पेट्रोल, गैस और कामरेड-मनमीत सोनी

आज सुबह बहुत ख़ुश था कामरेड

.

कह रहा था :

.

“युद्ध हो रहा है भाईसाहब युद्ध!”

.

मैंने कहा :

.

“तो”?

.

तो हँसी को दबाकर
आवाज़ में गंभीरता का अभिनय करते हुए बोला :

.

“अब तो गया साला मोदी!”

.


मैंने पूछा :

.

“कैसे गया मोदी?”

.

तो उसने बातों की रेलगाड़ी ही चला दी :

.

“अब पेट्रोल महंगा हो जाएगा”
“अब गैस महंगी हो जाएगी”
“अब लम्बी लम्बी लाइन लगेगी”
“अब लोग ब्लैक मार्केटिंग करेंगे”
“अब मारा-पीटी छीना-झपटी होगी”
“अब धारा एक सौ चौवालीस लगेगी”
“अब राहुल गाँधी का महत्व समझ आएगा”
“अब कांग्रेस मज़बूत बनकर उठेगी”
“अब इतना संकट होगा कि मध्यावधि चुनाव होंगे”
“अब चुनाव में मोदी हारेगा”
“अब मोदी पर केस होंगे”
“अब मोदी जेल जाएगा”
“अब मोदी वाले सपोर्टर रोयेंगे”
“अब अल्पसंख्यक मज़बूत होंगे”
“अब असली लोकतंत्र की स्थापना होगी”
“अब भारत नेहरू का भारत बनेगा”
“अब भारत गाँधी का भारत बनेगा”

.

इतना कहते कहते
हांफने लगा कामरेड

.

और
ज़मीन पर उकडू बैठ गया!

_

मैंने कामरेड को उठाया
थोड़ा-सा पानी पिलाया
यू ट्यूब पर “आज तक” लगाया
भारत सरकार की प्रेस कॉन्फ्रेंस दिखाई
और फिर धीरे से बताया :

.

होरमुज़ स्ट्रेट में
भारतीय जहाज़ों को अनुमति मिल गई है कामरेड!

.


कामरेड के चेहरे का तो
रंग ही उड़ गया

.

उसने कहा
इण्डिया टीवी लगाओ

.

उसने कहा
एबीपी न्यूज़ लगाओ

.

उसने कहा
आर. भारत लगाओ

.

उसने कहा
Ndtv लगाओ

.

उसने कहा
सब के सब झूठे हैं

.

जल्दी से देखो
क्या रवीश कुमार की कोई वीडियो आई है
क्या पुण्य प्रसून वाजपेई की कोई वीडियो आई है
क्या अभिसार शर्मा की कोई वीडियो आई है
क्या ध्रुव राठी की कोई वीडियो आई है

.

_

मैं समझ गया था
अगर कामरेड को थोड़ा और पानी नहीं पिलाया
तो इसका राम नाम सत्य हो जाएगा

.

हालांकि किसी भी भारतीय कामरेड का
“राम नाम सत्य” कभी नहीं होता
एक सच्चे भारतीय कामरेड का
हमेशा ही “इन्ना लिल्लाहि व इन्ना इलैहि राजिऊन” होता है

.

मैंने कामरेड को
गाड़ी में बिठाया
गाड़ी स्टार्ट की
गाड़ी पेट्रोल पम्प तक पहुंची ही थी

.
कि कामरेड चीख़ उठा :

.

“पेट्रोल ख़त्म”
“पेट्रोल ख़त्म”
“पेट्रोल ख़त्म”

.

लेकिन कामरेड को फिर झटका लगा
जब मैंने गाड़ी की टंकी फुल करवाई

.

_

कामरेड को ड्रिप लगी
कामरेड को ORS पिलाया गया
कामरेड को विटामिन b12 और d3 की सुईयां लगीं
तब जाकर कुछ नॉर्मल हुआ कामरेड


हॉस्पिटल से छुट्टी मिली
तो लंगड़ाते हुए बाहर आया कामरेड
जुबान पर जैसे लकवा पड़ गया था

.

कामरेड बुदबुदा रहा था :

.

“एक मौक़ा और गया”
“एक मौक़ा और गया”
“एक मौक़ा और गया”


दोस्तो!

.

बहुत मुमकिन है
कि महंगा हो गया हो पेट्रोल
कि महंगी हो गई हो गैस

.

लेकिन कितना सस्ता हो गया है
हमारा कामरेड

.


दोस्तो!

.

मेरे मन में तो हँसी के फव्वारे छूट रहे हैं
इसलिए कामरेड को फोन नहीं कर सकता
लेकिन आप ज़रूर कर सकते हैं
कृपया आप तो पूछिए
क्या कामरेड ठीक है या नहीं

.

कहीं ऐसा तो नहीं
कि सड़कों पर पैदल निकल गया हो कामरेड

.

गैस एजेंसी के सामने
भीड़ नहीं पाकर
और ज़्यादा बावला हो गया हो

.

_

दोस्तो!

.

पता तो करो…

.

कामरेड कहाँ है?
कामरेड कैसा है?
कामरेड क्या कर रहा है?

.

दोस्तो!

.

पेट्रोल से भी
ड्राइक्लीन नहीं होते
कामरेड की गद्दारी के दाग़ धब्बे!

.

आप क्या कहते हैं???

.

( मनमीत सोनी )

જે ડરાવે છે-મંગલેશ ડબરાલ

જે આપણને ડરાવે છે

એ હંમેશા એમ કહેતો હોય

ડરવા જેવી કોઈ વાત નથી

હું કોઈને ડરાવતો નથી

.

જે આપણને ડરાવે છે

એ હવામાં આંગળી ઊંચી કરીને કહે છે

કોઈએ ડરવાની જરૂર નથી

એ પોતાની મુઠ્ઠી ભીડીને હવામાં ઉલાળે છે

અને પૂછે છે

તમે ડરતા તો નથી ને

.

જે આપણને ડરાવે છે

એ પોતાની તીક્ષ્ણ ઠંડી આંખોથી આપણને ઘુરે છે

અને નીરખે છે – કોણ કોણ ડરી રહ્યાં છે

.

લોકો જ્યારે ડરવા લાગે છે, એ રાજી થાય છે

અને હસતાં હસતાં કહે છે

ડરવાનું કોઈ કારણ નથી

.

જે આપણને ડરાવે છે

એ ત્યારે સ્વયં ડરી જાય છે

જ્યારે એ જુએ છે

કે કોઈ એનાથી ડરી નથી રહ્યું.

.

( મંગલેશ ડબરાલ, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

.

जो डराता है

.

जो हमें डराता है

वह कहता है डरने की कोई बात नहीं है

मैं किसी को डरा नहीं रहा हूँ

जो हमें डराता है

वह हवा में अपनी अंगुली तान कर कहता है

किसी को डरने की जरूरत नहीं है

वह अपनी मुट्ठियाँ भींच कर हवा में उछालता है

और पूछता है तुम डर तो नहीं रहे हो

.

जो हमें डराता है

वह अपनी तीखी ठंढी आँखों से हमें घूरता है

और देखता है कौन-कौन डर रहा है

लोग जब डरने लगते हैं वह खुश होने लगता है

और हँसते हुए कहता है डरने की कोई वजह नहीं है

वह खुद डर जाता है

जब वह देखता है कि कोई डर नहीं रहा है।

जो हमें डराता है

.

( मंगलेश डबराल )

મિત્ર-સિદ્ધાર્થ બાજપેયી

|| મિત્ર ||

એ મિત્ર હતો

એકનો એક

પહેલી જાસુસી ચોપડી

પહેલી સિગરેટ

પહેલો ઝઘડો

પહેલો પ્રેમ

અમારું બધું સહિયારું હતું

.

હું વહેંચતો

મારા દુઃખ એની સાથે

કશું બોલ્યા વિના

અને કશું બોલ્યા વિના સમજી પણ જતો

એનો મૂંઝારો અને એનાં સપના

.

એની પાસેથી ઉછીના લીધેલા પૈસા ક્યારેય ભારરૂપ ન લાગતા દિલને

અને આપતો તો કશું જ નહીં એને

.

કેવળ એ એક જ હતો

જેની સામે રડી શકતો હું

એટલે એ જ્યારે મર્યો

તો રડ્યો નહીં હું

.

જ્યારે સમાચાર મળ્યા એના મૃત્યુના

અર્ધ ચંદ્ર આકાશમાં હતો

પછી આકાશમાંથી ચંદ્ર ગાયબ થયો અને હું એકલો ઊભો હતો બાલ્કનીમાં

.

રાત્રિમાં

આકાશમાં

દુનિયામાં

હું સાવ એકલો હતો..

.

( સિદ્ધાર્થ બાજપેયી, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

કઈ હતી મારી માતૃભાષા ?-સિદ્ધાર્થ બાજપેયી

કઈ હતી મારી માતૃભાષા ?

ફળિયાની કોરે ઉગેલા

ટમેટાંના લીલા છોડમાં

અચાનક એક લાલ ટમેટું જોઈ હું બોલી ઊઠેલો

પહેલીવાર ” અરે ! “

જે તોતડી ભાષામાં

એ ?

.

અથવા પછી

બધાં સપના જોયાં જે ભાષામાં

એ અલ્લડ અને બાલિશ ઉંમરમાં

એ ?

.

કે પછી

જે ભાષામાં રમતાં રમતાં લડી પડતાં

અમે નાના નાના ભેરુઓ

અથવા

જે ભાષામાં લખી કવિતાઓ

અને પ્રેમના કાચા પાકા સંદેશા

એ ?

.

પરંતુ ના ,

ખરેખર તો મારી માતૃભાષા એ હતી

જેમાં મારી બા રડતી

ક્યારેક ક્યારેક

ચુપચાપ

એકલાં – એકલાં…

.

( સિદ્ધાર્થ બાજપેયી, હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

( મૂળ કવિતા કવિના સંગ્રહ आसान सी बातें માંથી )

.

कौन-सी थी मेरी मातृभाषा

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कौन-सी थी मेरी मातृभाषा?

आंगन के किनारे

उगे टमाटर के हरे पौधों में अचानक

एक लाल टमाटर देख मैंने कहा पहली बार

‘अरे!’ जिस तोतली भाषा में वह?

या फिर सारे सपने देखे जिस भाषा में

एक अल्हड़ और मूर्ख-सी उम्र में, वह?

या जिस भाषा में लिखी कविताएं

और लिखे प्रेम के कच्चे-पक्के संदेशे, वह?

पर सच में तो

मेरी मातृभाषा वह थी

जिसमें मेरी मां रोती थी कभी-कभी

चुपचाप अकेले में!

નિકળ્યો છું પતવાર લઈને-( હિમાંશુ પટેલ “અદ્વૈત”)

નિકળ્યો છું પતવાર લઈને
સ્વપ્નોની ભરમાર લઈને.

.

ક્યાં લગ જાશે વ્હાણ અમારું !
ભ્રમણાઓનો ભાર લઈને.

.

જો ને મારી નૈયા ડૂબે !
આવ મનુ અવતાર લઈને.

.

ભીતર કોઈ મરવાં લાગ્યું
આવ હવે જણ ચાર લઈને.

.

પંખી ઊડ્યું ડાળ ઉપરથી
લીલોછમ ચિત્કાર લઈને.

.

શ્વેત ચળકતા જગમાં ભટકું
અણઘડ શો આકાર લઈને.

.

દરિયો શાને મોટો થ્યો છે ?
નદીઓનાં ઘરબાર લઈને.

.

સત્ય ભલા શાને શોધે છે?
પુસ્તક તું દળદાર લઈને !

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( હિમાંશુ પટેલ "અદ્વૈત" )

विनोद कुमार शुक्लजी को विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

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सुप्रसिद्ध कवि-कथाकार, साहित्य अकादेमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल जी (1937-2025) को विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

.

उनकी सरल भाषा में गहन जीवन दर्शन वाली रचनाएँ, जैसे ‘नौकर की कमीज’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, हमें हमेशा प्रेरणा देती रहेंगी।

.

(१)

रात दस मिनट की होती

तो पाँच मिनट में आधी रात हो जाती –

रातें ऐसी ही बीतीं

.

दिन दस मिनट का होता

तो पाँच मिनट में आधा दिन बीत जाता –

दिन ऐसे ही बीते

.

मै दो दिन की जिंदगी जी सकता हूँ

एक दिन मै तुम्हारे पास रहूँगा

दूसरे दिन तुम मेरे पास रहना

.

(२)

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

व्यक्ति को मैं नहीं जानता था

.

हताशा को जानता था

इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया

.

मैंने हाथ बढ़ाया

मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ

.

मुझे वह नहीं जानता था

मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था

.

हम दोनों साथ चले

दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे

.

साथ चलने को जानते थे।

.

(३)

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे

मैं उनसे मिलने

.

उनके पास चला जाऊँगा।

एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर

.

नदी जैसे लोगों से मिलने

नदी किनारे जाऊँगा

.

कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा

पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब

.

असंख्य पेड़ खेत

कभी नहीं आएँगे मेरे घर

.

खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने

गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।

.

जो लगातार काम में लगे हैं

मैं फ़ुरसत से नहीं

.

उनसे एक ज़रूरी काम की तरह

मिलता रहूँगा—

.

इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह

सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।

.

(४)

प्रेम की जगह अनिश्चित है

यहाँ कोई नहीं होगा की जगह भी कोई है।

.

आड़ भी ओट में होता है

कि अब कोई नहीं देखेगा

.

पर सबके हिस्से का एकांत

और सबके हिस्से की ओट निश्चित है।

.

वहाँ बहुत दुपहर में भी

थोड़ी-सा अँधेरा है

.

जैसे बदली छाई हो

बल्कि रात हो रही है

.

और रात हो गई हो।

बहुत अँधेरे के ज़्यादा अँधेरे में

.

प्रेम के सुख में

पलक मूँद लेने का अंधकार है।

.

अपने हिस्से की आड़ में

अचानक स्पर्श करते

.

उपस्थित हुए

और स्पर्श करते हुए विदा।

.

(५)

अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं

और पूरा आकाश देख लेते हैं

.

सबके हिस्से का आकाश

पूरा आकाश है।

.

अपने हिस्से का चंद्रमा देखते हैं

और पूरा चंद्रमा देख लेते हैं

.

सबके हिस्से का चंद्रमा वही पूरा चंद्रमा है।

अपने हिस्से की जैसी-तैसी साँस सब पाते हैं

.

वह जो घर के बग़ीचे में बैठा हुआ

अख़बार पढ़ रहा है

.

और वह भी जो बदबू और गंदगी के घेरे में ज़िंदा है।

सबके हिस्से की हवा वही हवा नहीं है।

.

अपेन हिस्से की भूख के साथ

सब नहीं पाते अपने हिस्से का पूरा भात

.

बाज़ार में जो दिख रही है

तंदूर में बनती हुई रोटी

.

सबके हिस्से की बनती हुई रोटी नहीं है।

जो सबकी घड़ी में बज रहा है

.

वह सबके हिस्से का समय नहीं है।

इस समय।

.

(६)

आँख बंद कर लेने से

अंधे की दृष्टि नहीं पाई जा सकती

.

जिसके टटोलने की दूरी पर है संपूर्ण

जैसे दृष्टि की दूरी पर।

.

अँधेरे में बड़े सवेरे एक खग्रास सूर्य उदय होता है

और अँधेरे में एक गहरा अँधेरे में एक गहरा अँधेरा फैल जाता है

.

चाँदनी अधिक काले धब्बे होंगे

चंद्रमा और तारों के।

.

टटोलकर ही जाना जा सकता है क्षितिज को

दृष्टि के भ्रम को

.

कि वह किस आले में रखा है

यदि वह रखा हुआ है।

.

कौन से अँधेरे सींके में

टँगा हुआ रखा है

.

कौन से नक्षत्र का अँधेरा।

आँख मूँदकर देखना

.

अंधे की तरह देखना नहीं है।

पेड़ की छाया में, व्यस्त सड़क के किनारे

.

तरह-तरह की आवाज़ों के बीच

कुर्सी बुनता हुआ एक अंधा

.

संसार से सबसे अधिक प्रेम करता है

वह कुछ संसार स्पर्श करता है और

.

बहुत संसार स्पर्श करना चाहता है।

.

(७)

मैं स्वभाविक मौत तक ज़िंदा रहना चाहता हूं

अगर रोज़ कर्फ्यू के दिन हों
तो कोई अपनी मौत नहीं मरेगा
कोई किसी को मार देगा
पर मैं स्वाभाविक मौत मरने तक
ज़िन्दा रहना चाहता हूँ
दूसरों के मारने तक नहीं
.
और रोज़ की तरह अपना शहर
रोज़ घूमना चाहता हूँ
.
शहर घूमना मेरी आदत है
ऐसी आदत कि कर्फ्यू के दिन भी
किसी तरह दरवाज़े खटखटा कर
सबके हालचाल पूछूँ
.
हो सकता है हत्यारे का
दरवाज़ा भी खटखटाऊँ
अगर वह हिन्दू हुआ
तो अपनी जान
हिन्दू कह कर न बचाऊँ
मुसलमान कहूँ
.
अगर मुसलमान हुआ
तो अपनी जान
मुसलमान कह कर न बचाऊँ
हिन्दू कहूँ
.
हो सकता है इसके बाद भी
मेरी जान बच जाय
तो मैं दूसरों के मारने तक नहीं
अपने मरने तक जिन्दा रहूँ
.
(विनोद कुमार शुक्ल)

ટેવ છે એને-મુકેશ જોષી

ટેવ છે એને પ્રથમ એ માપશે ને તોલશે,
ખુશ થશે તો પ્રેમનું આકાશ આખું થોળશે

.

સહેજ બારી ખૂલતાં સામે શરદ પૂનમ થતી,
કઈ તિથિ થાશે અગર એ બારણું જો ખોલશે.

.

સ્પર્શની બાબત નીકળશે, તું શરત ના મારતો ,
એ તો પરપોટાની કાઢી છાલ પાછો છોલશે.

.

નામ ઈશ્વરનું ખરેખર યાદ ક્યાં છે કોઈને,
પૂછશો તો મંદિરોના નામ કડકડ બોલશે.

.

ઓ મદારી ! દૂધ શાને પાય છે તું નાગને,
તું મલાઈ આપશે તો માણસો પણ ડોલશે.

.

( મુકેશ જોષી )

સ્વર : આલાપ દેસાઈ
સંગીત: આલાપ દેસાઇ

.

॥ मेमनों से कोई नहीं करता प्यार ॥-राजेश्वर वशिष्ठ

ठिठुरती रात में

लकड़ी और पुआल से बने घर में

जब चरवाहा ओढ़ कर सोता है

गरम ऊन का कम्बल;

ठंड में काँपती हैं

बाहर बाड़े में बंद बत्तीस मेमनों की आत्माएँ।

मेमने ज़िंदगी भर बँधे रहते हैं

अपनी क़ैद की गंध से।

मेमनों के सपनों में

कोई नहीं आता मुहब्बत लुटाने;

वे रोज़ देखते हैं एक बड़ी-सी कैंची

और अपनी उधड़ती हुई पीठ।

सुबह की धूप उन्हें ओढ़ाती है

चाँदी का कुनमुना दुशाला।

जब भूख नोचने लगती है पेट की आँतें;

वे पंक्तिबद्ध होकर हरी घास की खोज में

नरम-नरम क़दमों से

जा पहुँचते हैं किसी बुग्याल तक!

मेमनों की दुनिया एक-सी रहती है सदा;

पहाड़ी चरवाहे का बाड़ा हो या

दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र,

श्रम हो या मुलायम क़ीमती पश्मीना

मज़दूर और भेड़ के लिए

उसका कोई अर्थ नहीं।

सुनेत्रा,

रक्तिम आकाश के नीचे

वे मेमने अब भी भटक रहे हैं

किसी स्नेहिल स्पर्श के लिए;

वे नहीं जानते हमारी दुनिया में,

मेमनों से कोई नहीं करता प्यार!

( राजेश्वर वशिष्ठ )

.

|| ઘેટાં ||

હાડ ઠુંઠવતી રાત્રિમાં
ડાંખળી અને તણખલાંથી બનેલ ઝૂંપડીમાં
જ્યારે ગોવાળ ઓઢીને સુએ છે
ગરમ ઊનનો ધાબળો
બહાર વાડામાં કેદ બત્રીસ ઘેટાંનો આત્મા
ઠંડીથી થરથર કંપે છે

ઘેટાં જીવનભર બંધાયેલા રહે છે
પોતાની વાડાની ગંધ સંગે
એમના સપનામાં
કોઈ નથી આવતું પ્રેમ વહેંચવા
એ રોજ જુએ એક મોટી કાતર
અને પોતાની ઉતરડાઈ રહેલી પીઠ

સવારનો તડકો
એમને ઓઢાડે
ચમકતી મુલાયમ ચાદર
જ્યારે ભૂખથી વલોવાય એમના આંતરડાં
એ બધાં કતારબંધ
કૂણા ઘાસની તલાશમાં
હળવા પગલે
જઈ પહોંચે કોઈક ચરિયાણ લગી

ઘેટાંની દુનિયા એકસરખી જ રહે સદાય
પહાડી ગોવાળનો વાડો હોય કે
દુનિયાનું સૌથી મોટું લોકતંત્ર
શ્રમ હો કે મુલાયમ મૂલ્યવાન ઊન
મજૂર કે ઘેટા માટે એનો કોઈ અર્થ નથી

સુનેત્રા,
રક્તિમ આભ હેઠળ
જે ઘેટાં હજુ પણ ભટકે છે
કોઈ સ્નેહાળ સ્પર્શ માટે
એમને ખબર નથી

આપણી દુનિયામાં
ઘેટાંને નથી ચાહતું કોઈ…

.

( રાજેશ્વર વશિષ્ઠ )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

ઊર્ધ્વ દિશાએ-હિમાંશુ પટેલ

ધૂમ્ર પ્રસરશે ઊર્ધ્વ દિશાએ
જીવ નિકળશે ઊર્ધ્વ દિશાએ.

.

ખળખળ જળ ભળવાનું દરિયે
પાછું ચડશે ઊર્ધ્વ દિશાએ.

.

ચારે બાજુ ભટકો શાને ?
ઈશ્વર મળશે ઊર્ધ્વ દિશાએ.

.

ખોટે ખોટાં ખાંખાખોળા
જીવન જડશે ઊર્ધ્વ દિશાએ.

.

દુનિયા સજ્જડ કિલ્લા જેવી
દ્વાર ઊઘડશે ઊર્ધ્વ દિશાએ.

.

મેલી ઘેલી ચાદર ફેંકો
વાન નિખરશે ઊર્ધ્વ દિશાએ.

.
( હિમાંશુ પટેલ )

छठ पर्व : मनमीत के नौ शब्द चित्र

1.

अगले जन्म में

बिहारी बनाना प्रभु

अपनी मातृभूमि से दूर कमाने भेजना

ट्रेन में लद कर

बस में फंस कर

घर लौटने देना प्रभु

इतना पैसा मत देना

कि दिल्ली से उडूं

और पटना उतर जाऊं!

.

2.

सूरज और पानी की दोस्ती का यह पर्व

मुझे बहुत अपना लगता है –

सीने में

दर्द का एक सूरज लिए

आँखों में आए आंसुओं को बुझाने का

पुराना खिलाड़ी रहा हूँ मैं!

.

3.

आज जब पूर्वांचल की एक सुहागिन को

ठेठ मांग से लेकर

नाक तक केसरिया सिंदूर में देखा

तो मैंने अपनी पत्नी से कहा :

मत लगाया करो यह लिक्विड सिंदूर…

लाओ!

पिछली होली का ग़ुलाल बचा होगा

मैं तुम्हें मांग भरना सिखाता हूँ…

.

4.

चाहे राजस्थान की सीमा मिश्रा हो

या आसाम का ज़ुबिन गर्ग

या बिहार की शारदा सिन्हा :

गीत वही हैं

बस कंठ बदल जाते हैं!

.

5.

मैं

पानी में जब भी कमर तक डूबा

आत्महत्या की इच्छा सर उठाने लगी –

अगर बिहारियों को

पानी में कमर तक डूबकर

सूरज को अर्घ्य देते नहीं देखता

तो आत्महत्या की इस इच्छा में..

नाक तक डूब जाता!

.

6.

“खरना” हो चाहे “परना” हो..

हे छठी मैया हमें तेरा सरणा हो!

.

7.

आप दुनियादार लोग हैं

आप सूरज की पूजा करते हैं –

मैं एक कवि मन हूँ

मैं चाँद की पूजा करता हूँ –

रौशनी का आधा पुल

धूप से बनता है

और आधा चांदनी से!

.

8.

एक घाट है

उस पर स्त्रियां हैं

फलों की टोकरियां हैं

सूरज है

पानी में उसकी किरणेँ हैं

अगरबत्तियों और दीपकों का धुआं है

गीत हैं

कंठ हैं

आभार है

भावुकता है

केवल यह भी बचा रहे

तो पूर्वांचल वाले

धरती पर प्रलय के बाद

नई सृष्टि बसा सकते हैं!

.

9.

बिहारियों को देखता हूँ

तो ऐसा लगता है

इन्होंने अपनी जड़ों को सींचकर

यह आकाश कमाया है

लेकिन

इतना कमज़ोर क्यों समझ लिया गया

जड़ों को सींचने वाले

इन महान धरती पुत्रों को?

कि इन्हें

घास बना दिया गया

जिस पर सौ-दो सौ रुपये दिहाड़ी चढ़ा कर

साला कोई मसल देना चाहता है!

.

( मनमीत सोनी )