सपनों का जीवन-कविता कृष्णपल्लवी

कुछ भी नहीं होता दो बार।

हर घटना अकेली होती है और हर सपना भी।

दो बार वही प्यार नहीं होता।

पुराना प्यार यदि वापस भी लौटे तो वही नहीं रह जाता ।

वही चुम्बन दुहराया नहीं जाता ।

हम जब फिर से पहुँचते हैं किसी पुरानी जगह, वह वही नहीं होती।

हर बार जुदाई अपने ढंग की अकेली होती है ।

हर अलगाव का अपना अलग तरीका और सलीका होता है।

हर नारा नये कंठों से नया होकर उठता है जिस आकाश में

वह गुज़रे दिनों का आकाश नहीं होता

और जो क्रान्ति पुरानी क्रान्तियों से सीखकर डग भरती है ज़मीन पर

वह ज़मीन नयी होती है जो उसे एक नयी शक्ल देती है।

हम जिस देश-काल को जीते हैं वह अगले ही पल इतिहास हो जाता है।

लगातार किसी सपने का पीछा करने में ही जीवन है

धड़कता-थरथराता हुआ अविराम।

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( कविता कृष्णपल्लवी )

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|| સ્વપ્નનું જીવન ||

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કશું પણ બે વાર ન થાય

દરેક ઘટના એકમેવ હોય

અને દરેક સ્વપ્ન પણ

બે વાર એનો એ પ્રેમ ન થાય

જૂનો પ્રેમ જો પાછો ફરે

તો એ એવો જ ન હોય

એક જ ચુંબન દોહરાવી ન શકાય

આપણે જ્યારે ફરી પહોંચીએ કોઈક જૂની જગાએ

એ એની એ ન હોય

દરેક વખતે વિરહ આગવી ઢબનો હોય

દર વખતનો છૂટા પડવાનો તરીકો અને મિજાજ નોખો હોય

દરેક ઉદઘોષ નવા કંઠેથી અભિનવ બની ફેલાય

જે આકાશમાં

એ વીતેલા સમયનું આકાશ નથી હોતું

અને જે ક્રાંતિ પુરાણી ક્રાંતિથી શીખીને ડગ માંડે છે ભૂમિ પર

એ ભૂમિ નવી હોય છે

અને ક્રાંતિને નવું સ્વરૂપ આપે છે

આપણે જે દેશકાળમાં જીવીએ છીએ

એ આગલી જ ક્ષણે ઇતિહાસમાં સમાઈ જાય છે

લગાતાર કોઈક સ્વપ્નનો પીછો કરવો

એ જ જીવન છે

ધબકતું – થરથરતું – અવિરામ..

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( કવિતા કૃષ્ણપલ્લવી, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

इंतज़ार भी अजीब होता है-मालिनी गौतम

इंतज़ार भी अजीब होता है

बिना आहट के दरवाज़े पर बैठा रहता है

न जाने किसके कदमों की आहट में

अपनी धड़कनें गिनता रहता है

सूनी पगडंडी पर उगी घास-सा लहराता है

हवा में झूमते पत्तों-सा

सरसराता है

कुछ दीप अधजले रह जाते हैं

कुछ ख़त अधूरे रह जाते हैं

कुछ बातें होंठों तक आकर ठहर जाती हैं

घड़ी की सुइयाँ चलती रहती हैं

मगर वक़्त वहीं ठहर जाता है

जिसे आना नहीं होता

इंतज़ार उसी का सबसे ज़्यादा होता है।

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( मालिनी गौतम )

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ઇંતેજારી પણ અજબ હોય છે

ચુપચાપ દરવાજે બેસી રહે છે

કોણ જાણે કોનાં પગરવની દિશામાં

પોતાના ધબકારા ગણતી રહે છે.

સૂકી પગદંડી પર ઊગેલા ઘાસની જેમ લહેરાય છે

હવામાં ઝૂમતાં પર્ણોની જેમ

ઝૂમે છે

કોઈ પ્રજ્વલિત દીવા અધૂરાં રહી જાય છે

કોઈ પત્રો અધૂરા રહી જાય છે

કોઈ વાત હોઠોં પર આવીને થીજી જાય છે

ઘડિયાળનાં કાંટા ફરતાં રહે છે

પરંતુ સમય ત્યાં જ થંભી ગયો છે

જેને નથી જ આવવું

તેની જ રાહ સૌથી વધારે જોવાય છે.

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( માલિની ગૌતમ, અનુવાદ : બકુલા ઘાસવાલા )

तुम्हारे बारे में सोचते हुए-विनय सौरभ

एक दिन पाया कि

ऐसा करते हुए कई साल बीत गए हैं

याद करना कुछ ख़ास करने

जैसा नहीं रह गया था

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यह कोई सहायक क्रिया भी नहीं थी

तुम्हें बताना चाहता हूँ

कि वह शहर पूरी तरह बदल गया था

जो हमारी साँसों में बसता था

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सारी चीज़ें हमेशा की

तरह बदल रही थीं

हमारे साथ बैठने की वह जगह भी

जो हम स्मृतियों में छोड़ आए!

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मैंने दरबान से पूछा कि

यहाँ एक गुलमोहर भी हुआ करता था

जवाब में उसने कहा कि

आपको मिलना किससे है?

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साइकिलें नहीं थीं!

वे मुझे बेहद शिद्दत से याद आईं

जो हॉस्टल की बाहरी दीवारों पर टिकी रहती थीं

बहुत तेज़ भागता प्रेम था यहाँ

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और थोड़ा आक्रामक दिखता-सा,

असहजता बीते दिनों का क़िस्सा थी

क्या इत्मीनान से भरे थे हमारे दिन?

क्या हमारी यादों में उन दिनों की आशंकाएँ दर्ज हैं!

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और क्या दुख की इबारतों के क़िस्से भी मिलेंगे वहाँ?

कहाँ जाएँ कि शक्लें

अब बदल चुकी हैं

और अच्छा हुआ कि

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हम अपनी पुरानी डायरियाँ

भी कहीं रखकर भूल गए हैं..

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( विनय सौरभ )

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|| તારા વિષે વિચારતાં ||

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તારા વિષે વિચારતાં

એક દિવસ ખબર પડી

કે એમ કરતાં વર્ષો વીતી ગયાં

એમ કરવામાં કશું ખાસ કરતો હોઉં એવું લાગતું પણ નહોતું

એ કોઈ મદદકારક પ્રક્રિયા પણ નહોતી

તને જણાવવા ઇચ્છું છું

કે એ શહેર પૂરેપૂરું બદલાઈ ગયું હતું

જે આપણા શ્વાસમાં વસતું

બધી ચીજો બદલાઈ રહી હતી

આપણે સાથે બેસતા એ જગા પણ

જે આપણે સ્મૃતિઓમાં છોડી આવ્યા

મેં ચોકીદારને પૂછ્યું કે

અહીં એક ગુલમહોરનું વૃક્ષ પણ હતું

જવાબમાં એણે કહ્યું કે

તમારે મળવું કોને છે ?

સાઈકલો નહોતી !

એ મને તીવ્રતાથી યાદ આવી

એ હોસ્ટેલ બહારની દિવાલના ટેકે પડી રહેતી

ત્યાં પ્રેમ ઝડપથી વિકસતો

અને થોડોક આક્રમક પણ લાગતો

અસહજતા વીતેલા દિવસોનો કિસ્સો હતી

શું નિરાંતના દિવસો હતા એ ?

શું આપણી સ્મૃતિઓમાં

એ દિવસોની આશંકાઓ દર્જ છે ?

અને શું દુઃખની લખાવટના કિસ્સા પણ હશે ત્યાં ?

ક્યાં જઈએ

કે આપણા રૂપરંગ બદલાઈ ચૂક્યા છે હવે

એટલું સારું

કે આપણી જૂની ડાયરીઓ પણ

ક્યાંક મુકાઈને

ભૂલાઈ ચૂકી છે !

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( વિનય સૌરભ, હિન્દી પરથી ભાવાનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

माँ पद्मिनी : मनमीत के दस शब्द चित्र

1.

रत्नसिंह

उसे “पद्मिनी” कह सकता था

तोता

उसे “पद्मिनी” कह सकता था

अलाउद्दीन तक

उसे “पद्मिनी” कह सकता था

लेकिन स्वरा भास्कर!

तुझे उसे “माँ पद्मिनी” कहना चाहिए था!

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2.

अलाउद्दीन!

पहचान सके

तो इन राख की ढेरियों में पहचान..

पद्मिनी की राख कौनसी है?

और बाक़ी स्त्रियों की राख कौनसी है?

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3.

पद्मिनी

पानी से नहीं

आग से मुँह धोती थी

उसके होंठों पर

किसी लिपस्टिक का नहीं

बल्कि किसी लाल पत्थर का रंग था

वह रात के काले धागे से

अपना जूड़ा बाँधती थी

सूरज की बिंदिया

दमकती थी उसके माथे पर

चाँद उसका मांगटीका था

सितारे

उसकी पलकों के हिण्डोले में झूलते थे..

हिंजड़ों के साथ सोने वाला अलाउद्दीन –

पद्मिनी नाम की देवी के

पैरों की धूल के लायक़ भी नहीं था!

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4.

अलाउद्दीन!

तू चित्तौड़ जीत सकता है

तू चित्तौड़ की स्त्रियों को नहीं जीत सकता!

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5.

भगवान करे

कि पद्मिनी एक कल्पना का ही नाम हो –

इस भारत में

जो कहने को हमारा है –

यह देखा नहीं जाता

कि 1303 में जल चुकी एक औरत को

हर थोड़े बरसों में

फिर से जलाया जाता है!

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6.

हे ईश्वर!

चिता में राख होऊं

तो माँ पद्मिनी की तरह राख होऊं..

और

शत्रुओं के चेहरों को

काला करने के काम आऊं!

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7.

रत्नसिंह –

महाराजा था

महाराजा है

महाराजा ही रहेगा!

पद्मिनी –

महारानी थी

महारानी है

महारानी ही रहेगी!

अलाउद्दीन –

ग़ुलाम था

ग़ुलाम है

ग़ुलाम ही रहेगा!

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8.

राख के घूंघट से

झाँक रही है

माँ पद्मिनी की कहानी

जिन आँखों में

आँसू हैं

और

दिल में दर्द

सिर्फ़ वही देख सकते हैं :

थोड़ा-सा घूंघट उठाकर!

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9.

ओ मेरी पत्नी!

अगर कभी कोई दुश्मन मुझे जान से मार दे और तुम्हें गुलाम बनाना चाहे तो पद्मिनी की तरह आग में जल जाना मगर अपने बदन को छूने मत देना जिसे सिर्फ़ मैंने छुआ है!

लोग बहुत समझाएँगे

लोग बहुत भड़काएँगे

लेकिन कुछ भी मत समझना

लेकिन बिलकुल मत भड़कना

मरने के बाद

हम दोनों

मेरे दिल की उस आग के फूलों से महकते कमरे में

ज़रूर मिलेंगे –

जो हमारे प्यार की रगड़क से पैदा हुई थी!

ओ मेरी पत्नी!

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10.

मरने के बाद

अलाउद्दीन

बहत्तर हूरों के पास गया या नहीं गया..

नहीं पता!

लेकिन चित्तौड़ के

उस पद्मिनी महल में

जो एक तालाब के बीचों-बीच बना है

पर्यटकों की दुआएँ

रत्नसिंह को दूल्हा बनाकर

रोज़ अपनी पद्मिनी के पास भेजती हैं…

इतिहास!

होना क्या होता है

और

बनाना क्या होता है…

यह बात कोई राजपूतों से सीखे!

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( मनमीत सोनी )

जिस तट पर-बुद्धिसेन शर्मा

जिस तट पर प्यास बुझाने से

अपमान प्यास का होता हो‚

उस तट पर प्यास बुझाने से

प्यासा मर जाना बेहतर है।

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जब आंधी‚ नाव डुबो देने की

अपनी ज़िद पर अड़ जाए‚

हर एक लहर जब नागिन बनकर

डसने को फन फैलाए‚

ऐसे में भीख किनारों की

मांगना धार से ठीक नहीं‚

पागल तूफानों को बढ़कर

आवाज लगाना बेहतर है।

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कांटे तो अपनी आदत के

अनुसार नुकीले होते हैं‚

कुछ फूल मगर कांटों से भी

ज्यादा जहरीले होते हैं‚

जिनको माली आंखें मीचे‚

मधु के बदले विष से सींचे‚

ऐसी डाली पर खिलने से

पहले मुरझाना बेहतर है।

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जो दिया उजाला दे न सके

तम के चरणों का दास रहे

अंधियारी रातोमें सोये

दिन में सूरज के पास रहे

जो केवल धुआं उगलता हो

सूरज पर कालिख मलता हो

ऐसे दीपक का जलने से पहले

बुझ जाना बेहतर है।

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( बुद्धिसेन शर्मा )

जब घर से निकली थी-नंदिनी शाह

कुछ कपड़े,

कुछ किताबें

और एक झोला भर सामान,

इतना ही तो लेकर चली थी मैं

जब घर से निकली थी।

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पर, स्त्री का घर

सिर्फ दीवारों में कहाँ होता है ?

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वह तो छोड़ आती है

अपनी हँसी रसोई में,

कुछ अधूरे सपने खिड़की पर,

बच्चों के बचपन की खुशबू

किसी पुराने संदूक में,

और अपनी उँगलियों का स्पर्श

हर उस चीज़ पर

जिसे उसने बरसों से सँवारा।

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घर बदलता है,

तो सामान समेट लिया जाता है।

पर यादों को

किस झोले में बाँधूँ?

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बारिश में भीगी हूँ मैं भी,

कई बार भीतर तक,

मगर हर बारिश के बाद

अपने आँचल से

खुद को ही पोंछा है।

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मेरे लिखे शब्द रहेंगे,

मेरी कविताएँ रहेंगी,

मेरी कहानियाँ रहेंगी !?

और शायद

किसी को याद रहेगा

कि इस घर में

एक स्त्री रहती थी

जो चुप रहकर भी

बहुत कुछ कहती थी।

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नया घर होगा,

नई खिड़कियाँ होंगी,

नई दीवारों पर

फिर से टाँग दूँगी

अपना आसमान।

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क्योंकि स्त्री

घर नहीं छोड़ती ,

वह जहाँ जाती है,

वहीं

एक नया घर

अपने भीतर से बना लेती है।

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( नंदिनी शाह )