मैं फटी जींस नहीं पहनती। क्योंकि मेरी प्रगति कपड़ों के छेदों से नहीं मापी जाती। मेरी आज़ादी घुटनों से झांकती खाल में नहीं है। वो तो मेरी रीढ़ की उस सीध में है जो भीड़ की तालियों पर नहीं डगमगाती।
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मेरा नारीत्व कपड़ों के चिथड़ों में नहीं टंगा, वो मेरी आवाज़ में बसता है — जो झूठ को झूठ कहने की हिम्मत रखती है। मेरा नारीवाद शरीर की परतें खोलकर वाहवाही पाने में नहीं, सच बोलने की ताकत में है।
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मुझे दिखावे की आज़ादी नहीं चाहिए। मेरी आज़ादी वो है जो अपने घर की देहरी से लेकर दुनिया की पंचायत तक अपना सच कह सके।
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हाँ, मैं जींस पहनती हूँ — वो जींस जो मेरे डीएनए में बुनी है। वो जींस जिसमें गार्गी की बुद्धि है, मीराबाई की जिद है, रानी लक्ष्मीबाई की जंग का साहस है, कल्पना चावला का आकाश छू लेने का सपना है, पी.वी. सिंधु की हर स्मैश में गूंजती गरज है, मेरी कोम की हर मुक्के में भरी असंभव जीत है, और इसरो की उन बेटियों की वो आग है जिन्होंने मंगल की ज़मीन पर भारत का निशान जड़ दिया।
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मेरी प्रगति उस लड़की की तरह है जो गाँव से शहर आई, किताबें उठाईं, सपनों की सीढ़ियाँ खुद बनाई। जो रैम्प पर नहीं चढ़ी, पर अपनी मेहनत से ज़िंदगी की ऊँचाईयों पर पहुँची।
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मैं जानती हूँ — फटी जींस पहनना आसान है। उससे ज़्यादा मुश्किल है सोच के छेदों को सीना, संस्कारों की सिलाई को बचाना।
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अब बाजार में जींस के छेद बिकते हैं, आत्मा की सच्चाई नहीं। दिखावे का गर्व बिकता है, विचारों की गहराई नहीं।
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अब सवाल ये नहीं कि कपड़े कितने फटे हैं, सवाल ये है कि सोच कितनी बची है। सवाल ये नहीं कि घुटने दिखे या छुपे, सवाल ये है कि हिम्मत कितनी सच्ची है। सवाल ये नहीं कि तुमने क्या ओढ़ा है, सवाल ये है कि आँधियों के सामने तुम कितना अडिग रह सके।