पेट्रोल, गैस और कामरेड-मनमीत सोनी

आज सुबह बहुत ख़ुश था कामरेड

.

कह रहा था :

.

“युद्ध हो रहा है भाईसाहब युद्ध!”

.

मैंने कहा :

.

“तो”?

.

तो हँसी को दबाकर
आवाज़ में गंभीरता का अभिनय करते हुए बोला :

.

“अब तो गया साला मोदी!”

.


मैंने पूछा :

.

“कैसे गया मोदी?”

.

तो उसने बातों की रेलगाड़ी ही चला दी :

.

“अब पेट्रोल महंगा हो जाएगा”
“अब गैस महंगी हो जाएगी”
“अब लम्बी लम्बी लाइन लगेगी”
“अब लोग ब्लैक मार्केटिंग करेंगे”
“अब मारा-पीटी छीना-झपटी होगी”
“अब धारा एक सौ चौवालीस लगेगी”
“अब राहुल गाँधी का महत्व समझ आएगा”
“अब कांग्रेस मज़बूत बनकर उठेगी”
“अब इतना संकट होगा कि मध्यावधि चुनाव होंगे”
“अब चुनाव में मोदी हारेगा”
“अब मोदी पर केस होंगे”
“अब मोदी जेल जाएगा”
“अब मोदी वाले सपोर्टर रोयेंगे”
“अब अल्पसंख्यक मज़बूत होंगे”
“अब असली लोकतंत्र की स्थापना होगी”
“अब भारत नेहरू का भारत बनेगा”
“अब भारत गाँधी का भारत बनेगा”

.

इतना कहते कहते
हांफने लगा कामरेड

.

और
ज़मीन पर उकडू बैठ गया!

_

मैंने कामरेड को उठाया
थोड़ा-सा पानी पिलाया
यू ट्यूब पर “आज तक” लगाया
भारत सरकार की प्रेस कॉन्फ्रेंस दिखाई
और फिर धीरे से बताया :

.

होरमुज़ स्ट्रेट में
भारतीय जहाज़ों को अनुमति मिल गई है कामरेड!

.


कामरेड के चेहरे का तो
रंग ही उड़ गया

.

उसने कहा
इण्डिया टीवी लगाओ

.

उसने कहा
एबीपी न्यूज़ लगाओ

.

उसने कहा
आर. भारत लगाओ

.

उसने कहा
Ndtv लगाओ

.

उसने कहा
सब के सब झूठे हैं

.

जल्दी से देखो
क्या रवीश कुमार की कोई वीडियो आई है
क्या पुण्य प्रसून वाजपेई की कोई वीडियो आई है
क्या अभिसार शर्मा की कोई वीडियो आई है
क्या ध्रुव राठी की कोई वीडियो आई है

.

_

मैं समझ गया था
अगर कामरेड को थोड़ा और पानी नहीं पिलाया
तो इसका राम नाम सत्य हो जाएगा

.

हालांकि किसी भी भारतीय कामरेड का
“राम नाम सत्य” कभी नहीं होता
एक सच्चे भारतीय कामरेड का
हमेशा ही “इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन” होता है

.

मैंने कामरेड को
गाड़ी में बिठाया
गाड़ी स्टार्ट की
गाड़ी पेट्रोल पम्प तक पहुंची ही थी

.
कि कामरेड चीख़ उठा :

.

“पेट्रोल ख़त्म”
“पेट्रोल ख़त्म”
“पेट्रोल ख़त्म”

.

लेकिन कामरेड को फिर झटका लगा
जब मैंने गाड़ी की टंकी फुल करवाई

.

_

कामरेड को ड्रिप लगी
कामरेड को ORS पिलाया गया
कामरेड को विटामिन b12 और d3 की सुईयां लगीं
तब जाकर कुछ नॉर्मल हुआ कामरेड


हॉस्पिटल से छुट्टी मिली
तो लंगड़ाते हुए बाहर आया कामरेड
जुबान पर जैसे लकवा पड़ गया था

.

कामरेड बुदबुदा रहा था :

.

“एक मौक़ा और गया”
“एक मौक़ा और गया”
“एक मौक़ा और गया”


दोस्तो!

.

बहुत मुमकिन है
कि महंगा हो गया हो पेट्रोल
कि महंगी हो गई हो गैस

.

लेकिन कितना सस्ता हो गया है
हमारा कामरेड

.


दोस्तो!

.

मेरे मन में तो हँसी के फव्वारे छूट रहे हैं
इसलिए कामरेड को फोन नहीं कर सकता
लेकिन आप ज़रूर कर सकते हैं
कृपया आप तो पूछिए
क्या कामरेड ठीक है या नहीं

.

कहीं ऐसा तो नहीं
कि सड़कों पर पैदल निकल गया हो कामरेड

.

गैस एजेंसी के सामने
भीड़ नहीं पाकर
और ज़्यादा बावला हो गया हो

.

_

दोस्तो!

.

पता तो करो…

.

कामरेड कहाँ है?
कामरेड कैसा है?
कामरेड क्या कर रहा है?

.

दोस्तो!

.

पेट्रोल से भी
ड्राइक्लीन नहीं होते
कामरेड की गद्दारी के दाग़ धब्बे!

.

आप क्या कहते हैं???

.

( मनमीत सोनी )

જે ડરાવે છે-મંગલેશ ડબરાલ

જે આપણને ડરાવે છે

એ હંમેશા એમ કહેતો હોય

ડરવા જેવી કોઈ વાત નથી

હું કોઈને ડરાવતો નથી

.

જે આપણને ડરાવે છે

એ હવામાં આંગળી ઊંચી કરીને કહે છે

કોઈએ ડરવાની જરૂર નથી

એ પોતાની મુઠ્ઠી ભીડીને હવામાં ઉલાળે છે

અને પૂછે છે

તમે ડરતા તો નથી ને

.

જે આપણને ડરાવે છે

એ પોતાની તીક્ષ્ણ ઠંડી આંખોથી આપણને ઘુરે છે

અને નીરખે છે – કોણ કોણ ડરી રહ્યાં છે

.

લોકો જ્યારે ડરવા લાગે છે, એ રાજી થાય છે

અને હસતાં હસતાં કહે છે

ડરવાનું કોઈ કારણ નથી

.

જે આપણને ડરાવે છે

એ ત્યારે સ્વયં ડરી જાય છે

જ્યારે એ જુએ છે

કે કોઈ એનાથી ડરી નથી રહ્યું.

.

( મંગલેશ ડબરાલ, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

.

जो डराता है

.

जो हमें डराता है

वह कहता है डरने की कोई बात नहीं है

मैं किसी को डरा नहीं रहा हूँ

जो हमें डराता है

वह हवा में अपनी अंगुली तान कर कहता है

किसी को डरने की जरूरत नहीं है

वह अपनी मुट्ठियाँ भींच कर हवा में उछालता है

और पूछता है तुम डर तो नहीं रहे हो

.

जो हमें डराता है

वह अपनी तीखी ठंढी आँखों से हमें घूरता है

और देखता है कौन-कौन डर रहा है

लोग जब डरने लगते हैं वह खुश होने लगता है

और हँसते हुए कहता है डरने की कोई वजह नहीं है

वह खुद डर जाता है

जब वह देखता है कि कोई डर नहीं रहा है।

जो हमें डराता है

.

( मंगलेश डबराल )

મિત્ર-સિદ્ધાર્થ બાજપેયી

|| મિત્ર ||

એ મિત્ર હતો

એકનો એક

પહેલી જાસુસી ચોપડી

પહેલી સિગરેટ

પહેલો ઝઘડો

પહેલો પ્રેમ

અમારું બધું સહિયારું હતું

.

હું વહેંચતો

મારા દુઃખ એની સાથે

કશું બોલ્યા વિના

અને કશું બોલ્યા વિના સમજી પણ જતો

એનો મૂંઝારો અને એનાં સપના

.

એની પાસેથી ઉછીના લીધેલા પૈસા ક્યારેય ભારરૂપ ન લાગતા દિલને

અને આપતો તો કશું જ નહીં એને

.

કેવળ એ એક જ હતો

જેની સામે રડી શકતો હું

એટલે એ જ્યારે મર્યો

તો રડ્યો નહીં હું

.

જ્યારે સમાચાર મળ્યા એના મૃત્યુના

અર્ધ ચંદ્ર આકાશમાં હતો

પછી આકાશમાંથી ચંદ્ર ગાયબ થયો અને હું એકલો ઊભો હતો બાલ્કનીમાં

.

રાત્રિમાં

આકાશમાં

દુનિયામાં

હું સાવ એકલો હતો..

.

( સિદ્ધાર્થ બાજપેયી, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

કઈ હતી મારી માતૃભાષા ?-સિદ્ધાર્થ બાજપેયી

કઈ હતી મારી માતૃભાષા ?

ફળિયાની કોરે ઉગેલા

ટમેટાંના લીલા છોડમાં

અચાનક એક લાલ ટમેટું જોઈ હું બોલી ઊઠેલો

પહેલીવાર ” અરે ! “

જે તોતડી ભાષામાં

એ ?

.

અથવા પછી

બધાં સપના જોયાં જે ભાષામાં

એ અલ્લડ અને બાલિશ ઉંમરમાં

એ ?

.

કે પછી

જે ભાષામાં રમતાં રમતાં લડી પડતાં

અમે નાના નાના ભેરુઓ

અથવા

જે ભાષામાં લખી કવિતાઓ

અને પ્રેમના કાચા પાકા સંદેશા

એ ?

.

પરંતુ ના ,

ખરેખર તો મારી માતૃભાષા એ હતી

જેમાં મારી બા રડતી

ક્યારેક ક્યારેક

ચુપચાપ

એકલાં – એકલાં…

.

( સિદ્ધાર્થ બાજપેયી, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

( મૂળ કવિતા કવિના સંગ્રહ आसान सी बातें માંથી )

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कौन-सी थी मेरी मातृभाषा

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कौन-सी थी मेरी मातृभाषा?

आंगन के किनारे

उगे टमाटर के हरे पौधों में अचानक

एक लाल टमाटर देख मैंने कहा पहली बार

‘अरे!’ जिस तोतली भाषा में वह?

या फिर सारे सपने देखे जिस भाषा में

एक अल्हड़ और मूर्ख-सी उम्र में, वह?

या जिस भाषा में लिखी कविताएं

और लिखे प्रेम के कच्चे-पक्के संदेशे, वह?

पर सच में तो

मेरी मातृभाषा वह थी

जिसमें मेरी मां रोती थी कभी-कभी

चुपचाप अकेले में!

विनोद कुमार शुक्लजी को विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

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सुप्रसिद्ध कवि-कथाकार, साहित्य अकादेमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल जी (1937-2025) को विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

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उनकी सरल भाषा में गहन जीवन दर्शन वाली रचनाएँ, जैसे ‘नौकर की कमीज’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, हमें हमेशा प्रेरणा देती रहेंगी।

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(१)

रात दस मिनट की होती

तो पाँच मिनट में आधी रात हो जाती –

रातें ऐसी ही बीतीं

.

दिन दस मिनट का होता

तो पाँच मिनट में आधा दिन बीत जाता –

दिन ऐसे ही बीते

.

मै दो दिन की जिंदगी जी सकता हूँ

एक दिन मै तुम्हारे पास रहूँगा

दूसरे दिन तुम मेरे पास रहना

.

(२)

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

व्यक्ति को मैं नहीं जानता था

.

हताशा को जानता था

इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया

.

मैंने हाथ बढ़ाया

मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ

.

मुझे वह नहीं जानता था

मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था

.

हम दोनों साथ चले

दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे

.

साथ चलने को जानते थे।

.

(३)

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे

मैं उनसे मिलने

.

उनके पास चला जाऊँगा।

एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर

.

नदी जैसे लोगों से मिलने

नदी किनारे जाऊँगा

.

कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा

पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब

.

असंख्य पेड़ खेत

कभी नहीं आएँगे मेरे घर

.

खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने

गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।

.

जो लगातार काम में लगे हैं

मैं फ़ुरसत से नहीं

.

उनसे एक ज़रूरी काम की तरह

मिलता रहूँगा—

.

इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह

सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।

.

(४)

प्रेम की जगह अनिश्चित है

यहाँ कोई नहीं होगा की जगह भी कोई है।

.

आड़ भी ओट में होता है

कि अब कोई नहीं देखेगा

.

पर सबके हिस्से का एकांत

और सबके हिस्से की ओट निश्चित है।

.

वहाँ बहुत दुपहर में भी

थोड़ी-सा अँधेरा है

.

जैसे बदली छाई हो

बल्कि रात हो रही है

.

और रात हो गई हो।

बहुत अँधेरे के ज़्यादा अँधेरे में

.

प्रेम के सुख में

पलक मूँद लेने का अंधकार है।

.

अपने हिस्से की आड़ में

अचानक स्पर्श करते

.

उपस्थित हुए

और स्पर्श करते हुए विदा।

.

(५)

अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं

और पूरा आकाश देख लेते हैं

.

सबके हिस्से का आकाश

पूरा आकाश है।

.

अपने हिस्से का चंद्रमा देखते हैं

और पूरा चंद्रमा देख लेते हैं

.

सबके हिस्से का चंद्रमा वही पूरा चंद्रमा है।

अपने हिस्से की जैसी-तैसी साँस सब पाते हैं

.

वह जो घर के बग़ीचे में बैठा हुआ

अख़बार पढ़ रहा है

.

और वह भी जो बदबू और गंदगी के घेरे में ज़िंदा है।

सबके हिस्से की हवा वही हवा नहीं है।

.

अपेन हिस्से की भूख के साथ

सब नहीं पाते अपने हिस्से का पूरा भात

.

बाज़ार में जो दिख रही है

तंदूर में बनती हुई रोटी

.

सबके हिस्से की बनती हुई रोटी नहीं है।

जो सबकी घड़ी में बज रहा है

.

वह सबके हिस्से का समय नहीं है।

इस समय।

.

(६)

आँख बंद कर लेने से

अंधे की दृष्टि नहीं पाई जा सकती

.

जिसके टटोलने की दूरी पर है संपूर्ण

जैसे दृष्टि की दूरी पर।

.

अँधेरे में बड़े सवेरे एक खग्रास सूर्य उदय होता है

और अँधेरे में एक गहरा अँधेरे में एक गहरा अँधेरा फैल जाता है

.

चाँदनी अधिक काले धब्बे होंगे

चंद्रमा और तारों के।

.

टटोलकर ही जाना जा सकता है क्षितिज को

दृष्टि के भ्रम को

.

कि वह किस आले में रखा है

यदि वह रखा हुआ है।

.

कौन से अँधेरे सींके में

टँगा हुआ रखा है

.

कौन से नक्षत्र का अँधेरा।

आँख मूँदकर देखना

.

अंधे की तरह देखना नहीं है।

पेड़ की छाया में, व्यस्त सड़क के किनारे

.

तरह-तरह की आवाज़ों के बीच

कुर्सी बुनता हुआ एक अंधा

.

संसार से सबसे अधिक प्रेम करता है

वह कुछ संसार स्पर्श करता है और

.

बहुत संसार स्पर्श करना चाहता है।

.

(७)

मैं स्वभाविक मौत तक ज़िंदा रहना चाहता हूं

अगर रोज़ कर्फ्यू के दिन हों
तो कोई अपनी मौत नहीं मरेगा
कोई किसी को मार देगा
पर मैं स्वाभाविक मौत मरने तक
ज़िन्दा रहना चाहता हूँ
दूसरों के मारने तक नहीं
.
और रोज़ की तरह अपना शहर
रोज़ घूमना चाहता हूँ
.
शहर घूमना मेरी आदत है
ऐसी आदत कि कर्फ्यू के दिन भी
किसी तरह दरवाज़े खटखटा कर
सबके हालचाल पूछूँ
.
हो सकता है हत्यारे का
दरवाज़ा भी खटखटाऊँ
अगर वह हिन्दू हुआ
तो अपनी जान
हिन्दू कह कर न बचाऊँ
मुसलमान कहूँ
.
अगर मुसलमान हुआ
तो अपनी जान
मुसलमान कह कर न बचाऊँ
हिन्दू कहूँ
.
हो सकता है इसके बाद भी
मेरी जान बच जाय
तो मैं दूसरों के मारने तक नहीं
अपने मरने तक जिन्दा रहूँ
.
(विनोद कुमार शुक्ल)

रात के साढ़े तीन बजे हैं-शिवांगी गोयल

रात के साढ़े तीन बजे हैं
जाने कैसी सोच में गुम हूँ
कितनी रीलें देख चुकी हूँ
मन फिर भी तो बुझा हुआ है
जीत गई या हार रही हूँ
अब तक कोई खबर नहीं है
अम्मा-बाबा जगे हुए हैं, हैराँ से हैं
भाई मुझसे लिपट गया था
रो उट्‌ठा था
उसके आँसू याद आ रहे
उसकी बेचैनी भी मेरे पोर-पोर में जाग उठी है
सब अन्दर से टूट गया है

.

तुम पूछोगे किसने तोड़ा
एक नाम ले पाऊँगी क्या ?
मेरी आँखें आसमान के उस तारे को देख रही हैं
तुम भी देखो
देखो मेरे नानाजी हैं तारा बनकर
बोल रहे हैं मुझसे लोगों की मत सुनना
उम्र, पढ़ाई, नाम, पदक – सब बेमानी है
लोग कहेंगे चुप रहना, सब सह लेना
लोगों की परिभाषाएँ सब बेमानी है

.

दरवाज़े पर खटके से दिल काँप गया है
छुपकर देखा – कोई नहीं है-बेचैनी है
रात अँधेरी, कोई नहीं है, बेचैनी है
नींद कहाँ है?
शायद बिस्तर के नीचे है, झुककर देखें?
डर लगता है – किससे लेकिन?
एक नाम ले पाऊँगी क्या? सख़्त मनाही है

.

डरना हो तो डर सकती हो लेकिन सख़्त मनाही है
न! तुम कोई नाम न लेना!
रोते-रोते मर जाना पर – नाम न लेना
बड़े लोग हैं, बड़े नाम हैं
कल की लड़की – कौन हो तुम?
तुम्हें कौन सुनेगा?

.

रात समेटो, नींद उठाओ
ठीक तो हो तुम; ठीक नहीं क्या?
क्या पागलपन रोना-धोना
मुँह पर कस के पट्टी बाँधो
चुप – सो जाओ!

.

( शिवांगी गोयल )

गीत गाते हुए लोग-पार्वती तिर्की

गीत गाते हुए लोग

कभी भीड़ का हिस्सा नहीं हुए

धर्म की ध्वजा उठाए लोगों ने

जब देखा

गीत गाते लोगों को

वे खोजने लगे उनका धर्म

उनकी ध्वजा

अपनी खोज में नाकाम होकर

उन्होंने उन लोगों को जंगली कहा

वे समझ नहीं पाए

कि मनुष्य जंगल का हिस्सा है

जंगली समझे जाने वाले लोगों ने

कभी अपना प्रतिपक्ष नहीं रखा

वे गीत गाते रहे

और कभी भीड़ का हिस्सा नहीं बने।

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( पार्वती तिर्की )

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|| ગીત ગાતા લોકો ||
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ગીત ગાતા લોકો
ક્યારેય ભીડનો હિસ્સો બન્યાં નહીં
ધર્મની ધજાવાળા લોકોએ
જ્યારે જોયાં
ગીત ગાતા લોકોને
એ લોકો શોધવા લાગ્યા એમનો ધર્મ
એમની ધજા
પોતાની શોધમાં નિષ્ફળ ગયા પછી
એમણે એ લોકોને જંગલી કહ્યા
એમને એ સમજાયું નહીં
કે મનુષ્ય જંગલનો જ હિસ્સો છે
જંગલી કહેવાયેલા લોકોએ
ક્યારેય પોતાનો પ્રતિપક્ષ રજૂ ન કર્યો
એ લોકો ગીત ગાતા રહ્યા
અને ક્યારેય ભીડનો હિસ્સો ન બન્યા..
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( પાર્વતી તિર્કી )
– હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી

फिर उगना-डॉ. पार्वती तिर्की

 

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झारखंड की आदिवासी बेटी डॉ. पार्वती तिर्की ने रचा साहित्य का इतिहास!

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झारखंड के गुमला ज़िले से आने वाली डॉ. पार्वती तिर्की को उनके पहले ही कविता संग्रह ‘फिर उगना’ के लिए मिला है साहित्य अकादमी युवा पुरस्कार 2025 — यह सिर्फ एक पुरस्कार नहीं, बल्कि उस आवाज़ का सम्मान है जो आज भी जंगलों, गांवों, लोकगीतों और मिट्टी से जुड़ी हुई है।

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उनकी कविताओं में आदिवासी संस्कृति का संघर्ष, प्रकृति के साथ तादात्म्य, और आधुनिक जीवन की हलचल के बीच लोक जीवन की जिजीविषा को बेहद सहज, सरल भाषा में सामने लाया गया है।

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गुमला के एक नवोदय विद्यालय से पढ़ाई शुरू कर उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातक और परास्नातक की पढ़ाई की। फिर वहीं से उन्होंने आदिवासी समुदाय की संस्कृति और गीतों पर पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। वे आज रांची विश्वविद्यालय के राम लखन सिंह यादव कॉलेज में सहायक प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं।

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उनका पहला कविता-संग्रह ‘फिर उगना’ वर्ष 2023 में राधाकृष्ण प्रकाशन से प्रकाशित हुआ। इस संग्रह को हिन्दी की कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं और समीक्षकों ने नई आवाज़ और ज़रूरी हस्तक्षेप माना है।

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पार्वती कहती हैं —

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“मैंने कविताओं के ज़रिए संवाद की कोशिश की है। विविध जनसंस्कृतियों के बीच समझ और विश्वास बने — यही मेरी कोशिश रही है। इस सम्मान से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा है।”

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यह सम्मान न सिर्फ पार्वती का है, बल्कि उन सभी युवाओं का है जो ग्रामीण या आदिवासी पृष्ठभूमि से आते हुए भी, अपनी भाषा, अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति से जुड़े रहकर नए साहित्य की दुनिया बना रहे हैं।

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राजकमल प्रकाशन के अध्यक्ष अशोक महेश्वरी ने इस उपलब्धि पर कहा —

“पार्वती का लेखन दिखाता है कि परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ जी सकती हैं। हिन्दी कविता का भविष्य अब सिर्फ शहरों में नहीं, गांवों और लोक जीवन में भी आकार ले रहा है।”

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‘फिर उगना’ — एक नई भाषा, नई संवेदना और नई उम्मीद का नाम है।

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डॉ. पार्वती तिर्की को बहोत बहोत बधाई ।

इक जोड़ा कश्मीर गया था-मन मीत

 

इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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घूम रहे थे घाटी घाटी

तैर रहे थे झील में पंछी

हाथ में पंछी आंख में पंछी

आकाशों के नील में पंछी

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नाव चली थी मद्धिम मद्धिम

और बुलबुले प्रिज्म हुए थे

उन दोनों में प्यार हुआ था

उन दोनों ने हाथ छुए थे

.

साजन को पंछी चुग बैठे

बदली से बस सजनी लौटी !

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इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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कहवे से उठती भापों से

दो लोगों ने चित्र बनाया

अनजाने अपने लोगों को

दो लोगों ने मित्र बनाया

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कुल्फी खाई दूध जलेबी

पुचके खाए पानी वाले

उन दोनों का जुर्म यही था

उन दोनों ने सपने पाले

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दिन को लूट गई संध्याएं

लुटी पिटी – सी रजनी लौटी !

.

इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

.

बर्फ़ घाटियां श्वेत वसन की

बुझती थी जब प्यास बदन की

लेकिन कैसा विकट समय है

चाट गईं बंदूक अगन की

.

इक मज़हब का राक्षस सपना

लील गया मंदिर के दीये को

भूल गए जो भी साझा था

भूल गए सब लिए दिए को

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सांपों को था दूध पिलाया

हम तक अपनी करनी लौटी !

.

इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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दो सांसों का मेला उजड़ा

यह वीरानी किसके सर है?

मेरे घर का कब्ज़ा छोड़ो

ये मेरा पुश्तैनी घर है!

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तुम कश्मीरी धरती छोड़ो

सारा हिंदुस्तान हमारा

अल्लामा इक़बाल को छोड़ो

चीन ओ’ पाकिस्तान हमारा

.

गठजोड़े में आग लग गई

बिना अंगूठी मंगनी लौटी !

.

इक जोड़ा कश्मीर गया था

उसमें से बस पत्नी लौटी !

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( मन मीत )

अब कुछ नहीं कहना-मन मीत

अब कुछ नहीं कहना
दिमाग़ सुन्न पड़ चुका है
और मेरी दो अंगुलियों और अंगूठे का ख़तना हो चुका है
जिनसे मैं कलम पकड़ता हूँ
नहीं !
मैं नरेंद्र मोदी को नहीं जानता
मैं अमित शाह को भी नहीं जानता
मैं ममता बैनर्जी को भी नहीं जानता
लेकिन मैं उन करोड़ों लोगों को जानता हूँ
जो अग्नि पूजक यानी हिन्दू कहलाते हैं
लेकिन आज जब घर में आग लगी है
तो वे चुल्लू भर पानी में डूब कर मर चुके हैं
अकेला किस किस से लडूंगा मैं
अगर आज कोई मेरा धर्म परिवर्तन करवाना चाहे
तो मुझमें इतनी हिम्मत नहीं है
कि मैं खौलते हुए तेल में बैठ जाऊं
या अपनी ज़िंदा चमड़ी खींचने दूं
या दीवार में चुनवा दिया जाऊं तो डरकर अल्लाह हू अकबर नहीं कहूं
मेरे ऋषि मुनि मर गए हैं
मेरी लड़ाका जातियां शराब और कबाब और शबाब में डूबी हैं
मेरे नागा साधु हिमालय में छिपे बैठे हैं
मेरी चुनी हुई सरकार ईदी बांट रही है
यह छोटा सा धड़कता हुआ दिल
अब मेरे काबू में नहीं है
मैं इसे भगत सिंह बनकर
लोकसभा के ख़ाली इलाके में बम की तरह फोड़ देना चाहता हूँ
लेकिन मुझे डर है
इससे मेरे परिवार को भयानक यातना सहनी होगी
कोई नहीं है मेरे साथ
मेरे साथ मेरा देश नहीं है
एक भी आदमी नहीं है मेरे साथ
भगवा झंडा लहराते हुए कायरों को मैं
आदमियों की श्रेणी में नहीं रखता
मैं
एक गड्ढा खोदना चाहता हूँ
और उसमें जीवित समाधि ले लेना चाहता हूँ
लेकिन उसमें भी एक पेंच है श्रीमान –
कहीं वह वक़्फ़ की ज़मीन हुई तो ?
अभी कुछ दिनों पहले
मैं रामदेवरा (रुणिचा) यानी बीकानेर बाबा रामदेव के यहां सर झुकाने गया था
वहां एक तलवार बेचने वाले के पास जैसे ही मैं ठहरा
मेरे रिश्तेदार ने मुझे टोक दिया :
“जब सरकार अपनी है तो तलवार की ज़रूरत ही क्या है ?”
कितना विश्वास था मेरे रिश्तेदार की आंखों में
और आज मैं उस विश्वास को अपनी आंखों से टूटता हुआ देख रहा हूँ !
मैं जानता हूँ
यह कविता लंबी हो गई है
मैं जानता हूँ
यह कविता है ही नहीं
लेकिन कविता तो कुमार अंबुज भी लिखता है और आलोक धन्वा और विष्णु नागर और अविनाश मिश्र भी
जब कवियों के नाम पर इतना कूड़ा पहले से जमा है
तो मैं नया कूड़ा क्यों जमा करूं ?
क्षमा श्रीमान क्षमा !
लेकिन मैं फिर से उसी बात पर आता हूँ
और चीख-चीख कर कहता हूँ
अब कुछ नहीं कहना
दिमाग़ सुन्न पड़ चुका है
और मेरी दो अंगुलियों और अंगूठे का खतना हो चुका है
जिनसे मैं कलम पकड़ता हूँ !
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( मन मीत )