She Live On-Uma Trilok

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मेरी किताब “She Live On“ के पन्नो से…
मैंने एक बार इमरोज़ जी से पूछा, “ इमरोज़ जी, अमृता जी को उनके लेखन पर, उनकी शख़्सियत पर इतनी वाह वाही मिलती है और आपको कई बार कुछ लोग पहचानते तक भी नहीं, आपको बुरा नहीं लगता ? “
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तब वह हंस कर बोले, “तुम्हें हम अलग अलग लगते हैं क्या, भोलिऐ , अमृता और मैं तो एक ही हैं , वह वाह वाही तो मुझे भी मिल रही होती है ना“
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मुझे श्रीकृष्ण और राधा रानी का क़िस्सा याद आ गया….
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जब श्रीकृष्ण वृंदावन छोड़ कर जा रहे थे तो राधा जी ने उनसे कहा, “कान्हा, मैं तुम्हारे बिना कैसे रहूँगी ? तुम मुझ से ब्याह कर लो और अपने साथ ले चलो”.
श्रीकृष्ण मुँह मोड़ कर खड़े हो गये और राधा जी ने सोचा वह मना कर रहे है, तब श्री कृष्ण ने कहा था “राधे , ब्याह रचाने के लिए दो लोगों की ज़रूरत होती है, तुम और मैं तो एक ही हैं“
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ऐसा प्यार कलियुग में भी घटा लेकिन लोगों ने नहीं समझा
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( उमा त्रिलोक )

अमृता गई ही नहीं-उमा त्रिलोक

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प्रोमिला जी ने ठीक ही कहा कि माजा ( इमरोज़ अमृता जी को प्यार से माजा बुलाते थे ) गई ही नहीं वह इमरोज़ जी के साथ ही थी.
मुझे याद है अमृता जी के दाह संस्कार के वक्त, जब इमरोज़ जी एक कोने में अकेले खड़े थे तो मैंने उनके कंधे पा हाथ रख कर कहा था “इमरोज़ जी अब उदास नहीं होना, आपने तो दिलों जान से सेवा की थी फिर भी….”
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उन्होंने बात काट कर कहा था….
“उमा जी, उसने जाना कहाँ है यही रहना है मेरे आले दुआले ,,,, मैं तो खुश हूँ , जो मैं नहीं कर सका वह मौत ने कर दिया , उसे उसके दर्द से निजात दिला दी ।
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और वह तो हमेशा यही कहते “वह गई नहीं , उसने शरीर छोड़ा है साथ नहीं , जब तक मैं ज़िंदा हूँ वह मेरे साथ ज़िंदा है “
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इमरोज़ जी अमृता जी का कमरा आज भी रोज़ सजाते, ताज़े एडेनियम के फूलों से महकाते, उनके लिए खाना पकाते,पूछने पर कहते, “ मैंने पनीर की भुजिया बनायी है या मैंने वेज सूप बनाया है जो अमृता को बहुत पसंद है“ और फिर प्लेट में परोस कर उनके कमरे में ले जाते …
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मैं कभी कभी यह सोचती वह अभी भी कल्पना की दुनिया मैं रह रहें हैं लेकिन कुछ वाक़यात तो ऐसे थे कि मुझे भी चकित कर देते और यक़ीन हो जाता कि वे दोनों अभी भी साथ साथ हैं ।
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बहुत से ऐसे वाक़यात का ज़िक्र मैंने अपनी किताब “ She Lives On“ में किया है । उन सब बातों के बाद तो मुझे भी यक़ीन हो गया था कि वह दोनों साथ साथ हैं.
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यह किताब “She Lives On “ का गुजराती अनुवाद है.
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(उमा त्रिलोक )

इमरोज़ हो नहीं सकते-प्रतिक्षा गुप्ता

इमरोज़ हो नहीं सकते
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मेरे दिल में व्यक्ति इमरोज़ के लिए बहुत इज़्ज़त है। हमेशा रहेगी। इसलिए नहीं कि वह अमृता प्रीतम को अमाप प्रेम करते थे, जो कइयों के लिए आला लेखिका हैं। बल्कि इसलिए कि वह अमृता-साहिर वग़ैरह से ज़्यादा बड़े प्रेमी और मनुष्य थे। कहीं ज़्यादा बड़ा कवि-जीवन उन्होंने जिया, बड़ी कविता संभव किए बग़ैर।
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ऐसा बहुत कम लोग कर पाते हैं। कविता जैसा जीवन जीना। अपना प्रेम चुनना। उसे हर हाल जीना। दुनिया की न परवाह करने का दम भरनेवाले आज के ज़माने से बहुत पहले दुनिया को नाकुछ साबित करके गरिमा से सर्वप्रिय बन जाना आसान नहीं।
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इमरोज़ हमारे संसार का सुख थे। हममें से न जाने कितने हैं, जो अपने लिए एक इमरोज़ चाहते हैं। इमरोज़ होना चाहते हैं। हो नहीं सकते! उन जैसा अन्तःकरण असंभव है।
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( प्रतिक्षा गुप्ता )

अलविदा इमरोज़-उमा त्रिलोक

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सुविख्यात कवियत्री अमृता प्रीतम के पीछे कौन शख़्स ताउमर खड़ा रहा जिस को मुखातिब होकर वह कहा करती थी, “ ईमा, ईमा,तूँ दूर ना जाया कर , मेरे आले दुआले ई रिया कर, तेरा दूर जाना मैनु चंगा नई लगदा “ ( ईमा ईमा ( प्यार से अमृता, इमरोज़ को ईमा बुलाया करती थीं ) तुम दूर मत जाया करो, मेरे आस पास ही रहा करो, तुम्हारा दूर जाना मुझे अच्छा नहीं लगता )
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याद आता है वह वाकया जब निर्देशक गुरुदत्त के बुलावे पर इमरोज़ मुंबई चले गए थे तो अमृता जी ने उन्हें ख़त में लिखा था, “जब से तुम गये हो मुझे बुख़ार चढ़ा हुआ है और जो फल तुम ख़रीद कर रख गये थे वह भी ख़त्म हो गए है । तुम तो जानते ही हो मैं कुछ भी ख़रीद करने बाहर नहीं जाती“
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ख़त पढ़ते ही इमरोज़ जी नौकरी छोड़ कर अपनी अमृता के पास तुरंत दिल्ली लौट आये थे । वह जानते थे अमृता उनकी ग़ैरहाज़िरी में कैसे मुश्किल में रह रही है ।
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बहुत कम लोग जानते थे कि अमृता के पीछे कौन शख़्स खड़ा है जिसके बिना अमृता निःसहाय सी महसूस करती रहती थीं । पूछती थी वह किसे अपनी कविता, कहानी या नावेल सुनाये ? इमरोज़ के बिना वह बहुत अकेली महसूस करती थीं ।
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मैं हैरान हूँ अमृता जी ने स्वर्ग में , इमरोज़ के बिना १८ साल कैसे बिताये होंगे जिस इमरोज़ ने हर मुसीबत में उनका हाथ थामे रखा और हर आँधी , तूफ़ान , बाढ़ से बचाये रखा !
मुझे यक़ीन है अब जब वह इमरोज़ जी को मिली होंगी तो ज़रूर कहा होगा “क्यों ईमा, ऐनी देर क्यों लायी ?“ ( क्यों इमरोज़, इतनी देर क्यों लगायी )
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( उमा त्रिलोक )