विनोद कुमार शुक्लजी को विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

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सुप्रसिद्ध कवि-कथाकार, साहित्य अकादेमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल जी (1937-2025) को विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

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उनकी सरल भाषा में गहन जीवन दर्शन वाली रचनाएँ, जैसे ‘नौकर की कमीज’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, हमें हमेशा प्रेरणा देती रहेंगी।

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(१)

रात दस मिनट की होती

तो पाँच मिनट में आधी रात हो जाती –

रातें ऐसी ही बीतीं

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दिन दस मिनट का होता

तो पाँच मिनट में आधा दिन बीत जाता –

दिन ऐसे ही बीते

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मै दो दिन की जिंदगी जी सकता हूँ

एक दिन मै तुम्हारे पास रहूँगा

दूसरे दिन तुम मेरे पास रहना

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(२)

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

व्यक्ति को मैं नहीं जानता था

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हताशा को जानता था

इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया

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मैंने हाथ बढ़ाया

मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ

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मुझे वह नहीं जानता था

मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था

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हम दोनों साथ चले

दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे

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साथ चलने को जानते थे।

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(३)

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे

मैं उनसे मिलने

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उनके पास चला जाऊँगा।

एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर

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नदी जैसे लोगों से मिलने

नदी किनारे जाऊँगा

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कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा

पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब

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असंख्य पेड़ खेत

कभी नहीं आएँगे मेरे घर

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खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने

गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।

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जो लगातार काम में लगे हैं

मैं फ़ुरसत से नहीं

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उनसे एक ज़रूरी काम की तरह

मिलता रहूँगा—

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इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह

सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।

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(४)

प्रेम की जगह अनिश्चित है

यहाँ कोई नहीं होगा की जगह भी कोई है।

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आड़ भी ओट में होता है

कि अब कोई नहीं देखेगा

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पर सबके हिस्से का एकांत

और सबके हिस्से की ओट निश्चित है।

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वहाँ बहुत दुपहर में भी

थोड़ी-सा अँधेरा है

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जैसे बदली छाई हो

बल्कि रात हो रही है

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और रात हो गई हो।

बहुत अँधेरे के ज़्यादा अँधेरे में

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प्रेम के सुख में

पलक मूँद लेने का अंधकार है।

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अपने हिस्से की आड़ में

अचानक स्पर्श करते

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उपस्थित हुए

और स्पर्श करते हुए विदा।

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(५)

अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं

और पूरा आकाश देख लेते हैं

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सबके हिस्से का आकाश

पूरा आकाश है।

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अपने हिस्से का चंद्रमा देखते हैं

और पूरा चंद्रमा देख लेते हैं

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सबके हिस्से का चंद्रमा वही पूरा चंद्रमा है।

अपने हिस्से की जैसी-तैसी साँस सब पाते हैं

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वह जो घर के बग़ीचे में बैठा हुआ

अख़बार पढ़ रहा है

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और वह भी जो बदबू और गंदगी के घेरे में ज़िंदा है।

सबके हिस्से की हवा वही हवा नहीं है।

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अपेन हिस्से की भूख के साथ

सब नहीं पाते अपने हिस्से का पूरा भात

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बाज़ार में जो दिख रही है

तंदूर में बनती हुई रोटी

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सबके हिस्से की बनती हुई रोटी नहीं है।

जो सबकी घड़ी में बज रहा है

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वह सबके हिस्से का समय नहीं है।

इस समय।

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(६)

आँख बंद कर लेने से

अंधे की दृष्टि नहीं पाई जा सकती

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जिसके टटोलने की दूरी पर है संपूर्ण

जैसे दृष्टि की दूरी पर।

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अँधेरे में बड़े सवेरे एक खग्रास सूर्य उदय होता है

और अँधेरे में एक गहरा अँधेरे में एक गहरा अँधेरा फैल जाता है

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चाँदनी अधिक काले धब्बे होंगे

चंद्रमा और तारों के।

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टटोलकर ही जाना जा सकता है क्षितिज को

दृष्टि के भ्रम को

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कि वह किस आले में रखा है

यदि वह रखा हुआ है।

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कौन से अँधेरे सींके में

टँगा हुआ रखा है

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कौन से नक्षत्र का अँधेरा।

आँख मूँदकर देखना

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अंधे की तरह देखना नहीं है।

पेड़ की छाया में, व्यस्त सड़क के किनारे

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तरह-तरह की आवाज़ों के बीच

कुर्सी बुनता हुआ एक अंधा

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संसार से सबसे अधिक प्रेम करता है

वह कुछ संसार स्पर्श करता है और

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बहुत संसार स्पर्श करना चाहता है।

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(७)

मैं स्वभाविक मौत तक ज़िंदा रहना चाहता हूं

अगर रोज़ कर्फ्यू के दिन हों
तो कोई अपनी मौत नहीं मरेगा
कोई किसी को मार देगा
पर मैं स्वाभाविक मौत मरने तक
ज़िन्दा रहना चाहता हूँ
दूसरों के मारने तक नहीं
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और रोज़ की तरह अपना शहर
रोज़ घूमना चाहता हूँ
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शहर घूमना मेरी आदत है
ऐसी आदत कि कर्फ्यू के दिन भी
किसी तरह दरवाज़े खटखटा कर
सबके हालचाल पूछूँ
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हो सकता है हत्यारे का
दरवाज़ा भी खटखटाऊँ
अगर वह हिन्दू हुआ
तो अपनी जान
हिन्दू कह कर न बचाऊँ
मुसलमान कहूँ
.
अगर मुसलमान हुआ
तो अपनी जान
मुसलमान कह कर न बचाऊँ
हिन्दू कहूँ
.
हो सकता है इसके बाद भी
मेरी जान बच जाय
तो मैं दूसरों के मारने तक नहीं
अपने मरने तक जिन्दा रहूँ
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(विनोद कुमार शुक्ल)

॥ मेमनों से कोई नहीं करता प्यार ॥-राजेश्वर वशिष्ठ

ठिठुरती रात में

लकड़ी और पुआल से बने घर में

जब चरवाहा ओढ़ कर सोता है

गरम ऊन का कम्बल;

ठंड में काँपती हैं

बाहर बाड़े में बंद बत्तीस मेमनों की आत्माएँ।

मेमने ज़िंदगी भर बँधे रहते हैं

अपनी क़ैद की गंध से।

मेमनों के सपनों में

कोई नहीं आता मुहब्बत लुटाने;

वे रोज़ देखते हैं एक बड़ी-सी कैंची

और अपनी उधड़ती हुई पीठ।

सुबह की धूप उन्हें ओढ़ाती है

चाँदी का कुनमुना दुशाला।

जब भूख नोचने लगती है पेट की आँतें;

वे पंक्तिबद्ध होकर हरी घास की खोज में

नरम-नरम क़दमों से

जा पहुँचते हैं किसी बुग्याल तक!

मेमनों की दुनिया एक-सी रहती है सदा;

पहाड़ी चरवाहे का बाड़ा हो या

दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र,

श्रम हो या मुलायम क़ीमती पश्मीना

मज़दूर और भेड़ के लिए

उसका कोई अर्थ नहीं।

सुनेत्रा,

रक्तिम आकाश के नीचे

वे मेमने अब भी भटक रहे हैं

किसी स्नेहिल स्पर्श के लिए;

वे नहीं जानते हमारी दुनिया में,

मेमनों से कोई नहीं करता प्यार!

( राजेश्वर वशिष्ठ )

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|| ઘેટાં ||

હાડ ઠુંઠવતી રાત્રિમાં
ડાંખળી અને તણખલાંથી બનેલ ઝૂંપડીમાં
જ્યારે ગોવાળ ઓઢીને સુએ છે
ગરમ ઊનનો ધાબળો
બહાર વાડામાં કેદ બત્રીસ ઘેટાંનો આત્મા
ઠંડીથી થરથર કંપે છે

ઘેટાં જીવનભર બંધાયેલા રહે છે
પોતાની વાડાની ગંધ સંગે
એમના સપનામાં
કોઈ નથી આવતું પ્રેમ વહેંચવા
એ રોજ જુએ એક મોટી કાતર
અને પોતાની ઉતરડાઈ રહેલી પીઠ

સવારનો તડકો
એમને ઓઢાડે
ચમકતી મુલાયમ ચાદર
જ્યારે ભૂખથી વલોવાય એમના આંતરડાં
એ બધાં કતારબંધ
કૂણા ઘાસની તલાશમાં
હળવા પગલે
જઈ પહોંચે કોઈક ચરિયાણ લગી

ઘેટાંની દુનિયા એકસરખી જ રહે સદાય
પહાડી ગોવાળનો વાડો હોય કે
દુનિયાનું સૌથી મોટું લોકતંત્ર
શ્રમ હો કે મુલાયમ મૂલ્યવાન ઊન
મજૂર કે ઘેટા માટે એનો કોઈ અર્થ નથી

સુનેત્રા,
રક્તિમ આભ હેઠળ
જે ઘેટાં હજુ પણ ભટકે છે
કોઈ સ્નેહાળ સ્પર્શ માટે
એમને ખબર નથી

આપણી દુનિયામાં
ઘેટાંને નથી ચાહતું કોઈ…

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( રાજેશ્વર વશિષ્ઠ )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

छठ पर्व : मनमीत के नौ शब्द चित्र

1.

अगले जन्म में

बिहारी बनाना प्रभु

अपनी मातृभूमि से दूर कमाने भेजना

ट्रेन में लद कर

बस में फंस कर

घर लौटने देना प्रभु

इतना पैसा मत देना

कि दिल्ली से उडूं

और पटना उतर जाऊं!

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2.

सूरज और पानी की दोस्ती का यह पर्व

मुझे बहुत अपना लगता है –

सीने में

दर्द का एक सूरज लिए

आँखों में आए आंसुओं को बुझाने का

पुराना खिलाड़ी रहा हूँ मैं!

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3.

आज जब पूर्वांचल की एक सुहागिन को

ठेठ मांग से लेकर

नाक तक केसरिया सिंदूर में देखा

तो मैंने अपनी पत्नी से कहा :

मत लगाया करो यह लिक्विड सिंदूर…

लाओ!

पिछली होली का ग़ुलाल बचा होगा

मैं तुम्हें मांग भरना सिखाता हूँ…

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4.

चाहे राजस्थान की सीमा मिश्रा हो

या आसाम का ज़ुबिन गर्ग

या बिहार की शारदा सिन्हा :

गीत वही हैं

बस कंठ बदल जाते हैं!

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5.

मैं

पानी में जब भी कमर तक डूबा

आत्महत्या की इच्छा सर उठाने लगी –

अगर बिहारियों को

पानी में कमर तक डूबकर

सूरज को अर्घ्य देते नहीं देखता

तो आत्महत्या की इस इच्छा में..

नाक तक डूब जाता!

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6.

“खरना” हो चाहे “परना” हो..

हे छठी मैया हमें तेरा सरणा हो!

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7.

आप दुनियादार लोग हैं

आप सूरज की पूजा करते हैं –

मैं एक कवि मन हूँ

मैं चाँद की पूजा करता हूँ –

रौशनी का आधा पुल

धूप से बनता है

और आधा चांदनी से!

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8.

एक घाट है

उस पर स्त्रियां हैं

फलों की टोकरियां हैं

सूरज है

पानी में उसकी किरणेँ हैं

अगरबत्तियों और दीपकों का धुआं है

गीत हैं

कंठ हैं

आभार है

भावुकता है

केवल यह भी बचा रहे

तो पूर्वांचल वाले

धरती पर प्रलय के बाद

नई सृष्टि बसा सकते हैं!

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9.

बिहारियों को देखता हूँ

तो ऐसा लगता है

इन्होंने अपनी जड़ों को सींचकर

यह आकाश कमाया है

लेकिन

इतना कमज़ोर क्यों समझ लिया गया

जड़ों को सींचने वाले

इन महान धरती पुत्रों को?

कि इन्हें

घास बना दिया गया

जिस पर सौ-दो सौ रुपये दिहाड़ी चढ़ा कर

साला कोई मसल देना चाहता है!

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( मनमीत सोनी )

आविष्कार-कुमार सुरेश

एक छोटी बच्ची को

नहलाकर यूनिफार्म पहनाना

बनाकर विद्यार्थी स्कूल भेजना

आविष्कार है

मेधा के नए पुंज का

किसी शब्द को

अर्थ के नए वस्त्र पहनाना

कविता का रूप देना

आविष्कार है

शब्द के

नए

सामर्थ्य का

जो सब कह रहे हों

क्योंकि कह रहा है

कोई ख़ास एक

से हटकर अलग

वह कहना

जो अंतरात्मा की आवाज़ हो

आविष्कार है

नए सत्य का

इस बात पर

अटूट विश्वास करना

कि सब कुछ कभी ख़त्म नहीं होगा

आविष्कार है

अपने ही नए अस्तित्व का

ये सभी आविष्कार मैं

रोज करना चाहता हूँ

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( कुमार सुरेश )

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|| આવિષ્કાર ||

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એક નાનકડી બાળકીને

નવડાવી, યુનિફોર્મ પહેરાવી, વિદ્યાર્થીની બનાવી સ્કૂલે મોકલવી

એ આવિષ્કાર છે

મેધાના નવા પુંજનો

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કોઈક શબ્દને

અર્થના નવા વાઘા પહેરાવી

કવિતાનું સ્વરૂપ આપવું

એ આવિષ્કાર છે

શબ્દના નવા સામર્થ્યનો

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જે બધા કહી રહ્યા હોય –

કેમ કે કોઈ એક ખાસ વ્યક્તિ કહે છે –

એનાથી હટીને એવી વાત કહેવી

જે અંતરાત્માનો અવાજ હોય

એ આવિષ્કાર છે

નવા સત્યનો

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એ વાત પર

અતૂટ વિશ્વાસ હોવો

કે બધું ક્યારેય ખતમ નહીં થાય

એ આવિષ્કાર છે

પોતાના જ નવા અસ્તિત્વનો

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હું આ બધાં આવિષ્કાર

દરરોજ

કરવા

ચાહું છું…

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( કુમાર સુરેશ )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

घर-देवेन्द्र आर्य

लौटूंगा

बार बार लौटूंगा

लौटने के लिए ही होता है घर

घर न हो तो लौटना कहाँ?

लौटना न हो तो जाना कहाँ?

एक घर ही तो है

जहाँ से जाया जा सकता है कहीं

जहाँ लौटा जा सकता है

कहीं से भी

कभी भी

घर है तो इंतज़ार है

इंतज़ार ही घर है

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( देवेन्द्र आर्य )

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|| ઘ ર ||

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પાછો ફરીશ
વારંવાર પાછો ફરીશ

પાછા ફરવા માટે જ તો હોય છે ઘર
ઘર ન હો તો પાછા ફરવું ક્યાં ?

એક ઘર જ તો છે
જ્યાંથી કશે પણ જઈ શકાય
જ્યાં પાછા ફરી શકાય
ક્યાંયથી પણ
ક્યારેય પણ

ઘર છે તો પ્રતીક્ષા છે

પ્રતીક્ષા એ જ ઘર છે..

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( દેવેન્દ્ર આર્ય )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

खिड़की वाली सीट-मोनिका कुमार

जीवन में ख़ुशी के लिए कम ही चाहिए होता है,

वह कम कई बार बस इतना होता है

हमें जब बसों, गाड़ियों और जहाज़ों में यात्रा करनी हो,

तो हम इतने भाग्यशाली हों,

कि हमें खिड़की वाली सीट मिल जाए,

हम टिकट लेकर

बग़ैर सहयात्रियों से उलझे,

सामान सुरक्षित रखने के बाद,

आसानी से अपनी खोह में जा सकें।

घर से निर्जन के बीच ऐसी जगहें बमुश्किल होती हैं

जहाँ हम फूल जैसी हल्की नींद ले सकें

सैकड़ों पेड़ झुलाए नींद को,

या बादलों की सफ़ेदी ले जाए निर्वात की ओर।

इस छोटी-सी नींद से जगना चमत्कार जैसा है,

यह नींद हमारे छीजे हुए मन को सिल देती है

इस नींद से जग कर,

जैसे हम इस हैसियत में लौट सकें,

और ख़ुद से एक बार फिर पूछें,

कि हम कौन हैं,

भले इस प्रश्न के उत्तर में,

हम फूट-फूट कर रो पड़ें।

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( मोनिका कुमार )

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|| વિન્ડો સીટ ||

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જીવનમાં સુખ માટે

બહુ ઓછું જોઈએ

આ ઓછું ક્યારેક તો બસ એટલું

કે બસ, ટ્રેન કે જહાજમાં મુસાફરી કરતા હોઈએ

ત્યારે એવા ભાગ્યશાળી હોઈએ

કે આપણને બારીવાળી સીટ મળે

આપણે આપણી ટિકિટ લઈ

સહયાત્રીઓ સાથે જીભાજોડી વિના

સામાન ગોઠવી

સહેલાઈથી આપણી કંદરામાં છુપાઈ જઈએ

ઘરથી માંડી રણ લગી આવી જગા મુશ્કેલીથી મળે

જ્યાં આપણે ફૂલ – શી હળવી નીંદર માણીએ

સેંકડો વૃક્ષ એ નીંદરને ઝુલાવે

અથવા વાદળની ધવલતા લઈ જાય શૂન્ય તરફ

એ સંક્ષિપ્ત ઊંઘમાંથી જાગવું ચમત્કાર જેવું લાગે

એ ઊંઘ આપણા ફાટેલા મનને સીવી દે જાણે

એ ઊંઘમાંથી જાગી

જાણે આપણે મૂળ હસ્તીમાં પાછા ફરીએ

અને સ્વયંને એક વાર ફરી પૂછીએ

‘ કોણ છું હું ? ‘

ભલે એ પ્રશ્નના ઉત્તરમાં

આપણે ધ્રુસ્કે – ધ્રુસ્કે રડી પડીએ..

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( મોનિકા કુમાર )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

मेरे एकांत का प्रवेश-द्वार-निर्मला पुतुल

यह कविता नहीं

मेरे एकांत का प्रवेश-द्वार है

यहीं आकर सुस्ताती हूँ मैं

टिकाती हूँ यहीं अपना सिर

ज़िंदगी की भाग-दौड़ से थक-हारकर

जब लौटती हूँ यहाँ

आहिस्ता से खुलता है

इसके भीतर एक द्वार

जिसमें धीरे से प्रवेश करती मैं

तलाशती हूँ अपना निजी एकांत

यहीं मैं वह होती हूँ

जिसे होने के लिए मुझे

कोई प्रयास नहीं करना पड़ता

पूरी दुनिया से छिटककर

अपनी नाभि से जुड़ती हूँ यहीं!

मेरे एकांत में देवता नहीं होते

न ही उनके लिए

कोई प्रार्थना होती है मेरे पास

दूर तक पसरी रेत

जीवन की बाधाएँ

कुछ स्वप्न और

प्राचीन कथाएँ होती हैं

होती है—

एक धुँधली-सी धुन

हर देश-काल में जिसे

अपनी-अपनी तरह से पकड़ती

स्त्रियाँ बाहर आती हैं अपने आपसे

मैं कविता नहीं

शब्दों में ख़ुद को रचते देखती हूँ

अपनी काया से बाहर खड़ी होकर

अपना होना!

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( निर्मला पुतुल )

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|| મારા એકાંતનું પ્રવેશ દ્વાર ||

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આ કવિતા નથી

મારા એકાંતનું પ્રવેશ દ્વાર છે

અહીં આવીને લંબાવું છું હું

અહીં જ ટેકવું છું મારું માથું

જીવનની ભાગદોડથી થાકી – હારી

જ્યારે પાછી ફરું છું અહીં

ધીમેકથી ઊઘડે છે

એની અંદર એક દ્વાર

જેમાં હળવેથી પ્રવેશી

હું શોધું છું મારું અંગત એકાંત

અહીં જ

હું

એ હોઉં છું

જે હોવા માટે

મારે કોઈ પ્રયત્ન નથી કરવો પડતો

આખી દુનિયાથી છટકીને

પોતાની નાભિનાળ સંગે જોડાઉં છું અહીં

મારા એકાંતમાં

દેવી – દેવતા નથી હોતા

ન તો એમના માટે

કોઈ પ્રાર્થના હોય મારી પાસે

હોય છે દૂર લગી પ્રસરેલો રેત – સાગર

જીવનની અડચણો

થોડાંક સપના

અને પ્રાચીન કથાઓ

હોય છે

એક અસ્પષ્ટ તરજ

પ્રત્યેક યુગમાં જેને

પોતપોતાની રીતે ઝીલતાં

સ્ત્રીઓ જાતમાંથી બહાર આવે છે

હું કવિતા નહીં

શબ્દોમાં સ્વયંને રચતી

જોઉં છું

પોતાના શરીરથી બહાર ઊભી – ઊભી

પોતાનું અસ્તિત્વ…

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( નિર્મલા પુતુલ )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

जले मन पर एक फूँक-सुनीता करोथवाल

बचपन में घर में दवाई का कोई डिब्बा नहीं था
बस एक फूँक थी
जरा भी दर्द होता
एकदम उनके मुँह से निकलती बिन सोचे समझे।

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मैं नाजुक सी थी
चलते, उठते, बैठते रोज चोट खाती
बाबा कहते अरे देख तो कीड़ी मार दी
मुझे उसके मरने का अफ़सोस होता
बाबा फूटे घुटने पर तब फूँक मारते
और मैं भूल जाती सबकुछ।

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माँ चुन्नी पर भफारा भर मेरी आँख सेंकती थी
एक-दो-तीन-चार कर कहती
देख वे आए तेरे मामा के मोर
सब रड़क भूल मैं आसमान निहारती थी।
माँ की फूँक गर्माहट से भर देती थी मुझे।

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फूँक कभी फूटी कोहनी पर लगती मरहम सी
कभी भाई की टोक पर झाड़ा बन
कभी चूल्हा सुलगाती
कभी दीवा बुझाती
कभी मोमबत्ती की लौ के बाहर-बाहर घूमती थी
कोई सूल भी चुभती तो बहनें फूँक ही मारती थी
जले हाथ पर भी फूँक बर्फ का काम करती रही।

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मेरे आस-पास कितनी फूँक थी।

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माँ! मन जलाए बैठी हूँ कुछ दिन से
नया जमाना है
शायद कोई फूँक असर करे
तुम करो ना कुछ।

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 ( सुनीता करोथवाल )

|| દાઝ્યા મન પર એક ફૂંક ||

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નાનપણમાં ઘરે કોઈ દવાનો ડબ્બો નહોતો
બસ એક ફૂંક હતી
સ્હેજ પણ દુઃખાવો હોય
અનાયાસ માબાપના મોઢેથી નીકળતી
કશું વિચાર્યા વિના

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હું નાજુક હતી
ચાલતાં, ઊઠતાં, બેસતાં વાગતું રહેતું
બાપુ કહેતા, ” અરે જો કીડી મરી ગઈ “
મને કીડી મરી જવાનો અફસોસ થતો
બાપુ ઇજા પામેલા ઘૂંટણ પર ફૂંક મારતા
અને હું ભૂલી જતી બધી પીડા

.

બા પાલવમાં ફુંક ભરી મારી આંખને શેક કરતી
‘ એક બે ત્રણ ચાર ‘ બોલી કહેતી
જો, આવ્યા તારા મામાના મોર
હું રડવું ભૂલી આકાશ તરફ જોતી
માની ફૂંક ગરમાવાથી ભરી દેતી મને

.

ફૂંક ક્યારેક ઇજાગ્રસ્ત કોણી પર મલમનું કામ કરતી
ક્યારેક ભાઈને નજર લાગે ત્યારે ઝાડફૂંકનું
ક્યારેક એ ચૂલો સળગાવતી
ક્યારેક દીવો ઓલવતી
ક્યારેક મીણબત્તીની શિખાની આસપાસ ઘુમરાતી
કોઈ શૂળ જેવું ભોંકાતું તો પણ બહેનો ફૂંક જ મારતી
દાઝ્યા હાથ પર પણ ફૂંક બરફનું કામ કરતી

.

મારી આસપાસ કેટલી બધી ફૂંક હતી

.

મા ! મન દઝાડી બેઠી છું થોડાક દિવસથી
નવો જમાનો છે
કદાચ કોઈક ફૂંક અસર કરે
તું કર ને કશુંક…

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.( સુનીતા કરોથવાલ )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

कभी आ भी जाना-गुलज़ार

कभी आ भी जाना
बस वैसे ही जैसे
परिंदे आते हैं आंगन में
या अचानक आ जाता है
कोई झोंका ठंडी हवा का
जैसे कभी आती है सुगंध
पड़ोसी की रसोई से

.

आना जैसे बच्चा आ जाता
है बगीचे में गेंद लेने
या आती है गिलहरी पूरे
हक़ से मुंडेर पर

..

जब आओ तो दरवाजे
पर घंटी मत बजाना
पुकारना मुझे नाम लेकर
मुझसे समय लेकर भी मत आना
हाँ , अपना समय साथ लाना
फिर दोनों समय को जोड़
बनाएंगे एक झूला
अतीत और भविष्य के बीच
उस झूले पर जब बतियाएंगे
तो शब्द वैसे ही उतरेंगे
जैसे कागज़ पर उतरते हैं
कविता बन

.

और जब लौटो तो थोड़ा
मुझे ले जाना साथ
थोड़ा खुद को छोड़े जाना
फिर वापस आने के लिए
खुद को एक-दूसरे से पाने
के लिए।

.( गुलज़ार )

.

ક્યારેક એવી રીતે પણ આવ
જેમ
પંખી આવે ફળિયામાં
અથવા
જેમ અચાનક આવે
કોઈ ઠંડી હવાની લ્હેરખી
જેમ ક્યારેક આવે
પડોશમાંથી રસોઈની સોડમ

.

આવ એ રીતે
જેમ બાળક દોડતું આવે
બગીચામાં દડો લેવા
અથવા આવે ખિસકોલી
સંપૂર્ણ અધિકારપૂર્વક
ઘરની પાળીએ

.

જ્યારે આવ ત્યારે
દરવાજે બેલ વગાડીશ નહીં
પોકારજે મારું નામ
સમય નક્કી કરીને પણ ન આવીશ
હા
પોતાનો સમય સાથે લાવજે
પછી બંનેનો સમય જોડીને
બનાવીશું એક હિંચકો
અતીત અને ભવિષ્યની વચ્ચે
એ હીંચકા પર બેસી જ્યારે ગપાટા મારીશું
ત્યારે શબ્દો એમ ઉતરી આવશે
જાણે કવિતા

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અને જ્યારે પાછો ફર
તો થોડોક મને લઈ જજે સાથે
થોડોક સ્વયંને છોડી જજે અહીં
ફરી પાછા ફરવા માટે

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અને સ્વયંને એકમેક થકી પામવા માટે..

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( ગુલઝાર )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

असभ्य हूँ-गोविंद माथुर

मैं असभ्य हूँ क्योंकि

औपचारिक गोष्ठियों में बैठकर

सहित्य, कला, संस्कृति पर

बात नहीं करता

मेरे चेहरे से आभिजात्य नहीं टपकता

मैं कहीं से भी

बुद्धिजीवी नहीं लगता

मैं असभ्य हूँ क्योंकि

मैं हिंदी माध्यम स्कूल में पढ़ा हुआ हूँ

मैं औपचारिक होने का नाटक नहीं कर सकता

शिक्षित लोगों में बैठकर

बात-बात में अँग्रेज़ी शब्दों का

उच्चारण नहीं करता

मैं असभ्य हूँ क्योंकि

मैं व्यवहार कुशल नहीं हूँ

मैं व्यक्तियों का उपयोग करना नहीं जानता

संबंधों को भुनाना मुझे नहीं आता

मुझमें प्रभावित करने के

गुण नहीं हैं न ही मैं

उपयोगी प्राणी हूँ

मैं असभ्य हूँ क्योंकि

मैं झूठ नहीं बोलता

किसी को गाली नहीं देता

किसी को हिक़ारत से नहीं देखता

किसी की चापलूसी नहीं करता

मैं असभ्य हूँ क्योंकि

मैं भावुक हूँ संवेदनशील हूँ

मैं ठहाका लगाकर हँसता हूँ

कभी-कभी

लोगों के बीच रो भी देता हूँ

मुझे सभ्य लोगों के

बीच बैठना नहीं आता

क्योंकि मैं असभ्य हूँ

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( गोविंद माथुर )

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હું અસભ્ય છું

કેમ કે

ઔપચારિક ગોષ્ઠીઓમાં બેસી

સાહિત્ય, કળા, સંસ્કૃતિ વિષે

ચર્ચા નથી કરતો

મારા ચહેરેથી આભિજાત્ય નથી ટપકતું

હું કોઈ રીતે બુદ્ધિજીવી નથી લાગતો

હું અસભ્ય છું

કેમ કે

હું સ્થાનિક માધ્યમમાં ભણ્યો છું

હું ઔપચારિકતાનું નાટક નથી કરી શકતો

શિક્ષિત લોકો વચ્ચે બેસી

વાતવાતમાં અંગ્રેજી શબ્દોનું ઉચ્ચારણ નથી કરી શકતો

હું અસભ્ય છું

કારણ કે

હું વ્યવહાર કુશળ નથી

મને માણસનો ઉપયોગ કરતાં આવડતું નથી

સંબંધો વટાવતાં આવડતું નથી

મારામાં સામા માણસને પ્રભાવિત કરવાનો ગુણ નથી

ન તો હું ઉપયોગી પ્રાણી છું

હું અસભ્ય છું

કારણ કે

હું જૂઠ બોલતો નથી

કોઈને ગાળ આપતો નથી

કોઈને તિરસ્કારથી જોતો નથી

કોઈની ચાપલુસી કરતો નથી

હું અસભ્ય છું

કારણ કે

હું ભાવુક છું

સંવેદનશીલ છું

મોટેથી હસું છું

ક્યારેક તો લોકો વચ્ચે

રડી પણ લઉં છું

મને સભ્ય લોકો સાથે ફાવતું નથી

કારણ કે

હું અસભ્ય છું…

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( ગોવિંદ માથુર, – હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )