
1.
रत्नसिंह
उसे “पद्मिनी” कह सकता था
तोता
उसे “पद्मिनी” कह सकता था
अलाउद्दीन तक
उसे “पद्मिनी” कह सकता था
लेकिन स्वरा भास्कर!
तुझे उसे “माँ पद्मिनी” कहना चाहिए था!
.
2.
अलाउद्दीन!
पहचान सके
तो इन राख की ढेरियों में पहचान..
पद्मिनी की राख कौनसी है?
और बाक़ी स्त्रियों की राख कौनसी है?
.
3.
पद्मिनी
पानी से नहीं
आग से मुँह धोती थी
उसके होंठों पर
किसी लिपस्टिक का नहीं
बल्कि किसी लाल पत्थर का रंग था
वह रात के काले धागे से
अपना जूड़ा बाँधती थी
सूरज की बिंदिया
दमकती थी उसके माथे पर
चाँद उसका मांगटीका था
सितारे
उसकी पलकों के हिण्डोले में झूलते थे..
हिंजड़ों के साथ सोने वाला अलाउद्दीन –
पद्मिनी नाम की देवी के
पैरों की धूल के लायक़ भी नहीं था!
.
4.
अलाउद्दीन!
तू चित्तौड़ जीत सकता है
तू चित्तौड़ की स्त्रियों को नहीं जीत सकता!
.
5.
भगवान करे
कि पद्मिनी एक कल्पना का ही नाम हो –
इस भारत में
जो कहने को हमारा है –
यह देखा नहीं जाता
कि 1303 में जल चुकी एक औरत को
हर थोड़े बरसों में
फिर से जलाया जाता है!
.
6.
हे ईश्वर!
चिता में राख होऊं
तो माँ पद्मिनी की तरह राख होऊं..
और
शत्रुओं के चेहरों को
काला करने के काम आऊं!
.
7.
रत्नसिंह –
महाराजा था
महाराजा है
महाराजा ही रहेगा!
पद्मिनी –
महारानी थी
महारानी है
महारानी ही रहेगी!
अलाउद्दीन –
ग़ुलाम था
ग़ुलाम है
ग़ुलाम ही रहेगा!
.
8.
राख के घूंघट से
झाँक रही है
माँ पद्मिनी की कहानी
जिन आँखों में
आँसू हैं
और
दिल में दर्द
सिर्फ़ वही देख सकते हैं :
थोड़ा-सा घूंघट उठाकर!
.
9.
ओ मेरी पत्नी!
अगर कभी कोई दुश्मन मुझे जान से मार दे और तुम्हें गुलाम बनाना चाहे तो पद्मिनी की तरह आग में जल जाना मगर अपने बदन को छूने मत देना जिसे सिर्फ़ मैंने छुआ है!
लोग बहुत समझाएँगे
लोग बहुत भड़काएँगे
लेकिन कुछ भी मत समझना
लेकिन बिलकुल मत भड़कना
मरने के बाद
हम दोनों
मेरे दिल की उस आग के फूलों से महकते कमरे में
ज़रूर मिलेंगे –
जो हमारे प्यार की रगड़क से पैदा हुई थी!
ओ मेरी पत्नी!
.
10.
मरने के बाद
अलाउद्दीन
बहत्तर हूरों के पास गया या नहीं गया..
नहीं पता!
लेकिन चित्तौड़ के
उस पद्मिनी महल में
जो एक तालाब के बीचों-बीच बना है
पर्यटकों की दुआएँ
रत्नसिंह को दूल्हा बनाकर
रोज़ अपनी पद्मिनी के पास भेजती हैं…
इतिहास!
होना क्या होता है
और
बनाना क्या होता है…
यह बात कोई राजपूतों से सीखे!
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( मनमीत सोनी )