गुम हो गई एक चिठ्ठी-गोपाल सहर

कोई नहीं है कहीं मुन्तज़िर !

एक वो चिठ्ठी ही गुम नहीं हुई हैं।
बहुत कुछ गुम हो गया है चिठ्ठी के साथ-साथ।
ढूंढ़ता हूं यहां-वहां।
कुछ भी हाथ में नहीं आता है।
स्याही, कलम कहाँ चले गये हैं।
आंसू … झील-आँखें सूख गयी हैं….
पत्थर फेंकू….धूल उड़ेगी थोड़ी सी और बैठ जायेगी फिर से..
अब कोई बवण्डर भी नहीं उठता है हमारे अंदर।
सब जगह् राजनीति..
कदम दर कदम राजनीति….

( गोपाल सहर )

बोलो कब प्रतिकार करोगे-प्रसून जोशी

बोलो कब प्रतिकार करोगे
पूछ रहा अस्तित्व तुम्हारा
कब तक ऐसे वार सहोगे
बोलो कब प्रतिकार करोगे

अग्नि वृद्व होती जाती है
यौवन निर्झर छूट रहा है
प्रत्यंचा भर्रायी सी है
धनुष तुम्हारा टूट रहा है
कब तुम सच स्वीकार करोगे
बोलो कब प्रतिकार करोगे

कंपन है वीणा के स्वर में
याचक सारे छन्द हो रहे
रीढ गर्व खोती जाती है
निर्णय सारे मंद हो रहे
क्या अब हाहाकार करोगे
बोलो कब प्रतिकार करोगे

निमिर लिए रथ निकल पडा है
संसारी आक्रोश हो रहा
झूकता है संकल्प तुम्हारा
श्वेत धवल वह रोष खो रहा
कैसे सागर पार करोगे
बोलो कब प्रतिकार करोगे

कब तक रक्त मौन बैठेगा
सत्य कलश छलकाना होगा
स्वप्न बीज भी सुप्त हो रहा
धरा स्नान करना होगा
किस दिन तुम संहार करोगे
बोलो कब प्रतिकार करोगे
बोलो कब प्रतिकार करोगे

( प्रसून जोशी )

वे भी होती हैं कविताएँ-पूर्णिमा वर्मन

वे भी होती हैं कविताएँ
जो कहीं छपती नहीं
जिन्हें कोई नहीं पढ़ता

मोरपंख के साथ सोती हुई नोटबुक में
कभी कभी झाँकती हैं
पन्ने खुलने पर
घुल जाती हैं
मन की संवेदनाओं में गहरे

वे जीने की
वजह बनती हैं
संतोष के छप्पर रखते हुए हौले
वे रचनाकार को
मिट्टी होने से बचाती हैं
डायरी के आँगन में, पन्नों के चाक पर
उसकी मिट्टी को आकार देते हुए

( पूर्णिमा वर्मन )

બે હોળી કાવ્યો

(૧)
कौन रंग फागुन रंगे, रंगता कौन वसंत?
प्रेम रंग फागुन रंगे, प्रीत कुसुंभ वसंत।

चूड़ी भरी कलाइयाँ, खनके बाजू-बंद,
फागुन लिखे कपोल पर, रस से भीगे छंद।

फीके सारे पड़ गए, पिचकारी के रंग,
अंग-अंग फागुन रचा, साँसें हुई मृदंग।

धूप हँसी बदली हँसी, हँसी पलाशी शाम,
पहन मूँगिया कंठियाँ, टेसू हँसा ललाम।

कभी इत्र रूमाल दे, कभी फूल दे हाथ,
फागुन बरज़ोरी करे, करे चिरौरी साथ।

नखरीली सरसों हँसी, सुन अलसी की बात,
बूढ़ा पीपल खाँसता, आधी-आधी रात।

बरसाने की गूज़री, नंद-गाँव के ग्वाल,
दोनों के मन बो गया, फागुन कई सवाल।

इधर कशमकश प्रेम की, उधर प्रीत मगरूर,
जो भीगे वह जानता, फागुन के दस्तूर।

पृथ्वी, मौसम, वनस्पति, भौरे, तितली, धूप,
सब पर जादू कर गई, ये फागुन की धूल।

( दिनेश शुक्ल )

(૨)
चेतन खेले होरी
सत्य भूमि, छिमा बसन्त में
समता प्राण प्रिया संग गोरी
चेतन खेले होरी

मन को माट, प्रेम को पानी
तामें करुना केसर घोरी
ज्ञान-ध्यान पिचकारी भरी-भरि
आप में छारैं होरा-होरी
चेतन खेले होरी

गुरु के वचन मृदंग बजत हैं
नय दोनों डफ लाल कटोरी
संजम अतर विमल व्रत चोवा
भाव गुलाल भरैं भर झोरी
चेतन खेले होरी

धरम मिठाई तप बहु मेवा
समरस आनन्द अमल कटोरी
द्यानत सुमति कहे सखियन सों
चिर जीवो यह जुग-जुग जोरी
चेतन खेले होरी

( कविवर द्यानतराय )

प्रेम कविता-गीत चतुर्वेदी

आत्महत्या का बेहतरीन तरीका होता है
ईच्छा की फिक्र किए बिना जीते चले जाना
पाँच हजार वर्ष से ज्यादा हो चुकी है मेरी आयु
अदालत में अब तक लम्बित है मेरा मुकदमा
सुनवाई के ईन्तजार से बडी सजा और क्या

बेतहाशा दुखती है कलाई के उपर एक नस
हृदय में उस कृत्य के लिए क्षमा उमडती है
जिसे मेरे अलावा बाकी सबने अपराध माना

ताजीरात-ए-हिन्द में ईस पर कोई दफा नहीं

( गीत चतुर्वेदी )

असंबध्द-गीत चतुर्वेदी

कितनी ही पीडाएँ हैं
जिनके लिए कोई ध्वनि नहीं
ऐसी भी होती है स्थिरता
जो हूबहू किसी द्र्श्य में बँधती नहीं

ओस से निकलती है सुबह
मन को गीला करने की जिम्मेदारी उस पर है
शाम झाँकती है वारिश से
बचे-खुचे को भिगो जाती है

धूप धीरे-धीरे जमा होती है
कमीज और पीठ के बीच की जगह में
रह-रहकर झुलसाती है

माथा चूमना
किसी की आत्मा चूमने जैसा है
कौन देख पाता है
आत्मा के गालों को सुर्ख होते

दुख के लिए हमेशा तर्क तलाशना
एक खराब किस्म की कठोरता है

( गीत चतुर्वेदी )

मेरे वक्त का एक अहम सवाल-गीत चतुर्वेदी

मैं बुदबुदाता हूँ
और मेरी आवाज नहीं सुनी जाती
मैं फिर कहता हूँ कुछ शब्द
और इन्तजार करता हूँ
कुछ आवाजें फिर निकलती हैं मेरे कंठ से
वे मेरी ओर देखते हैं और
वापस काम में लग जाते हैं
मैं बोलते समय अपने हाथ भे हिलाता हूँ
खट-खट जमीन पर ठोंकता हूँ अपने जूते
चुटकी बजाता हूँ, ताली पीटता हूँ, एक सीटी भी मार देता हूँ
तीन शब्द में होना था काम
तीन लाख शब्द जाया हो गए

क्या मुझे जोर से चिल्लाना चाहिए ?

( गीत चतुर्वेदी )

कब तुम बात करोगे-चिनु मोदी

हम से कब तुम बात करोगे
खामोशी बरखास्त करोगे ? हम से…

बेसब्री से इंतेझार है
गुलशन गुलशन यार यार है
सन्नाटे की सोट सोय है
यार, सितारे बेशुमार है-

ऐसे में भी रसम निभा कर
तन्हाई तहेनात करोगे ? हम से…

यादों का सैलाब नहीं है
जीने का असबाब नहीं है,
तेरी गली से गुजरा लेकिन
परछांई बेताब नहीं है,
तेरा मेरा रिश्ता बुढ्ढा
कब तक तुम बरदास्त करोगे ?हम से…

एक शिकस्ता दिल को लेकर
भटक रहा है तन्हा तन्हा
ऊंची ऊंची दीवारे है
मैं नाटा और नन्हा नन्हा;
हम दोनों का खेल पुराना
फिर तुम मुज से म्हात करोगे ? हम से…

दस्तक देने की मत सोचो
द्वार ढकेलो, अंदर आओ,
आंखे कब की खूली खूली है
डाका डालो, नींद चुराओ-
दु:ख देने की चाहत अब भी ?
सांसो की खैरात करोगे ? हम से…

( चिनु मोदी )

एक ही राह-इमरोज़

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सामने कई राहें दिख रही थी
मगर कोई राह ऐसी न थी
जिसके साथ मेरा अपना आप चल सके
सोचता कोई हो मंजिल जैसी राह…

वह मिली तो जैसे
एक ज्म्मीद मिली जिन्दगी की
यह मिलन चल पडा
हम अकसर मिलने लगे और मिलकर चलने लगे
चुपचाप कुछ कहते, कुछ सुनते
चलते-चलते कभी-कभी
एक-दूसरे को देख भी लेते

एक दिन चलते हुए
उसने अपने हाथों की उंगलियां
मेरे हाथों की उंगलियों में मिला कर
मेरी तरफ ईस तरह देखा
जैसे जिन्दगी एक बुझारत पूछ रही हो
कि बता तेरी उंगलियां कौन-सी है
मैंने उसकी तरफ देखा
और नजर से ही उससे कहा…
सारी उंगलियां तेरी भी सारी उंगलियां मेरी भी

एक तारीखी इमारत के
बगीचे में चलते हुए
मेरा हाथ पकड कर कुछ ऐसे देखा
जैसे पूछ रही हो इस तरह मेरे साथ
तू कहां तक चल सकता है ?
मैंने कितनी ही देर
उसका हाथ अपने हाथ में दबाए रखा
जैसे हथेलियों के रास्ते जिन्दगी से कह रहा होऊं
जहां तक तुम सोच सको-

कितने ही बरस बीत गए इसी तरह चलते हुए
एक-दूसरे का साथ देते हुए साथ लेते हुए
इस राह पर
इस मंजिल जैसी राह पर…

( इमरोज़ )

बोलते नयन-नक्श वाली-ईमरोज

कल रात सपने में
एक औरत देखी
जिसे मैंने पहले कभी नहीं देखा था
पर मिलते ही लगा
कि ईस बोलते नयन-नक्श वाली औरत को
कहीं देखा भी हुआ है
हो न हो यह वही है
जो मेरी कल्पनाओं के बाग में
अक्सर आ कर
फूलों से खेलती दिखती रही
जहां मिले थे
वह जगह बहुत नई थी-
मेरे लिए
पर बहुत हरी भरी
फूलों से टहलते हुए
पता ही नहीं लगा
कब उसका घर आ गया

उसका घर भी
बोलते नयन-नक्श वाली की तरह
बोल रहा था-
गिनती की सिर्फ जरुरी चीजें
घर की सजावट भी थीं
और जरुरत भी
फालतू चीजें घर में कहीं भी
न होने के कारण
घर खुला-खुला लग रहा था-
खूबसूरत, दिलचस्प और सादा
अपनी तरफ का एक ही

बिल्कुल अपनी घर वाली जैसा
जहां सादगी खूबसूरती को बढा रही थी
और खूबसूरती सादगी को
अमीरी फकीरी दोनों उसके स्वभाव में दिख रही हैं
वह कविता लिखती है
लिखकर हवा के हवाले कर देती है

रात बीत गई है
पर सपना नहीं बीता
वह अभी भी बोलते नतन-नक्श वाली के साथ
कहीं चल रहा है…

( ईमरोज )