तुम आओ तो जरा बता देना⁣-हेमन्त परिहार

तुम आओ तो जरा बता देना⁣

मैं थोड़ा घर अपना सजा दूंगा⁣

बहुत काँटे चुभते हैं यूँ तो⁣

तन्हाई की इस राह पर मुझे⁣

तुम आओ तो जरा बता देना⁣

मैं कुछ फूल प्रेम के बिछा दूंगा⁣

⁣.

बायीं तरफ से टूटा हुआ है सोफा⁣

जरा दायीं तरफ ही बैठना तुम⁣

मैं चाय बना कर लाऊं तब तक⁣

दीवार पे अपनी तस्वीरें देखना तुम⁣

ऊब लगे तुम्हें तो,बेहिचक जता देना⁣

मैं कोई गीत तुम्हारे लिए गा दूंगा⁣

⁣.

घर के हर कोने में रखी हैं यादें⁣

प्रतीक्षा में पथरा गई हैं अधूरी बातें⁣

उन्हें आहिस्ता-आहिस्ता छूना तुम⁣

छूना मेरी आँखों के आंसुओं को भी⁣

इंतज़ार में ठोस हुए हृदय को छूकर⁣

पुनः पत्थर से अहिल्या करना तुम⁣

असहज हो मन भीतर तो इशारे से बता देना⁣

मैं दो चेयर बालकनी में लगा दूंगा⁣

⁣.

आ ही जाओ तो जरा ⁣

शाम तक ठहरना तुम⁣

खाना अच्छा बना लेता हूँ अब⁣

चख कर जरूर देखना तुम⁣

मुझे देखना,घड़ी मत देखना तुम⁣

जान बूझ कर बिखराई है मैंने किताबें⁣

अपने हाथों से एक बार समेटना तुम⁣

जाने का हो समय जब⁣

अपना सर मेरे कांधे से बस सटा देना⁣

मैं यह कविता तुम्हें सुना दूंगा।⁣

.

तुम आओ तो जरा बता देना⁣

मैं थोड़ा घर अपना सजा दूंगा⁣।

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⁣.( हेमन्त परिहार )⁣

हर तरफ़ तेज़ आँधियाँ रखना-ध्रुव गुप्त

हर तरफ़ तेज़ आँधियाँ रखना
बीच में मेरा आशियाँ रखना

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धूप छत पर हो, हवा कमरे में
लॉन में शोख़ तितलियाँ रखना

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चाँद बरसे तसल्लियों की तरह
घर में दो-चार खिड़कियाँ रखना

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अपनी दुनिया है दिल-फ़रेब बहुत
एक दिल को कहाँ कहाँ रखना

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तूम रहोगे, जहाँ ज़मीं है तेरी
मैं जहाँ हूँ, मुझे वहाँ रखना

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लफ़्ज़ मिल जाएँ तो बयाँ होगा
होंट काँपे तो उँगलियाँ रखना

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बाँह फैले तो तुम को छू आए
फ़ासला इतना दरमियाँ रखना

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मेरे लफ़्ज़ों में दर्द दे या रब
मेरे मुँह में मेरी जुबाँ रखना

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( ध्रुव गुप्त )

गीत गाते हुए लोग-पार्वती तिर्की

गीत गाते हुए लोग

कभी भीड़ का हिस्सा नहीं हुए

धर्म की ध्वजा उठाए लोगों ने

जब देखा

गीत गाते लोगों को

वे खोजने लगे उनका धर्म

उनकी ध्वजा

अपनी खोज में नाकाम होकर

उन्होंने उन लोगों को जंगली कहा

वे समझ नहीं पाए

कि मनुष्य जंगल का हिस्सा है

जंगली समझे जाने वाले लोगों ने

कभी अपना प्रतिपक्ष नहीं रखा

वे गीत गाते रहे

और कभी भीड़ का हिस्सा नहीं बने।

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( पार्वती तिर्की )

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|| ગીત ગાતા લોકો ||
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ગીત ગાતા લોકો
ક્યારેય ભીડનો હિસ્સો બન્યાં નહીં
ધર્મની ધજાવાળા લોકોએ
જ્યારે જોયાં
ગીત ગાતા લોકોને
એ લોકો શોધવા લાગ્યા એમનો ધર્મ
એમની ધજા
પોતાની શોધમાં નિષ્ફળ ગયા પછી
એમણે એ લોકોને જંગલી કહ્યા
એમને એ સમજાયું નહીં
કે મનુષ્ય જંગલનો જ હિસ્સો છે
જંગલી કહેવાયેલા લોકોએ
ક્યારેય પોતાનો પ્રતિપક્ષ રજૂ ન કર્યો
એ લોકો ગીત ગાતા રહ્યા
અને ક્યારેય ભીડનો હિસ્સો ન બન્યા..
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( પાર્વતી તિર્કી )
– હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી

इक जोड़ा कश्मीर गया था-मन मीत

 

इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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घूम रहे थे घाटी घाटी

तैर रहे थे झील में पंछी

हाथ में पंछी आंख में पंछी

आकाशों के नील में पंछी

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नाव चली थी मद्धिम मद्धिम

और बुलबुले प्रिज्म हुए थे

उन दोनों में प्यार हुआ था

उन दोनों ने हाथ छुए थे

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साजन को पंछी चुग बैठे

बदली से बस सजनी लौटी !

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इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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कहवे से उठती भापों से

दो लोगों ने चित्र बनाया

अनजाने अपने लोगों को

दो लोगों ने मित्र बनाया

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कुल्फी खाई दूध जलेबी

पुचके खाए पानी वाले

उन दोनों का जुर्म यही था

उन दोनों ने सपने पाले

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दिन को लूट गई संध्याएं

लुटी पिटी – सी रजनी लौटी !

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इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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बर्फ़ घाटियां श्वेत वसन की

बुझती थी जब प्यास बदन की

लेकिन कैसा विकट समय है

चाट गईं बंदूक अगन की

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इक मज़हब का राक्षस सपना

लील गया मंदिर के दीये को

भूल गए जो भी साझा था

भूल गए सब लिए दिए को

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सांपों को था दूध पिलाया

हम तक अपनी करनी लौटी !

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इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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दो सांसों का मेला उजड़ा

यह वीरानी किसके सर है?

मेरे घर का कब्ज़ा छोड़ो

ये मेरा पुश्तैनी घर है!

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तुम कश्मीरी धरती छोड़ो

सारा हिंदुस्तान हमारा

अल्लामा इक़बाल को छोड़ो

चीन ओ’ पाकिस्तान हमारा

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गठजोड़े में आग लग गई

बिना अंगूठी मंगनी लौटी !

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इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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( मन मीत )

अब कुछ नहीं कहना-मन मीत

अब कुछ नहीं कहना
दिमाग़ सुन्न पड़ चुका है
और मेरी दो अंगुलियों और अंगूठे का ख़तना हो चुका है
जिनसे मैं कलम पकड़ता हूँ
नहीं !
मैं नरेंद्र मोदी को नहीं जानता
मैं अमित शाह को भी नहीं जानता
मैं ममता बैनर्जी को भी नहीं जानता
लेकिन मैं उन करोड़ों लोगों को जानता हूँ
जो अग्नि पूजक यानी हिन्दू कहलाते हैं
लेकिन आज जब घर में आग लगी है
तो वे चुल्लू भर पानी में डूब कर मर चुके हैं
अकेला किस किस से लडूंगा मैं
अगर आज कोई मेरा धर्म परिवर्तन करवाना चाहे
तो मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है
कि मैं खौलते हुए तेल में बैठ जाऊं
या अपनी ज़िंदा चमड़ी खींचने दूं
या दीवार में चुनवा दिया जाऊं तो डरकर अल्लाह हू अकबर नहीं कहूं
मेरे ऋषि मुनि मर गए हैं
मेरी लड़ाका जातियां शराब और कबाब और शबाब में डूबी हैं
मेरे नागा साधु हिमालय में छिपे बैठे हैं
मेरी चुनी हुई सरकार ईदी बांट रही है
यह छोटा सा धड़कता हुआ दिल
अब मेरे काबू में नहीं है
मैं इसे भगत सिंह बनकर
लोकसभा के ख़ाली इलाके में बम की तरह फोड़ देना चाहता हूँ
लेकिन मुझे डर है
इससे मेरे परिवार को भयानक यातना सहनी होगी
कोई नहीं है मेरे साथ
मेरे साथ मेरा देश नहीं है
एक भी आदमी नहीं है मेरे साथ
भगवा झंडा लहराते हुए कायरों को मैं
आदमियों की श्रेणी में नहीं रखता
मैं
एक गड्ढा खोदना चाहता हूँ
और उसमें जीवित समाधि ले लेना चाहता हूँ
लेकिन उसमें भी एक पेंच है श्रीमान –
कहीं वह वक़्फ़ की ज़मीन हुई तो ?
अभी कुछ दिनों पहले
मैं रामदेवरा (रुणिचा) यानी बीकानेर बाबा रामदेव के यहां सर झुकाने गया था
वहां एक तलवार बेचने वाले के पास जैसे ही मैं ठहरा
मेरे रिश्तेदार ने मुझे टोक दिया :
“जब सरकार अपनी है तो तलवार की ज़रूरत ही क्या है ?”
कितना विश्वास था मेरे रिश्तेदार की आंखों में
और आज मैं उस विश्वास को अपनी आंखों से टूटता हुआ देख रहा हूँ !
मैं जानता हूँ
यह कविता लंबी हो गई है
मैं जानता हूँ
यह कविता है ही नहीं
लेकिन कविता तो कुमार अंबुज भी लिखता है और आलोक धन्वा और विष्णु नागर और अविनाश मिश्र भी
जब कवियों के नाम पर इतना कूड़ा पहले से जमा है
तो मैं नया कूड़ा क्यों जमा करूं ?
क्षमा श्रीमान क्षमा !
लेकिन मैं फिर से उसी बात पर आता हूँ
और चीख-चीख कर कहता हूँ
अब कुछ नहीं कहना
दिमाग़ सुन्न पड़ चुका है
और मेरी दो अंगुलियों और अंगूठे का खतना हो चुका है
जिनसे मैं कलम पकड़ता हूँ !
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( मन मीत )

लड़के हमेशा खड़े रहे-सुनीता करोथवाल

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लड़के हमेशा खड़े रहे
खड़ा रहना उनकी कोई मजबूरी नहीं रही
बस उन्हें कहा गया हर बार
चलो तुम तो लड़के हो खड़े हो आओ
तुम मलंगों का कुछ नहीं बिगड़ने वाला
छोटी-छोटी बातों पर वे खड़े रहे कक्षा के बाहर
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स्कूल विदाई पर जब ली गई ग्रुप फोटो
लड़कियाँ हमेशा आगे बैठी
और लड़के बगल में हाथ दिए पीछे खड़े रहे
वे तस्वीरों में आज तक खड़े हैं
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कॉलेज के बाहर खड़े होकर
करते रहे किसी लड़की का इंतजार
या किसी घर के बाहर घंटों खड़े रहे
एक झलक,एक हाँ के लिए
अपने आपको आधा छोड़
वे आज भी वहीं रह गए हैं।
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बहन-बेटी की शादी में खड़े रहे मंडप के बाहर
बारात का स्वागत करने के लिए
खड़े रहे रात भर हलवाई के पास
कभी भाजी में कोई कमी ना रहे
खड़े रहे खाने की स्टाल के साथ
कोई स्वाद कहीं खत्म न हो जाए
खड़े रहे विदाई तक दरवाजे के सहारे
और टैंट के अंतिम पाईप के उखड़ जाने तक
बेटियाँ-बहनें जब तक वापिस लौटेंगी
वे खड़े ही मिलेंगे।
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वे खड़े रहे पत्नी को सीट पर बैठाकर
बस या ट्रेन की खिड़की थाम कर
वे खड़े रहे बहन के साथ घर के काम में
कोई भारी सामान थामकर
वे खड़े रहे माँ के ऑपरेशन के समय
ओ. टी. के बाहर घंटों
वे खड़े रहे पिता की मौत पर अंतिम लकड़ी के जल जाने तक
वे खड़े रहे दिसंबर में भी
अस्थियाँ बहाते हुए गंगा के बर्फ से पानी में
लड़कों रीढ़ तो तुम्हारी पीठ में भी है
क्या यह अकड़ती नहीं?

( सुनीता करोथवाल )

દીકરાઓ હંમેશા ઊભા રહ્યા
ઊભા રહેવું એમની કોઈ મજબૂરી નથી
બસ એમને કહેવામાં આવ્યું.. હંમેશા
ચાલો તમે તો છોકરાઓ છો ઊભા રહી જાવ
તમે જડસુઓનું કંઈ બગડી જવાનું નથી
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નાનીનાની વાતોમાં એ વર્ગની બહાર ઊભા રહ્યા
શાળા વિદાય સમારંભનો જ્યારે ફોટો લેવામાં આવ્યો
છોકરીઓ હંમેશા આગળ બેઠી
અને છોકરાઓ અદબ વાળીને પાછળ ઊભા રહ્યા
તેઓ ફોટોમાં આજ સુધી ઊભા રહ્યા
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કોલેજની બહાર ઊભા રહીને
જોતા રહ્યા કોઈ છોકરીની રાહ
અથવા કોઈ ઘરની સામે કલાકો ઊભા રહ્યા
એક ઝલક, એક હા માટે
તેઓની અડધી જાત આજેય ત્યાં જ રહી ગઈ છે.
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બહેન-દીકરીનાં લગ્નમાં ઊભા રહ્યા મંડપની બહાર
જાનનું સ્વાગત કરવા માટે
ઊભા રહ્યા આખી રાત કંદોઈ પાસે
ક્યારેય કોઈ શાક ઓછું ન પડે
ઊભા રહ્યા ખાવાનાં મેજ પાસે
ક્યાંક કોઈ વ્યંજન ખતમ ન થઈ જાય
ઊભા રહ્યા વિદાય સુધી દરવાજાના ટેકે
અને મંડપનો છેલ્લો સ્તંભ સંકેલી લેવામાં આવે ત્યાં સુધી
બહેન-દીકરીઓ જ્યારે પગફેરે આવશે
તેઓ ત્યાં ઊભેલા જ હશે.
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તેઓ ઊભા રહ્યા પત્નિને સીટ પર બેસાડીને
બસ કે ટ્રેનની બારી પકડીને
તેઓ ઊભા રહ્યા બહેનની સાથે ઘરનાં કામમાં કોઈ વજનદાર વસ્તુ ઊંચકીને
તેઓ ઊભા રહ્યા માના ઓપરેશનના સમયે
ઓ. ટી.ની બહાર કલાકો
તેઓ ઊભા રહ્યા પિતાનાં મૃત્યુ વખતે છેલ્લું લાકડું બળી જાય ત્યાં સુધી
તેઓ ઊભા રહ્યા ડિસેમ્બરમાં પણ
ગંગાનાં બરફીલા પાણીમાં અસ્થિઓ વહાવતા
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દીકરાઓ,
બરડો તો તમારી પીઠમાંય છે
શું એ ઝકડાઈ જતો નથી ?
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( સુનીતા કરોથવાલ, અનુ. નેહા પુરોહિત )

 

रामलला-मनमीत सोनी

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आँख सरयू है आज रामलला।
तू ही हर सू है आज रामलला।
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दिन किसी फूल-सा महक उट्ठा
रात ख़ुशबू है आज रामलला।
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हम भी सूरज हैं तेरी रहमत से
कौन जुगनू है आज रामलला?
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बाद आबाद कितनी सदियों के
तेरा पहलू है आज रामलला।
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वो तिहत्तर बरस का बूढा शख़्स
तेरा बाज़ू है आज रामलला।
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केसरी रंग का उगा सूरज
तेरा जादू है आज रामलला।
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उसको जीने का मिल गया मक़सद
जो भी हिन्दू है आज रामलला।
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( मनमीत सोनी )

राम : कुछ शब्द-चित्र : भाग पांच-मनमीत सोनी

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1.
क्योंकि अब
मैं अपने राम का कवि हूँ-
क्या इसीलिए
तुम्हारे काम का कवि नहीं हूँ?
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2.
मैं कवि हूँ
मैं भक्त नहीं हूँ..
जाओ!
और मुझे
इस अवसाद में घुलने दो
कि रामराज्य आ भी गया
तो जीवन-मृत्यु का क्या होगा?
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3.
सीताएँ
धरती में समाती रही हैं..
राम
नदियों में डूबते रहे हैं..
कोई तो बताए..
आसमान जैसे लोग
आख़िर
कहाँ चूकते रहे हैं?
.
4.
तुलसीदास जी!
एक बात कहूँ?
बुरा तो नहीं मानेंगे?
मेरी रत्ना ने मुझे भी वही उलाहना दिया था, जो आप की रत्ना ने आप को दिया था।
लेकिन मैं हार कर रामचरितमानस नहीं लिखने बैठ गया।
बल्कि मैंने अपनी रत्ना को इस बार अलग तरीक़े से प्यार किया और उसने इस बार मुझे कोई उलाहना नहीं दिया।
उलटे वह तो मेरी और ज़्यादा दीवानी हो गई।
तुलसीदास जी!
एक बात और कहूँ?
बुरा तो नहीं मानेंगे?
.
5.
रामजी ने ताड़का को तीर मारा
तीर ताड़का के बाएं सीने में घुप गया
ताड़का धरती पर गश खा कर गिर गई
लक्ष्मण जी ख़ुशी से फूले न समाए
लक्ष्मण जी ने राम जी से कहा :
मर गई दुष्ट!
राम जी ने लक्ष्मण जी से कहा :
अच्छी बात है! लेकिन इस देवी को भी कहाँ पता था कि वह राक्षसी थी!
.
( मनमीत सोनी )

राम : कुछ शब्द-चित्र : भाग चार-मनमीत सोनी

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1.
मेरे राम
ईश्वर राम हैं
केवल सेनानायक राम नहीं..
राम के विरुद्ध बोलने से
वह बस राम का नहीं रहता
लेकिन राम का नहीं रहने से
वह रावण का भी तो नहीं हो जाता!
.
2.
कैकेयी
एक चालाक रानी-भर नहीं थी-
कैकेयी
दरअसल दशरथ के भीतर की
एक बहुत पुरानी बेचैनी थी
जिसे दशरथ को बुझाना नहीं आया!
.
3.
राम जैसे ईश्वर से
मनुष्य के अभिनय में कितनी ही चूकें हुई हैं –
मैं इसीलिए तो कहता हूँ..
मनुष्यों को
देवताओं का अभिनय करने से बचना चाहिए!
.
4.
यह मत समझना
कि यह मंदिर
अब कभी नहीं टूटेगा
अधर्म
फिर आएगा
और फिर-फिर आएगा
तम्बू में
एक बार नहीं
बल्कि कई बार रहना पड़ेगा
श्री राम जी को
एक ढांचा
मनुष्य की हड्डियों और लहू से बना ढांचा
कभी भी खड़ा हो जाएगा
कितनी ही शताब्दियाँ
फिर ज़ाया हो जाएँगी
खूँख़्वार मनुष्य की रीढ़ सीधी करने में!
.
( मनमीत सोनी )

राम : कुछ शब्द-चित्र : भाग तीन-मनमीत सोनी

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1.
अजी! क्या आपको मुझ पर शक है?
“कैसी बात करती हो सीते? बिलकुल नहीं!”
तो फिर डरते क्यों हैं?
“डरता हूँ कि लोग फिर भी बहुत कुछ कहेंगे!”
लोगों को भूल जाइये!
“कैसे भूल जाऊँ! मेरी प्रजा है!”
सीताजी के तन-बदन में आग लग गई। कालांतर में कुछ भोले और मूर्खों ने इसे सचमुच की आग समझ लिया। आज जिसे अग्नि-परीक्षा कहते हैं, दरअसल वह अपने मूल में पति-पत्नी की मीठी तकरार थी!
.
2.
रामायण में सब कुछ आदर्श है। इतना आदर्श है कि तुलसीदास जैसा भक्त इस पर रामचरित मानस लिख सकता है मगर मनमीत जैसा खल-कामी दस-बारह कविताओं में ही थक जाता है!
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3.
पका हुआ फल
खिला हुआ फूल
माँ का पहला दूध
बच्चे का टूटा दाँत
पुरुष की पहली कमाई
नई-नई बहू ने नेगचार आदि-आदि..
मेरे बिम्ब
कितने साफ़-सुथरे हो जाते हैं-
जब मैं राम का नाम लेता हूँ!
.
4.
जो स्त्री
किसी के टोकने पर
आग में जल सकती है
और धरती में समा सकती है
वह किसी रावण के बाँधने से क्या बँधती?
लेकिन यह
एक स्त्री का निर्दोष हठ था
कि उसका पुरुष आएगा
पूरी बरात और ढ़ोल-धमाकों के साथ आएगा
और जब तक
वह नहीं आएगा
वह अपनी रस्सियाँ नहीं खोलेगी!
.
( मनमीत सोनी )