरा था..!

.

( सुमन केशरी )

मोल-प्रताप राव कदम

भीमकाय

चकित करने वाली विशालता

बिना प्रयास जहां आप ऊपर जा सकते हैं

नीचे भी।

भरसक कोशिश आपको

बरगलाने, ललचाने की

कि आप जरूरत, पसंद की चीजों के अलावा

गैर-जरूरी चीजों को भी रखें धकियाते ट्राली में।

शहर के बड़े होने का अहसास

जुड़ा इस विशालता से

ज्यादा खाने, बे-जरूरत बे-वजह खाने से भी

जुड़ा है बड़े होने का अहसास।

लादे-लादे इसे

घूम रहे हैं जहां-तहां

देख रहे हैं पुतलों को,

सिर नहीं है जिनके

पहने हैं उन्होंने आकर्षक कपड़े

सब आ-जा रहे हैं ऊपर-नीचे

दूसरे तीसरे चौथे माले

सब बे-फिक्र हैं, मस्त हैं, खरीददार हैं

और बेचने वाले आश्वस्त हैं।

.

( प्रताप राव कदम )

.

|| મોલ ||

મહાકાય

ચકિત કરનારી વિશાળતા

વિના પ્રયાસ જ્યાં તમે

ઉપર જઈ શકો

નીચે પણ

પૂરેપૂરી કોશિષ

તમને ભરમાવવા, લલચાવવાની

જેથી તમે જરૂરિયાત અને પસંદગીની વસ્તુઓ ઉપરાંત

બિનજરૂરી ચીજો પણ મૂકતા જાઓ ટ્રોલીમાં

નગરના વિકાસની અનુભૂતિ

જોડાઈ છે આ વિશાળતા સાથે

વધારે પડતું ખાવા, અનાવશ્યક, અકારણ ખાવા સાથે પણ જોડાયેલ છે આ વિશાળતાનો સંદર્ભ

એ બધું લાદીને જ્યાં જ્યાં ફરો છો

એ બધે જુઓ છો પૂતળાં

જેમને શીર્ષ નથી

પણ એમણે પહેર્યા છે આકર્ષક કપડાં

બધા ભાગમભાગ કરે છે ઉપર નીચે

બીજા – ત્રીજા – ચોથા માળે

બધા બેફિકર

બધા મસ્ત

બધા ગ્રાહક

અને વિક્રેતાને નિરાંત છે..

.

( પ્રતાપ રાવ કદમ, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

रात के साढ़े तीन बजे हैं-शिवांगी गोयल

रात के साढ़े तीन बजे हैं
जाने कैसी सोच में गुम हूँ
कितनी रीलें देख चुकी हूँ
मन फिर भी तो बुझा हुआ है
जीत गई या हार रही हूँ
अब तक कोई खबर नहीं है
अम्मा-बाबा जगे हुए हैं, हैराँ से हैं
भाई मुझसे लिपट गया था
रो उट्‌ठा था
उसके आँसू याद आ रहे
उसकी बेचैनी भी मेरे पोर-पोर में जाग उठी है
सब अन्दर से टूट गया है

.

तुम पूछोगे किसने तोड़ा
एक नाम ले पाऊँगी क्या ?
मेरी आँखें आसमान के उस तारे को देख रही हैं
तुम भी देखो
देखो मेरे नानाजी हैं तारा बनकर
बोल रहे हैं मुझसे लोगों की मत सुनना
उम्र, पढ़ाई, नाम, पदक – सब बेमानी है
लोग कहेंगे चुप रहना, सब सह लेना
लोगों की परिभाषाएँ सब बेमानी है

.

दरवाज़े पर खटके से दिल काँप गया है
छुपकर देखा – कोई नहीं है-बेचैनी है
रात अँधेरी, कोई नहीं है, बेचैनी है
नींद कहाँ है?
शायद बिस्तर के नीचे है, झुककर देखें?
डर लगता है – किससे लेकिन?
एक नाम ले पाऊँगी क्या? सख़्त मनाही है

.

डरना हो तो डर सकती हो लेकिन सख़्त मनाही है
न! तुम कोई नाम न लेना!
रोते-रोते मर जाना पर – नाम न लेना
बड़े लोग हैं, बड़े नाम हैं
कल की लड़की – कौन हो तुम?
तुम्हें कौन सुनेगा?

.

रात समेटो, नींद उठाओ
ठीक तो हो तुम; ठीक नहीं क्या?
क्या पागलपन रोना-धोना
मुँह पर कस के पट्टी बाँधो
चुप – सो जाओ!

.

( शिवांगी गोयल )

मैं फटी जींस नहीं पहनती, लेकिन प्रगतिशील हूँ-पंकज प्रसून

.

मैं फटी जींस नहीं पहनती।
क्योंकि मेरी प्रगति
कपड़ों के छेदों से नहीं मापी जाती।
मेरी आज़ादी
घुटनों से झांकती खाल में नहीं है।
वो तो मेरी रीढ़ की उस सीध में है
जो भीड़ की तालियों पर नहीं डगमगाती।

.

मेरा नारीत्व
कपड़ों के चिथड़ों में नहीं टंगा,
वो मेरी आवाज़ में बसता है —
जो झूठ को झूठ कहने की हिम्मत रखती है।
मेरा नारीवाद
शरीर की परतें खोलकर वाहवाही पाने में नहीं,
सच बोलने की ताकत में है।

.

मुझे दिखावे की आज़ादी नहीं चाहिए।
मेरी आज़ादी वो है
जो अपने घर की देहरी से लेकर
दुनिया की पंचायत तक
अपना सच कह सके।

.

हाँ, मैं जींस पहनती हूँ —
वो जींस जो मेरे डीएनए में बुनी है।
वो जींस जिसमें गार्गी की बुद्धि है,
मीराबाई की जिद है,
रानी लक्ष्मीबाई की जंग का साहस है,
कल्पना चावला का आकाश छू लेने का सपना है,
पी.वी. सिंधु की हर स्मैश में गूंजती गरज है,
मेरी कोम की हर मुक्के में भरी असंभव जीत है,
और इसरो की उन बेटियों की वो आग है
जिन्होंने मंगल की ज़मीन पर
भारत का निशान जड़ दिया।

.

मेरी प्रगति उस लड़की की तरह है
जो गाँव से शहर आई,
किताबें उठाईं, सपनों की सीढ़ियाँ खुद बनाई।
जो रैम्प पर नहीं चढ़ी,
पर अपनी मेहनत से
ज़िंदगी की ऊँचाईयों पर पहुँची।

.

मैं जानती हूँ —
फटी जींस पहनना आसान है।
उससे ज़्यादा मुश्किल है
सोच के छेदों को सीना,
संस्कारों की सिलाई को बचाना।

.

अब बाजार में
जींस के छेद बिकते हैं,
आत्मा की सच्चाई नहीं।
दिखावे का गर्व बिकता है,
विचारों की गहराई नहीं।

.

अब सवाल ये नहीं कि कपड़े कितने फटे हैं,
सवाल ये है कि सोच कितनी बची है।
सवाल ये नहीं कि घुटने दिखे या छुपे,
सवाल ये है कि हिम्मत कितनी सच्ची है।
सवाल ये नहीं कि तुमने क्या ओढ़ा है,
सवाल ये है कि आँधियों के सामने
तुम कितना अडिग रह सके।

.

( पंकज प्रसून, लखनऊ )

आषाढ़, तुमने ये क्या किया ?-भानु प्रताप सिंह

आषाढ़,

तुमने ये क्या किया?

अमलतास के बदन से

पीली मोतियां छीन लीं!

.

ज़मीन पर बिखरी

बारिस की बूंदों में लिपटी

धूल में सनी

ये पीली मोतियां

कितनी बेबस दिख रही हैं

.

मेरे अमलतास !

तुम अपने मौसम में

फिर खिलना

अपने यौवन को फिर पाना

.

आषाढ़ नहीं आ सकता

चैत, बैसाख और जेठ में

वरना तुम्हारे यौवन को देख

मचल जाता

.

फिर नहीं आती

पृथ्वी के हिस्से ये बारिस

.

मेरे अमलतास!

मैंने

तुम्हारी अनगिनत पीली मोतियां

अनगिनत प्रेमी जोड़ों के पास

संभाल के रख दी हैं

.

तुम्हें मिट्टी होते

ये जोड़े नहीं देख सकते

.

( भानु प्रताप सिंह ) 

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था-विनोदकुमार शुक्ल

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

व्यक्ति को मैं नहीं जानता था

.

हताशा को जानता था

ईसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया

.

मैंने हाथ बढाया

मेरा हाथ पकडकर वह खडा हुआ

.

मुझे वह नहीं जानता था

मेरे हाथ बढाने को जानता था

.

हम दोनों साथ चले

दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे

.

साथ चलने को जानते थे

.

( विनोदकुमार शुक्ल )

तुम आओ तो जरा बता देना⁣-हेमन्त परिहार

तुम आओ तो जरा बता देना⁣

मैं थोड़ा घर अपना सजा दूंगा⁣

बहुत काँटे चुभते हैं यूँ तो⁣

तन्हाई की इस राह पर मुझे⁣

तुम आओ तो जरा बता देना⁣

मैं कुछ फूल प्रेम के बिछा दूंगा⁣

⁣.

बायीं तरफ से टूटा हुआ है सोफा⁣

जरा दायीं तरफ ही बैठना तुम⁣

मैं चाय बना कर लाऊं तब तक⁣

दीवार पे अपनी तस्वीरें देखना तुम⁣

ऊब लगे तुम्हें तो,बेहिचक जता देना⁣

मैं कोई गीत तुम्हारे लिए गा दूंगा⁣

⁣.

घर के हर कोने में रखी हैं यादें⁣

प्रतीक्षा में पथरा गई हैं अधूरी बातें⁣

उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता छूना तुम⁣

छूना मेरी आँखों के आंसुओं को भी⁣

इंतज़ार में ठोस हुए हृदय को छूकर⁣

पुनः पत्थर से अहिल्या करना तुम⁣

असहज हो मन भीतर तो इशारे से बता देना⁣

मैं दो चेयर बालकनी में लगा दूंगा⁣

⁣.

आ ही जाओ तो जरा ⁣

शाम तक ठहरना तुम⁣

खाना अच्छा बना लेता हूँ अब⁣

चख कर जरूर देखना तुम⁣

मुझे देखना,घड़ी मत देखना तुम⁣

जान बूझ कर बिखराई है मैंने किताबें⁣

अपने हाथों से एक बार समेटना तुम⁣

जाने का हो समय जब⁣

अपना सर मेरे कांधे से बस सटा देना⁣

मैं यह कविता तुम्हें सुना दूंगा।⁣

.

तुम आओ तो जरा बता देना⁣

मैं थोड़ा घर अपना सजा दूंगा⁣।

.

⁣.( हेमन्त परिहार )⁣

हर तरफ़ तेज़ आँधियाँ रखना-ध्रुव गुप्त

हर तरफ़ तेज़ आँधियाँ रखना
बीच में मेरा आशियाँ रखना

.

धूप छत पर हो, हवा कमरे में
लॉन में शोख़ तितलियाँ रखना

.

चाँद बरसे तसल्लियों की तरह
घर में दो-चार खिड़कियाँ रखना

.

अपनी दुनिया है दिल-फ़रेब बहुत
एक दिल को कहाँ कहाँ रखना

.

तूम रहोगे, जहाँ ज़मीं है तेरी
मैं जहाँ हूँ, मुझे वहाँ रखना

.

लफ़्ज़ मिल जाएँ तो बयाँ होगा
होंट काँपे तो उँगलियाँ रखना

.

बाँह फैले तो तुम को छू आए
फ़ासला इतना दरमियाँ रखना

.

मेरे लफ़्ज़ों में दर्द दे या रब
मेरे मुँह में मेरी जुबाँ रखना

.

( ध्रुव गुप्त )