माँ पद्मिनी : मनमीत के दस शब्द चित्र

1.

रत्नसिंह

उसे “पद्मिनी” कह सकता था

तोता

उसे “पद्मिनी” कह सकता था

अलाउद्दीन तक

उसे “पद्मिनी” कह सकता था

लेकिन स्वरा भास्कर!

तुझे उसे “माँ पद्मिनी” कहना चाहिए था!

.

2.

अलाउद्दीन!

पहचान सके

तो इन राख की ढेरियों में पहचान..

पद्मिनी की राख कौनसी है?

और बाक़ी स्त्रियों की राख कौनसी है?

.

3.

पद्मिनी

पानी से नहीं

आग से मुँह धोती थी

उसके होंठों पर

किसी लिपस्टिक का नहीं

बल्कि किसी लाल पत्थर का रंग था

वह रात के काले धागे से

अपना जूड़ा बाँधती थी

सूरज की बिंदिया

दमकती थी उसके माथे पर

चाँद उसका मांगटीका था

सितारे

उसकी पलकों के हिण्डोले में झूलते थे..

हिंजड़ों के साथ सोने वाला अलाउद्दीन –

पद्मिनी नाम की देवी के

पैरों की धूल के लायक़ भी नहीं था!

.

4.

अलाउद्दीन!

तू चित्तौड़ जीत सकता है

तू चित्तौड़ की स्त्रियों को नहीं जीत सकता!

.

5.

भगवान करे

कि पद्मिनी एक कल्पना का ही नाम हो –

इस भारत में

जो कहने को हमारा है –

यह देखा नहीं जाता

कि 1303 में जल चुकी एक औरत को

हर थोड़े बरसों में

फिर से जलाया जाता है!

.

6.

हे ईश्वर!

चिता में राख होऊं

तो माँ पद्मिनी की तरह राख होऊं..

और

शत्रुओं के चेहरों को

काला करने के काम आऊं!

.

7.

रत्नसिंह –

महाराजा था

महाराजा है

महाराजा ही रहेगा!

पद्मिनी –

महारानी थी

महारानी है

महारानी ही रहेगी!

अलाउद्दीन –

ग़ुलाम था

ग़ुलाम है

ग़ुलाम ही रहेगा!

.

8.

राख के घूंघट से

झाँक रही है

माँ पद्मिनी की कहानी

जिन आँखों में

आँसू हैं

और

दिल में दर्द

सिर्फ़ वही देख सकते हैं :

थोड़ा-सा घूंघट उठाकर!

.

9.

ओ मेरी पत्नी!

अगर कभी कोई दुश्मन मुझे जान से मार दे और तुम्हें गुलाम बनाना चाहे तो पद्मिनी की तरह आग में जल जाना मगर अपने बदन को छूने मत देना जिसे सिर्फ़ मैंने छुआ है!

लोग बहुत समझाएँगे

लोग बहुत भड़काएँगे

लेकिन कुछ भी मत समझना

लेकिन बिलकुल मत भड़कना

मरने के बाद

हम दोनों

मेरे दिल की उस आग के फूलों से महकते कमरे में

ज़रूर मिलेंगे –

जो हमारे प्यार की रगड़क से पैदा हुई थी!

ओ मेरी पत्नी!

.

10.

मरने के बाद

अलाउद्दीन

बहत्तर हूरों के पास गया या नहीं गया..

नहीं पता!

लेकिन चित्तौड़ के

उस पद्मिनी महल में

जो एक तालाब के बीचों-बीच बना है

पर्यटकों की दुआएँ

रत्नसिंह को दूल्हा बनाकर

रोज़ अपनी पद्मिनी के पास भेजती हैं…

इतिहास!

होना क्या होता है

और

बनाना क्या होता है…

यह बात कोई राजपूतों से सीखे!

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( मनमीत सोनी )

जिस तट पर-बुद्धिसेन शर्मा

जिस तट पर प्यास बुझाने से

अपमान प्यास का होता हो‚

उस तट पर प्यास बुझाने से

प्यासा मर जाना बेहतर है।

.

जब आंधी‚ नाव डुबो देने की

अपनी ज़िद पर अड़ जाए‚

हर एक लहर जब नागिन बनकर

डसने को फन फैलाए‚

ऐसे में भीख किनारों की

मांगना धार से ठीक नहीं‚

पागल तूफानों को बढ़कर

आवाज लगाना बेहतर है।

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कांटे तो अपनी आदत के

अनुसार नुकीले होते हैं‚

कुछ फूल मगर कांटों से भी

ज्यादा जहरीले होते हैं‚

जिनको माली आंखें मीचे‚

मधु के बदले विष से सींचे‚

ऐसी डाली पर खिलने से

पहले मुरझाना बेहतर है।

.

जो दिया उजाला दे न सके

तम के चरणों का दास रहे

अंधियारी रातोमें सोये

दिन में सूरज के पास रहे

जो केवल धुआं उगलता हो

सूरज पर कालिख मलता हो

ऐसे दीपक का जलने से पहले

बुझ जाना बेहतर है।

.

( बुद्धिसेन शर्मा )

जब घर से निकली थी-नंदिनी शाह

कुछ कपड़े,

कुछ किताबें

और एक झोला भर सामान,

इतना ही तो लेकर चली थी मैं

जब घर से निकली थी।

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पर, स्त्री का घर

सिर्फ दीवारों में कहाँ होता है ?

.

वह तो छोड़ आती है

अपनी हँसी रसोई में,

कुछ अधूरे सपने खिड़की पर,

बच्चों के बचपन की खुशबू

किसी पुराने संदूक में,

और अपनी उँगलियों का स्पर्श

हर उस चीज़ पर

जिसे उसने बरसों से सँवारा।

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घर बदलता है,

तो सामान समेट लिया जाता है।

पर यादों को

किस झोले में बाँधूँ?

.

बारिश में भीगी हूँ मैं भी,

कई बार भीतर तक,

मगर हर बारिश के बाद

अपने आँचल से

खुद को ही पोंछा है।

.

मेरे लिखे शब्द रहेंगे,

मेरी कविताएँ रहेंगी,

मेरी कहानियाँ रहेंगी !?

और शायद

किसी को याद रहेगा

कि इस घर में

एक स्त्री रहती थी

जो चुप रहकर भी

बहुत कुछ कहती थी।

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नया घर होगा,

नई खिड़कियाँ होंगी,

नई दीवारों पर

फिर से टाँग दूँगी

अपना आसमान।

.

क्योंकि स्त्री

घर नहीं छोड़ती ,

वह जहाँ जाती है,

वहीं

एक नया घर

अपने भीतर से बना लेती है।

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( नंदिनी शाह )