दीवार में एक खिड़की रहती थी – डॉ. उर्वशी

(आज जब विनोद कुमार शुक्ल हमारे बीच भौतिक रूप में नहीं हैं, तब यह उपन्यास और भी गहरे अर्थों में हमें स्पर्श करता है। ऐसा लगता है जैसे वे स्वयं किसी दीवार के पार चले गए हों, लेकिन अपने शब्दों की खिड़कियाँ हमारे लिए खुली छोड़ गए हों।

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विनोद कुमार शुक्ल की रचनाएँ हमें यह सिखाती हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा प्रतिरोध उसका कोमल बने रहना है, और सबसे बड़ा साहस—साधारण होना। उन्होंने हिंदी साहित्य को शोर से नहीं, मौन से समृद्ध किया; गति से नहीं, ठहराव से अर्थ दिया।

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उनकी मृत्यु एक लेखक का जाना नहीं है, बल्कि उस दृष्टि का ओझल होना है, जो दीवारों में भी खिड़कियाँ खोज लेती थी।

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पर साहित्य का यह नियम अटल है—जो लेखक खिड़कियाँ बनाता है, वह कभी पूरी तरह जाता नहीं।
विनोद कुमार शुक्ल को नमन।

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उनकी रचनाओं की खिड़कियों से आती रोशनी हमारे समय को देर तक आलोकित करती रहे।)

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कभी-कभी साहित्य में एक ऐसी खिड़की खुल जाती है, जिससे रोशनी केवल बाहर नहीं, भीतर भी गिरती है—मनुष्य के अस्तित्व, उसकी चुप्पियों, उसके छोटे-छोटे सुखों और दुखों पर। ऐसे ही क्षणों में साहित्य केवल पाठ नहीं रहता, वह आत्मानुभूति बन जाता है।

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डॉ. रविभूषण का यह कथन सहज ही स्मरण में आता है कि—“जीवन में दरवाज़ों से ज़्यादा खिड़कियों का महत्व होता है।”

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दरवाज़े भीतर-बाहर के रास्ते दिखाते हैं, पर खिड़कियाँ देखने की दृष्टि देती हैं—बंद कमरों में भी उजाले और हवा का बोध कराती हैं। दरवाज़े स्थूल हैं, खिड़कियाँ सूक्ष्म—वे हमें भीतर से बाहर और बाहर से भीतर देखने का विवेक देती हैं।

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विनोद कुमार शुक्ल का उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ इसी सूक्ष्म दृष्टि का दस्तावेज़ है। यहाँ दीवारें जीवन की सीमाएँ हैं, लेकिन उन्हीं दीवारों में खुली खिड़कियाँ मनुष्य के भीतर बची हुई मानवीय रोशनी की गवाही देती हैं।

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यह उपन्यास किसी पारंपरिक कथा की तरह नहीं, बल्कि धीरे-धीरे जलते दीपक की तरह फैलता है—न घोषणाओं में, न वैचारिक नारेबाज़ी में, बल्कि उन असंख्य सांसों में जिनसे साधारण मनुष्य अपना दिन काटता है और जीवन रचता है।

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विनोद कुमार शुक्ल हिंदी कथा-साहित्य के उन विरल रचनाकारों में हैं, जिन्होंने यह सिद्ध किया कि साधारण मनुष्य के जीवन में ही सबसे बड़ा रहस्य और सबसे सुंदर कविता छिपी होती है। उनका यह उपन्यास किसी रहस्य का दरवाज़ा नहीं खोलता, बल्कि एक खिड़की खोलता है—धीरे, निस्पृह, लगभग ध्यान की अवस्था में।

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उपन्यास के केंद्र में हैं रघुवर प्रसाद और सोनसी—निम्न-मध्यवर्गीय दंपति। उनके जीवन में कोई असाधारण घटना नहीं घटती, फिर भी उनका अस्तित्व असाधारण बन जाता है। रघुवर प्रसाद गणित पढ़ाते हैं, लेकिन जीवन के जटिल समीकरणों को हल नहीं कर पाते। सोनसी गृहस्थ जीवन के भीतर वह कोमल ऊर्जा है, जो संसार को चलाती है।

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उनके छोटे से कमरे की दीवार में बनी एक खिड़की केवल वास्तु का हिस्सा नहीं, बल्कि स्वप्न और यथार्थ के बीच खुला एक जादुई मार्ग है। उस पार नदी, पहाड़, चिड़ियाँ और पेड़ों की छाँव है—जहाँ जाकर मनुष्य अपने भीतर की थकान उतार देता है। यह खिड़की दरअसल अंतर्जगत का प्रतीक है—जहाँ से मनुष्य अपने भीतर उतरता है और दुनिया को नई दृष्टि से देखना सीखता है।

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‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ का शिल्प रैखिक नहीं है; यह क्षणों, स्मृतियों और संवेदनाओं की परतों से निर्मित है। विनोद कुमार शुक्ल पारंपरिक कथा-गठन से आगे बढ़कर एक कवितामय गद्य-संरचना रचते हैं, जहाँ घटनाएँ नहीं, अनुभूतियाँ कथा बनती हैं।

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कॉलेज जाना, साइकिल का गायब होना, साधु का हाथी के साथ गुज़रना—ये सब घटनाएँ कम और प्रतीक अधिक हैं। यह हमारे समय, समाज और व्यक्ति के मनोविज्ञान के सूक्ष्म प्रतिबिंब हैं। उपन्यास का शिल्प एक सुरभित ध्यान की तरह है—जहाँ हर दृश्य धीरे-धीरे खुलता है, हर संवाद का अपना मौन है, और हर मौन के भीतर एक गहरी लय स्पंदित है।

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भाषा यहाँ अलंकारों से नहीं, बल्कि ईमानदारी और पारदर्शिता से चमकती है। घरेलू बोली, आत्मसंवाद, औपचारिक संवाद और निजी बातचीत—इन सभी की भिन्न लयों ने इस उपन्यास को बहुभाषिक यथार्थ का रूप दिया है। यह भाषा बताती है कि साहित्य का सबसे गहरा संगीत उसी में बसता है जो सबसे सादा है।

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दीवार और खिड़की का प्रतीक इस उपन्यास की आत्मा है। दीवार समाज की कठोरता, सीमाओं और ठोस यथार्थ की प्रतीक है, जबकि खिड़की उस दीवार में खुली उम्मीद—एक ऐसी दरार, जिससे प्रेम, स्वप्न और स्वतंत्रता की हवा भीतर आती है।

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रघुवर प्रसाद और सोनसी का प्रेम इस उपन्यास का सबसे मृदुल और मार्मिक पक्ष है। बिना किसी नाटकीयता के, साधारण दिनों के भीतर बहता हुआ प्रेम—साझी थकान, साझा रोटी और साझा नींद में जीवित रहता हुआ। यह प्रेम न शरीर से बचता है, न उसमें डूबता है—वह आँखों और मौन के बीच पनपता है।

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( डॉ. उर्वशी )

विनोद कुमार शुक्लजी को विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

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सुप्रसिद्ध कवि-कथाकार, साहित्य अकादेमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित विनोद कुमार शुक्ल जी (1937-2025) को विनम्र श्रद्धांजलि 🙏

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उनकी सरल भाषा में गहन जीवन दर्शन वाली रचनाएँ, जैसे ‘नौकर की कमीज’ और ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’, हमें हमेशा प्रेरणा देती रहेंगी।

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(१)

रात दस मिनट की होती

तो पाँच मिनट में आधी रात हो जाती –

रातें ऐसी ही बीतीं

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दिन दस मिनट का होता

तो पाँच मिनट में आधा दिन बीत जाता –

दिन ऐसे ही बीते

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मै दो दिन की जिंदगी जी सकता हूँ

एक दिन मै तुम्हारे पास रहूँगा

दूसरे दिन तुम मेरे पास रहना

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(२)

हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था

व्यक्ति को मैं नहीं जानता था

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हताशा को जानता था

इसलिए मैं उस व्यक्ति के पास गया

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मैंने हाथ बढ़ाया

मेरा हाथ पकड़कर वह खड़ा हुआ

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मुझे वह नहीं जानता था

मेरे हाथ बढ़ाने को जानता था

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हम दोनों साथ चले

दोनों एक दूसरे को नहीं जानते थे

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साथ चलने को जानते थे।

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(३)

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे

मैं उनसे मिलने

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उनके पास चला जाऊँगा।

एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर

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नदी जैसे लोगों से मिलने

नदी किनारे जाऊँगा

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कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा

पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब

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असंख्य पेड़ खेत

कभी नहीं आएँगे मेरे घर

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खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने

गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।

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जो लगातार काम में लगे हैं

मैं फ़ुरसत से नहीं

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उनसे एक ज़रूरी काम की तरह

मिलता रहूँगा—

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इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह

सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।

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(४)

प्रेम की जगह अनिश्चित है

यहाँ कोई नहीं होगा की जगह भी कोई है।

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आड़ भी ओट में होता है

कि अब कोई नहीं देखेगा

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पर सबके हिस्से का एकांत

और सबके हिस्से की ओट निश्चित है।

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वहाँ बहुत दुपहर में भी

थोड़ी-सा अँधेरा है

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जैसे बदली छाई हो

बल्कि रात हो रही है

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और रात हो गई हो।

बहुत अँधेरे के ज़्यादा अँधेरे में

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प्रेम के सुख में

पलक मूँद लेने का अंधकार है।

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अपने हिस्से की आड़ में

अचानक स्पर्श करते

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उपस्थित हुए

और स्पर्श करते हुए विदा।

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(५)

अपने हिस्से में लोग आकाश देखते हैं

और पूरा आकाश देख लेते हैं

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सबके हिस्से का आकाश

पूरा आकाश है।

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अपने हिस्से का चंद्रमा देखते हैं

और पूरा चंद्रमा देख लेते हैं

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सबके हिस्से का चंद्रमा वही पूरा चंद्रमा है।

अपने हिस्से की जैसी-तैसी साँस सब पाते हैं

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वह जो घर के बग़ीचे में बैठा हुआ

अख़बार पढ़ रहा है

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और वह भी जो बदबू और गंदगी के घेरे में ज़िंदा है।

सबके हिस्से की हवा वही हवा नहीं है।

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अपेन हिस्से की भूख के साथ

सब नहीं पाते अपने हिस्से का पूरा भात

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बाज़ार में जो दिख रही है

तंदूर में बनती हुई रोटी

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सबके हिस्से की बनती हुई रोटी नहीं है।

जो सबकी घड़ी में बज रहा है

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वह सबके हिस्से का समय नहीं है।

इस समय।

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(६)

आँख बंद कर लेने से

अंधे की दृष्टि नहीं पाई जा सकती

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जिसके टटोलने की दूरी पर है संपूर्ण

जैसे दृष्टि की दूरी पर।

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अँधेरे में बड़े सवेरे एक खग्रास सूर्य उदय होता है

और अँधेरे में एक गहरा अँधेरे में एक गहरा अँधेरा फैल जाता है

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चाँदनी अधिक काले धब्बे होंगे

चंद्रमा और तारों के।

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टटोलकर ही जाना जा सकता है क्षितिज को

दृष्टि के भ्रम को

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कि वह किस आले में रखा है

यदि वह रखा हुआ है।

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कौन से अँधेरे सींके में

टँगा हुआ रखा है

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कौन से नक्षत्र का अँधेरा।

आँख मूँदकर देखना

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अंधे की तरह देखना नहीं है।

पेड़ की छाया में, व्यस्त सड़क के किनारे

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तरह-तरह की आवाज़ों के बीच

कुर्सी बुनता हुआ एक अंधा

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संसार से सबसे अधिक प्रेम करता है

वह कुछ संसार स्पर्श करता है और

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बहुत संसार स्पर्श करना चाहता है।

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(७)

मैं स्वभाविक मौत तक ज़िंदा रहना चाहता हूं

अगर रोज़ कर्फ्यू के दिन हों
तो कोई अपनी मौत नहीं मरेगा
कोई किसी को मार देगा
पर मैं स्वाभाविक मौत मरने तक
ज़िन्दा रहना चाहता हूँ
दूसरों के मारने तक नहीं
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और रोज़ की तरह अपना शहर
रोज़ घूमना चाहता हूँ
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शहर घूमना मेरी आदत है
ऐसी आदत कि कर्फ्यू के दिन भी
किसी तरह दरवाज़े खटखटा कर
सबके हालचाल पूछूँ
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हो सकता है हत्यारे का
दरवाज़ा भी खटखटाऊँ
अगर वह हिन्दू हुआ
तो अपनी जान
हिन्दू कह कर न बचाऊँ
मुसलमान कहूँ
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अगर मुसलमान हुआ
तो अपनी जान
मुसलमान कह कर न बचाऊँ
हिन्दू कहूँ
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हो सकता है इसके बाद भी
मेरी जान बच जाय
तो मैं दूसरों के मारने तक नहीं
अपने मरने तक जिन्दा रहूँ
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(विनोद कुमार शुक्ल)

Happy Birthday Osho-મુર્તઝા પટેલ

“ઓશો ! ક્યારેય જન્મ્યો નથી, ક્યારેય મર્યો નથી. એ તો ફક્ત પૃથ્વી નામના ગ્રહ પરથી પસાર થઇ ગયો છે.”

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સમાધિ પર આવું જબરદસ્ત ક્વોટ આપી જનાર ઓશો જો આજે તેમના જન્મદિને સદેહે હયાત હોત તો 94 વર્ષના ‘હોટ’ પ્રતિભા હોત. પણ આપણેય ક્યાં એમને સંખ્યાત્મક ભાવે ગણવાના છીએ?! બસ ! એમની અસંખ્ય ભાવનાત્મક બાબતોને સમજીએ તોયે ઘણું.

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ઓશોએ જન્મ અને મૃત્યુને એક ગણિત તરીકે નહીં, પણ એક કલા તરીકે જોયું. તેમની નજરમાં, આપણો જન્મ માત્ર એક ઘટના નથી, પણ બ્રહ્માંડ તરફથી મળેલો એક પ્રેમ પત્ર (Love Letter) છે.

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તો આજે મારી ઓશો-પેટીમાંથી સાચવી રાખેલાં તેમનાં ૭ ક્રાંતિકારી વિચારોને મમળાવીએ, જે આપણને સમજાવે છે કે, ‘જન્મ’ ખરેખર શું છે?

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૧. 🌱 “તમે નવા નથી, તમે તો અનંત છો!”

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“તમે અનંતકાળથી છો. તમારો જન્મ એ માત્ર કપડાં બદલવા જેવું છે. એક શરીરને છોડ્યું, અને આ જન્મમાં બીજું ઘર મળ્યું. જેમ નદી વહે છે, તેમ તમારી ચેતનાનો પ્રવાહ સતત વહે છે. જન્મ એ શરૂઆત નથી, પણ આ લાંબી યાત્રામાં એક બદલાયેલો મુકામ છે.”

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આ સમજણ આપણને મૃત્યુના ડરથી મુક્ત કરે છે. જો તમે અનંત છો, તો મૃત્યુ તમારો અંત કેવી રીતે લાવી શકે?

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૨. 🕊️ “ભૂલી જવું એ કુદરતનું વરદાન છે.”
બાળક ભૂતકાળની સ્મૃતિઓ ભૂલીને જન્મે છે. આ ભૂલી જવું તમને કેવું લાગે છે? ઓશો કહે છે: આ આશીર્વાદ છે!

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જો તમને યાદ હોય કે તમે અગાઉના જન્મોમાં શું ભૂલો કરી, શું દુઃખો વેઠ્યાં, તો તમે ક્યારેય હસી શકશો નહીં. કુદરત તમને એક ખાલી સ્લેટ આપે છે. આ ખાલીપણું તમને નિર્દોષતા (Innocence) આપે છે. આ નિર્દોષતા જ તમને વર્તમાન ક્ષણમાં જીવવાની તાકાત આપે છે. બાળક જેવું નિર્દોષ મન જ ધ્યાનની પહેલી શરત છે.

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૩. ⏳ “જન્મ થવો એટલે મૃત્યુની શરૂઆત થવી!”

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સામાન્ય રીતે આપણે જન્મની ઉજવણી કરીએ છીએ, પણ ઓશો કહે છે: “તમે જન્મ્યા છો, એટલે કે હવે તમે મૃત્યુ તરફ ચાલવાનું શરૂ કરી દીધું છે. તમારું જીવન એ મૃત્યુની યાત્રા છે.”

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જ્યારે તમે આ સત્ય સ્વીકારો છો, ત્યારે જ તમે ખરી રીતે જીવવાનું શરૂ કરો છો. તમને સમજાય છે કે, એક પણ ક્ષણ બગાડવા જેવી નથી. દરેક શ્વાસ કિંમતી છે. મૃત્યુની આ જાણકારી આપણને જીવન પ્રત્યે જાગૃત અને સાવધાન બનાવે છે.

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૪. 🎭 “શરીર તમારું વાહન, તમે એના માલિક! તમે ડ્રાઇવર છો, કાર નહીં. તમે ઘરમાં રહેલો રહેવાસી છો, ઘર નહીં.”

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જ્યારે તમે તમારી જાતને શરીર કે મન માની લો છો, ત્યારે તમે દુઃખી થાઓ છો. જ્યારે તમે પોતાને ચેતના (Awareness) માનો છો, ત્યારે શરીરની બીમારીઓ કે મૃત્યુ તમને અસર કરતા નથી. આ જન્મનો ઉદ્દેશ આ ‘વાહન’નો ઉપયોગ કરીને અંદરની યાત્રા કરવી છે, પોતાની જાતને ઓળખવી છે.

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૫. 🎁 “જન્મ એક વચન છે: બુદ્ધ બની શકાય છે.”

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દરેક બાળક સંપૂર્ણતા (Enlightenment) ની સંભાવના લઈને જન્મે છે. તમારો જન્મ એ એક વચન છે, એક મોટો અવસર છે.

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તમે કયા ધર્મમાં જન્મ્યા, કયા સમાજમાં જન્મ્યા, એ ગૌણ છે. મુખ્ય વાત એ છે કે, તમે આ જીવનમાં જાગૃત થવાનો પ્રયત્ન કર્યો કે નહીં?

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૬. 🥳 “જન્મ એક ઉત્સવ છે, ગંભીરતા નહીં!”- અને ઓશો માટે, આધ્યાત્મિકતા ક્યારેય ગંભીર હોઈ ન શકે.

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“તમે જો જીવંત છો, તો તમે ગંભીર ન હોઈ શકો. ગંભીરતા એ મૃત્યુની નિશાની છે. તમારો જન્મ થયો છે, એ જ સૌથી મોટો ઉત્સવ છે. નાચો, ગાઓ, ખુશ રહો, પ્રેમ કરો. જાગૃતિ સાથે જીવો અને જીવનના દરેક રંગનો આનંદ માણો. જીવનને ઉત્સવ બનાવો!”

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૭. 💡 “બીજો જન્મ: જ્યારે તમે જાગૃત થાઓ છો.”

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જ્યારે તમે સમાજ અને લોકોએ આપેલા જૂના લેબલો અને વિચારોને તોડીને, પોતાની મૌલિકતામાં જાગૃત થાઓ છો, ત્યારે તમારો ખરો જન્મ થાય છે. આ આંતરિક ક્રાંતિ જ જીવનનો સાચો હેતુ છે.

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જીવનને ગંભીરતાથી નહીં, પણ ઉત્સવની જેમ જીવો. સંપૂર્ણ પ્રેમ અને સંપૂર્ણ જાગૃતિ સાથે જીવો, અને મૃત્યુ માત્ર એક સુંદર દરવાજો બની જશે. 🙌🏻

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( મુર્તઝા પટેલ )

ભારતના નવા શ્રમ કાયદા: તમારા અધિકારો માટે એક સરળ માર્ગદર્શિકા-હિના એમ. પારેખ

1. પરિચય: શા માટે પરિવર્તન જરૂરી હતું?

ભારતના શ્રમ કાયદાઓમાં એક ઐતિહાસિક પરિવર્તન આવ્યું છે. આપણા ઘણા જૂના કાયદાઓ આઝાદી પહેલાના અને આઝાદી પછીના પ્રારંભિક યુગમાં (1930-1950ના દાયકા) બનાવવામાં આવ્યા હતા. આ વસાહતી યુગના માળખા જટિલ, વિભાજિત અને બદલાતી આર્થિક વાસ્તવિકતાઓ સાથે તાલ મિલાવવામાં સંઘર્ષ કરી રહ્યા હતા. આ પડકારને પહોંચી વળવા માટે, સરકારે 29 જૂના શ્રમ કાયદાઓને એકીકૃત કરીને ચાર સરળ અને સુવ્યવસ્થિત કોડમાં રૂપાંતરિત કર્યા છે. આ સુધારાનો મુખ્ય ઉદ્દેશ્ય ભારતના કામદારો માટે કલ્યાણ, સલામતી અને સામાજિક સુરક્ષામાં વધારો કરીને એક સુરક્ષિત અને ભવિષ્ય માટે તૈયાર કાર્યબળનું નિર્માણ કરવાનો છે.

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આ સુધારાનો પાયો જૂની અને નવી વ્યવસ્થા વચ્ચેના સ્પષ્ટ તફાવતોમાં રહેલો છે, જે દર્શાવે છે કે તમારા અધિકારોને કેવી રીતે મજબૂત કરવામાં આવ્યા છે.

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2. મુખ્ય સુધારાઓ: પહેલાં અને હવે

નીચે આપેલ કોષ્ટક જૂના અને નવા શ્રમ નિયમો વચ્ચેના મુખ્ય તફાવતોને સ્પષ્ટપણે દર્શાવે છે, જેથી તમે સમજી શકો કે તમારા અધિકારો કેવી રીતે વધુ મજબૂત બન્યા છે.

વિષય (Subject)જૂની વ્યવસ્થા (Old System)નવી સુધારિત વ્યવસ્થા (New Reformed System)
નોકરીનું પત્ર (Appointment Letter)તમામ કામદારો માટે નિમણૂક પત્ર ફરજિયાત નહોતું.હવે તમામ કામદારોને ફરજિયાત નિમણૂક પત્ર મળશે, જે નોકરીની સુરક્ષા અને પારદર્શિતા સુનિશ્ચિત કરે છે.
ન્યૂનતમ વેતન (Minimum Wages)ન્યૂનતમ વેતન ફક્ત અનુસૂચિત ઉદ્યોગોમાં જ લાગુ પડતું હતું, જેના કારણે મોટાભાગના કામદારો તેનાથી વંચિત હતા.હવે તમામ કામદારોને ન્યૂનતમ વેતનનો કાયદાકીય અધિકાર મળશે, જે આર્થિક સુરક્ષા પૂરી પાડશે.
સામાજિક સુરક્ષા (Social Security)સામાજિક સુરક્ષાનો વ્યાપ ખૂબ જ મર્યાદિત હતો.હવે ગિગ અને પ્લેટફોર્મ કામદારો સહિત તમામ કામદારોને સામાજિક સુરક્ષા કવચ હેઠળ આવરી લેવામાં આવશે.
આરોગ્ય સંભાળ (Healthcare)નોકરીદાતાઓ માટે કર્મચારીઓની મફત વાર્ષિક આરોગ્ય તપાસ કરાવવાની કોઈ કાનૂની જોગવાઈ નહોતી.40 વર્ષથી વધુ ઉંમરના તમામ કામદારો માટે નોકરીદાતા દ્વારા મફત વાર્ષિક આરોગ્ય તપાસ ફરજિયાત કરવામાં આવી છે.
વેતનની સમયસર ચુકવણી (Timely Wage Payment)નોકરીદાતાઓ માટે સમયસર વેતન ચૂકવવાનું કોઈ કડક પાલન નહોતું.હવે નોકરીદાતાઓ માટે સમયસર વેતન ચૂકવવું ફરજિયાત છે, જે કામદારોના માનસિક તણાવને ઘટાડે છે અને મનોબળ વધારે છે.

આ વ્યાપક ફેરફારો વિવિધ પ્રકારના કામદારોના જીવનમાં સકારાત્મક પરિવર્તન લાવશે. ચાલો જોઈએ કે આ સુધારાઓ તમારા જેવા ચોક્કસ કામદાર જૂથો માટે શું અર્થ ધરાવે છે.

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3. આ સુધારાઓનો તમારા માટે શું અર્થ છે?

આ વિભાગમાં, આપણે જોઈશું કે નવા કાયદાઓ મહિલાઓ, ગિગ વર્કર્સ અને યુવા કર્મચારીઓ જેવા વિશિષ્ટ જૂથોને કેવી રીતે લાભ પહોંચાડે છે.

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3.1. મહિલા કર્મચારીઓ માટે

  • કામની સમાન તકો: હવે તમને તમારી સંમતિ અને ફરજિયાત સુરક્ષા વ્યવસ્થા હેઠળ તમામ પ્રકારના ઉદ્યોગોમાં અને રાત્રિ પાળીમાં પણ કામ કરવાનો અધિકાર છે. આ સુરક્ષામાં સુરક્ષિત પરિવહન, CCTV સર્વેલન્સ અને સુરક્ષા વ્યવસ્થા જેવી જોગવાઈઓનો સમાવેશ થાય છે.
  • સમાન કામ માટે સમાન વેતન: કાયદાકીય રીતે લિંગ આધારિત ભેદભાવ પર પ્રતિબંધ મૂકવામાં આવ્યો છે, જેથી તમને પુરુષોની બરાબરીમાં વેતન મળે તે સુનિશ્ચિત થશે.
  • ગેરવર્તણૂક નિવારણ સમિતિઓમાં ફરજિયાત પ્રતિનિધિત્વ: કાર્યસ્થળ પર તમારી ફરિયાદોનું યોગ્ય રીતે નિવારણ થાય તે માટે હવે ફરિયાદ નિવારણ સમિતિઓમાં મહિલાઓનું પ્રતિનિધિત્વ ફરજિયાત કરવામાં આવ્યું છે, જે તમને ન્યાય માટે એક મજબૂત મંચ પૂરું પાડે છે.
  • સાસુસસરાને પરિવારની વ્યાખ્યામાં: હવે તમે તમારા સાસુ-સસરાને પણ આશ્રિત તરીકે સામાજિક સુરક્ષા યોજનાઓનો લાભ અપાવી શકશો, જે પરિવારની સુરક્ષાનો વ્યાપ વધારે છે.
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3.2. ગિગ અને પ્લેટફોર્મ કામદારો માટે

  • પ્રથમ વખત કાયદાકીય રીતે વ્યાખ્યાયિત: ‘ગિગ વર્ક’ અને ‘પ્લેટફોર્મ વર્ક’ જેવા શબ્દોને પ્રથમવાર કાયદામાં સ્થાન મળ્યું છે, જે તમને અને તમારા કામને કાનૂની માન્યતા અને સુરક્ષા આપે છે.
  • વાર્ષિક ટર્નઓવરના 1-2% યોગદાન: હવે એગ્રીગેટર્સ (જેમ કે રાઇડ-શેરિંગ અથવા ફૂડ ડિલિવરી એપ્સ ચલાવતી કંપનીઓ) એ તેમના વાર્ષિક ટર્નઓવરમાંથી 1-2% રકમ તમારા માટે બનાવેલા સામાજિક સુરક્ષા ફંડમાં જમા કરાવવી પડશે.
  • સરળતાથી સુલભ અને પોર્ટેબલ: આધાર-લિંક્ડ યુનિવર્સલ એકાઉન્ટ નંબર (UAN) દ્વારા કલ્યાણકારી લાભો સરળતાથી ઉપલબ્ધ થશે અને સ્થળાંતર કરનારા કામદારો પણ કોઈપણ રાજ્યમાં તેનો લાભ લઈ શકશે, જે તમારા અધિકારોને પોર્ટેબલ બનાવે છે.
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3.3. યુવા કર્મચારીઓ માટે

  • રાષ્ટ્રીય લઘુતમ વેતનની ગેરંટી: કારકિર્દીની શરૂઆત કરનારા યુવાનોને હવે માત્ર ન્યૂનતમ વેતન જ નહીં, પરંતુ રાષ્ટ્રીય લઘુતમ વેતન (National Floor Wage) હેઠળ નિર્ધારિત વેતન મળશે. આ સુનિશ્ચિત કરે છે કે કોઈ પણ કામદારને યોગ્ય જીવનધોરણથી ઓછું વેતન ન મળે.
  • નિમણૂક પત્રો દ્વારા ઔપચારિકતા: હવે તમને ફરજિયાત નિમણૂક પત્ર મળશે. આ માત્ર નોકરીની સુરક્ષા જ નહીં, પરંતુ એક ઔપચારિક રોજગાર ઇતિહાસ પણ બનાવે છે જે ભવિષ્યમાં લોન લેવા, નવી નોકરી માટે અરજી કરવા અને કાનૂની સુરક્ષા માટે અત્યંત ઉપયોગી છે.
  • રજા દરમિયાન વેતનની ચુકવણી: હવે રજાના દિવસોમાં પણ વેતન ચૂકવવું ફરજિયાત છે, જે યુવા કામદારોનું શોષણ થતું અટકાવશે અને તમને આર્થિક સ્થિરતા આપશે.
  • ચોક્કસ મુદતના કર્મચારીઓ (FTEs) માટે સમાન લાભો: જો તમે ચોક્કસ મુદત (ફિક્સ્ડ ટર્મ) પર કામ કરો છો, તો પણ તમને હવે સ્થાયી કર્મચારીઓની જેમ જ તમામ લાભો (જેમ કે રજા, મેડિકલ અને સામાજિક સુરક્ષા) મળશે. ગ્રેચ્યુઈટી માટે પાંચ વર્ષની રાહ જોવાની જરૂર નથી, હવે તે માત્ર એક વર્ષની નોકરી પછી જ મળશે.
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આ વિશિષ્ટ લાભો સ્પષ્ટપણે દર્શાવે છે કે નવા સુધારા કામદારોના દરેક વર્ગને સશક્ત બનાવવા માટે રચાયેલા છે.

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4. સારાંશ: ઉજ્જવળ ભવિષ્ય તરફ એક પગલું

આ ચાર નવા શ્રમ કોડ્સ માત્ર કાયદાકીય સુધારા નથી, પરંતુ ભારતના કામદારો માટે એક ઉજ્જવળ ભવિષ્ય તરફનું એક મહત્વપૂર્ણ પગલું છે. આ સુધારાઓ કામદાર-પક્ષી, મહિલા-પક્ષી, યુવા-પક્ષી અને રોજગાર-પક્ષી વાતાવરણનું નિર્માણ કરવાનો ઉદ્દેશ્ય ધરાવે છે. આ નવા કાયદાઓ તમને, એટલે કે કામદારોને, શ્રમ શાસનના કેન્દ્રમાં નિશ્ચિતપણે મૂકે છે, જે તમારી સુરક્ષા, ગૌરવ અને વધુ સારા ભવિષ્યની ખાતરી આપે છે.

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( હિના એમ. પારેખ )

ભારતના નવા શ્રમ કાયદા: 5 મોટા ફેરફારો જે દરેક કામદારે જાણવા જ જોઈએ-હિના એમ. પારેખ

Introduction

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ભારતની શ્રમ કાયદા પ્રણાલી, જે મોટે ભાગે આઝાદી પહેલાના યુગની હતી, તે લાંબા સમયથી જટિલ અને જૂની ગણાતી હતી. આ પડકારને પહોંચી વળવા માટે, ભારત સરકારે 29 જૂના કાયદાઓને એકીકૃત કરીને ચાર નવા લેબર કોડ લાગુ કરવાની ઐતિહાસિક જાહેરાત કરી છે, જે 21 નવેમ્બર, 2025 થી અમલમાં આવ્યા છે. આ લેખનો હેતુ આ નવા કાયદાઓમાં થયેલા સૌથી આશ્ચર્યજનક અને પ્રભાવશાળી ફેરફારોને સમજાવવાનો છે, જે ભારતના દરેક કર્મચારીને સીધી અસર કરશે.

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1. ગિગ અને પ્લેટફોર્મ વર્કર્સને પ્રથમ વખત મળી કાનૂની ઓળખ અને સુરક્ષા

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ભારતીય કાયદામાં પ્રથમ વખત ‘ગિગ વર્કર’ અને ‘પ્લેટફોર્મ વર્કર’ જેવા શબ્દોને ઔપચારિક રીતે વ્યાખ્યાયિત કરવામાં આવ્યા છે. આ નવા કોડ હેઠળ, એગ્રીગેટર કંપનીઓ માટે તેમના ગિગ અને પ્લેટફોર્મ કામદારો માટે સામાજિક સુરક્ષામાં યોગદાન આપવું ફરજિયાત બનશે.

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એગ્રીગેટર્સે તેમના વાર્ષિક ટર્નઓવરના 1-2% રકમ ગિગ અને પ્લેટફોર્મ કામદારો માટે સામાજિક સુરક્ષા ફંડમાં ફાળો આપવો પડશે, જે કામદારોને ચૂકવવામાં આવેલી રકમના 5% સુધી મર્યાદિત રહેશે.

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આ એક સીમાચિહ્નરૂપ ફેરફાર છે કારણ કે તે આધુનિક અર્થવ્યવસ્થામાં કામ કરતા લાખો કામદારોને પ્રથમ વખત ઔપચારિક સામાજિક સુરક્ષાના દાયરામાં લાવે છે. સૌથી મહત્વની વાત એ છે કે, આધાર-લિંક્ડ યુનિવર્સલ એકાઉન્ટ નંબર (UAN) દ્વારા આ કલ્યાણકારી લાભો સરળતાથી ઉપલબ્ધ, સંપૂર્ણપણે પોર્ટેબલ અને સ્થળાંતરને ધ્યાનમાં લીધા વિના રાજ્યોમાં સુલભ બનશે, જે આ કામદારો માટે સાચી સુરક્ષા સુનિશ્ચિત કરે છે.

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2. હવે લઘુત્તમ વેતનનો અધિકાર દરેક કામદારને મળશે

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જૂની વ્યવસ્થા હેઠળ, લઘુત્તમ વેતનનો કાયદો ફક્ત અમુક “શિડ્યુલ્ડ” ઉદ્યોગોમાં જ લાગુ પડતો હતો, જેના કારણે મોટાભાગના કામદારો આ કાનૂની સુરક્ષાથી વંચિત રહેતા હતા. પરંતુ હવે, ‘કોડ ઓન વેજીસ, 2019’ હેઠળ, દેશના તમામ કામદારોને લઘુત્તમ વેતન મેળવવાનો કાનૂની અધિકાર આપવામાં આવ્યો છે. આ સાર્વત્રિક અધિકારને કેન્દ્ર સરકાર દ્વારા નિર્ધારિત ‘નેશનલ ફ્લોર વેજ’ દ્વારા મજબૂત કરવામાં આવ્યો છે, જે સુનિશ્ચિત કરે છે કે કોઈ પણ કામદારને લઘુત્તમ જીવનધોરણથી ઓછું વેતન ન મળે.

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3. મહિલા કર્મચારીઓ માટે નવા દરવાજા ખુલ્યા

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નવા શ્રમ કાયદા મહિલાઓની ભાગીદારી અને સુરક્ષા વધારવા માટે અનેક પ્રગતિશીલ જોગવાઈઓ લાવે છે:

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  • રાત્રિ શિફ્ટમાં કામ કરવાની પરવાનગી: હવે મહિલાઓ તેમની સંમતિથી રાત્રિ શિફ્ટમાં કામ કરી શકશે. આ માટે એમ્પ્લોયરે સલામત પરિવહન અને CCTV સર્વેલન્સ જેવી સુરક્ષા વ્યવસ્થા પૂરી પાડવી ફરજિયાત રહેશે.
  • તમામ ક્ષેત્રોમાં સમાન તક: મહિલાઓ હવે તમામ પ્રકારના ઉદ્યોગો અને કામમાં જોડાઈ શકશે, જેમાં ભૂગર્ભ ખાણકામ અને ભારે મશીનરી જેવા અગાઉ પ્રતિબંધિત ક્ષેત્રોનો પણ સમાવેશ થાય છે.
  • પગાર અને પદમાં સમાનતા: આ કોડ લિંગના આધારે ભેદભાવને કાયદેસર રીતે પ્રતિબંધિત કરે છે અને સમાન કામ માટે સમાન વેતનની ગેરંટી આપે છે.
  • વ્યવસ્થિત સુરક્ષા અને પ્રતિનિધિત્વ: ફરિયાદ નિવારણ સમિતિઓમાં મહિલાઓનું પ્રતિનિધિત્વ ફરજિયાત બનાવવામાં આવ્યું છે અને આશ્રિતો માટે ‘પરિવાર’ની વ્યાખ્યામાં સાસુ-સસરાનો સમાવેશ કરીને કવરેજ વિસ્તારવામાં આવ્યું છે.

આ ફેરફારો લૈંગિક સમાનતા તરફ એક મોટું પગલું છે, જે માત્ર મહિલાઓની કમાણીની સંભાવના જ નહીં, પરંતુ કાર્યસ્થળ પર તેમની સુરક્ષા અને અવાજને પણ મજબૂત કરે છે.

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4. હવે તમારા સ્વાસ્થ્યની જવાબદારી એમ્પ્લોયરની: મફત વાર્ષિક હેલ્થ ચેક-અપ

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‘ઓક્યુપેશનલ સેફ્ટી, હેલ્થ એન્ડ વર્કિંગ કન્ડિશન્સ કોડ’ એક સીમાચિહ્નરૂપ જોગવાઈ રજૂ કરે છે: હવે એમ્પ્લોયર માટે 40 વર્ષથી વધુ ઉંમરના તમામ કામદારોને મફત વાર્ષિક હેલ્થ ચેક-અપ પૂરું પાડવું ફરજિયાત કરવામાં આવ્યું છે. આ એક મહત્વપૂર્ણ ફેરફાર છે જે ફક્ત અકસ્માત પછીની સારવારથી આગળ વધીને નિવારક સ્વાસ્થ્ય સંભાળ (preventive healthcare) ની સંસ્કૃતિને પ્રોત્સાહન આપે છે. નવા કોડ પહેલાં આવી કોઈ કાનૂની જરૂરિયાત નહોતી.

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5. ફિક્સ્ડ-ટર્મ કર્મચારીઓ માટે મોટી રાહત: ગ્રેચ્યુઈટી હવે ફક્ત એકવર્ષમાં

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ફિક્સ્ડ-ટર્મ એમ્પ્લોયીઝ (FTEs) માટે નવા કાયદા મોટી રાહત લાવ્યા છે. હવે FTEs ફક્ત એક વર્ષની નોકરી પછી જ ગ્રેચ્યુઈટી મેળવવા માટે પાત્ર બનશે, જ્યારે પહેલા આ માટે પાંચ વર્ષની નોકરી જરૂરી હતી. આ ઉપરાંત, FTEs ને કાયમી કામદારોની જેમ જ રજા અને સામાજિક સુરક્ષા જેવા તમામ લાભો મળશે. આ ફેરફાર ટૂંકા ગાળાની નોકરીઓને વધુ સુરક્ષિત અને ನ್ಯಾಯપૂર્ણ બનાવે છે. નીતિના દૃષ્ટિકોણથી, આ પગલું સીધી ભરતીને પ્રોત્સાહન આપે છે અને વધુ પડતા કરાર આધારિત રોજગારને ઘટાડવાનો હેતુ ધરાવે છે.

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Conclusion

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આ નવા શ્રમ કોડનો વ્યાપક ઉદ્દેશ્ય એક સુરક્ષિત, ઉત્પાદક અને આધુનિક કાર્યબળનું નિર્માણ કરવાનો છે, સાથે સાથે વ્યવસાયો માટે કાયદાકીય પાલનને સરળ બનાવવાનો છે. આ ફેરફારો સ્પષ્ટપણે દર્શાવે છે કે નવી શ્રમ વ્યવસ્થાના કેન્દ્રમાં કામદારો, ખાસ કરીને મહિલાઓ, યુવાનો, ગિગ વર્કર્સ અને અસંગઠિત ક્ષેત્રના કામદારો જેવા સંવેદનશીલ જૂથોને રાખવામાં આવ્યા છે.

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આ સુધારાઓ ખરેખર ભારતના કાર્યબળનું ભવિષ્ય બદલી શકશે અને ‘આત્મનિર્ભર ભારત’ના સ્વપ્નને સાકાર કરવામાં મદદ કરશે?

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વધુ સરળતાથી સમજવા માટે આ સંવાદ સાંભળીયે.

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( હિના એમ. પારેખ )

नरेन्द्र मोदी के नाम-मनमीत सोनी

गालियों और तालियों में आकंठ डूबे हुए
ऐ नए भारत के विश्वकर्मा!

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तुम “डीज़र्व” करते हो “फैन फॉलोइंग”
और यह कहने में कोई संकोच नहीं
कि मेरे पास एक बार तुम्हें
चूरू में “लाइव” देखने का घमंड है!


यह देश
जब एक महान अवसाद में डूबा हुआ था
तब तुम आए आशा की किरण बनकर
और उस एक किरण से
दशकों के अँधेरे के शून्य को भर दिया प्रकाश से

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कितना भव्य स्वागत हुआ तुम्हारा
कितना अपमान किया गया तुम्हारा
कितनी भीड़ थी हाथ में मालाएं लिए
कितने चाकू छुरियां थीं तुम्हें मारने के लिए
तुमने मालाएँ ख़ुशी ख़ुशी पहन लीं
तुमने चाकुओं और छुरियों को भी सीने में उतर जाने दिया


पिछले पंद्रह बरस से
अनाथ नहीं लगता यह यह देश
ऐसा लगता है जैसे भारत नाम के बूढ़े बाप की
तुमने तन-मन-धन से इतनी सेवा की है
कि यह अभी उठकर दौड़ने लगेगा

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कैसे विरोधियों से घिरे हो तुम
जो अपने “हिन्दू” होने पर शर्मिंदा हैं
जिन्हें अफ़सोस है कि भारत में पैदा हुए
जो मुसलमानों को हिन्दुओं से
और हिन्दुओं को उनके दलित भाइयों से अलग कर देना चाहते हैं


ग़ालिब ने कहा था :

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“चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी जेब को अब हाजत ए रफ़ू क्या है”

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तुम्हें देख कर भी
ऐसा ही लगता है नरेन्द्र मोदी
कि तुम्हारे लहू के गोंद की वजह से ही चिपका हुआ है :

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कश्मीर या बंगाल या केरल हिंदुस्तान के बदन से!


मैं नहीं जानता
कि तुम ख़ुद हट जाओगे
या लोग ही तुम्हें हटा देंगे
लेकिन याद बहुत आओगे नरेन्द्र मोदी
जब चले जाओगे :

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एक चिड़िया के उड़ जाने से भी
सूना हो जाता है आकाश

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एक फूल के मुरझा जाने से भी
मरणधर्मा हो जाती है सारी हरियाली

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फिर तुम तो हमारी आशा हो
हम किसकी ओर देखेंगे तुम्हारे बाद?


आएँगे हज़ारों देशभक्त
हमारे पिटारे में अभी हज़ारों नरेन्द्र मोदी हैं
लेकिन तुम-सा नहीं आएगा कोई
और कोई कहेगा भी कि वह दूसरा नरेन्द्र मोदी है
तो हमें हँसी आएगी उस पर!


मुझ युवा कवि को
यदि सत्ता का दलाल कहा जाए
तो मुझे कोई परवाह नहीं

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मैं
चीन या पाकिस्तान या तुरकिये का दलाल होने से
कहीं कहीं बेहतर
अपने चुने हुए प्रधानमंत्री की
जूठी हुई प्लेट उठाना समझता हूँ!

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क्या करूँगा कविताओं का
जब देश ही नहीं बचेगा

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छाती पर खड़े
लाखों-करोड़ों गद्दारों के बीच
वैसे भी मेरी कविताओं का मूल्यांकन नहीं होगा!

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वे क्या पढ़ेंगे मेरी कविताएं
मैं स्वयं अपनी कविताओं को
उनकी आँखों के नीचे से दरी की तरह खींचता हूँ!


2014 से पहले
डरता था अपनी बात कहने से पहले
कि हमारी कोई नहीं सुनता था
न फेसबुक हमारा था न फेसबुक के बाहर की दुनिया
और अब हालात यह हैं
कि लोग लाइन लगा कर खड़े हैं

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“क्या मनमीत की नई कविता आई”


ट्रोल होने से नहीं डरता अब
फेसबुक की फ़ेक आइडियों से भी नहीं
दस-पंद्रह-बीस-तीस हज़ार के
फॉलोवर्स वाले हवाई चुनाव-विश्लेषकों से भी नहीं..

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डरता हूँ तो सिर्फ़ इस बात से
कि मुझ कवि ने
जिस राजनेता को इतना प्यार किया
कहीं वह अपने पीछे इतना बड़ा शून्य न छोड़ जाए
कि हमें डर लगने लगे :

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हमारे बच्चों का क्या होगा?


जिनकी तलवारें
इस इंतज़ार में हैं
कि तुम मरो तो म्यान से बाहर निकलें

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जिनकी बंदूकें
इस मौके की तलाश में हैं
कि तुम मरो तो छुपाई हुई गोलियाँ निकालें

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जिनके बारूद
इस फिराक़ में हैं
कि तुम मरो तो पूरे देश को एक झटके में उड़ा दिया जाए

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मैं
एक मामूली-सा कवि
इन सबके सामने छाती तान कर खड़ा हूँ!


तुम नहीं जानते
कि तुमने इस भारत महान को
कम से कम हज़ार वर्षों के लिए बचा लिया


लिखते चले जाने का
कोई अंत तो है नहीं मोदी जी
कि हम तो भोले बावले हैं
कि जिससे कर बैठे प्यार
उसी पर लुटा बैठे आँख के आँसू कलम की स्याही

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इतने बदनाम हैं
तुम्हें प्यार करने वाले
कि तुम्हारी जान को ही नहीं
हमारी जान को भी ख़तरा है नरेन्द्र मोदी!

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बचकर रहना नरेन्द्र मोदी
शिवाजी की तरह बदलते रहना क़िले
महाराणा प्रताप की तरह बदलते रहने जंगल
झांसी की रानी की तरह
इस भारत को अपनी कमर से बांध कर
करते रहना तलवारबाज़ी


गूँज रही हैं
कैफ़ी आज़मी की पंक्तियाँ
मुहम्मद रफ़ी की आवाज़ में :

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“ज़िंदा रहने के मौसम बहुत हैं मगर
जान देने की रुत रोज़ आती नहीं”


जान देने की रुत आ गई
नरेन्द्र मोदी…

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आओ!

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हम सब
भारत माता की बलिवेदी पर बलिदान होते हैं!


( मनमीत सोनी )

ટેવ છે એને-મુકેશ જોષી

ટેવ છે એને પ્રથમ એ માપશે ને તોલશે,
ખુશ થશે તો પ્રેમનું આકાશ આખું થોળશે

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સહેજ બારી ખૂલતાં સામે શરદ પૂનમ થતી,
કઈ તિથિ થાશે અગર એ બારણું જો ખોલશે.

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સ્પર્શની બાબત નીકળશે, તું શરત ના મારતો ,
એ તો પરપોટાની કાઢી છાલ પાછો છોલશે.

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નામ ઈશ્વરનું ખરેખર યાદ ક્યાં છે કોઈને,
પૂછશો તો મંદિરોના નામ કડકડ બોલશે.

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ઓ મદારી ! દૂધ શાને પાય છે તું નાગને,
તું મલાઈ આપશે તો માણસો પણ ડોલશે.

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( મુકેશ જોષી )

સ્વર : આલાપ દેસાઈ
સંગીત: આલાપ દેસાઇ

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॥ मेमनों से कोई नहीं करता प्यार ॥-राजेश्वर वशिष्ठ

ठिठुरती रात में

लकड़ी और पुआल से बने घर में

जब चरवाहा ओढ़ कर सोता है

गरम ऊन का कम्बल;

ठंड में काँपती हैं

बाहर बाड़े में बंद बत्तीस मेमनों की आत्माएँ।

मेमने ज़िंदगी भर बँधे रहते हैं

अपनी क़ैद की गंध से।

मेमनों के सपनों में

कोई नहीं आता मुहब्बत लुटाने;

वे रोज़ देखते हैं एक बड़ी-सी कैंची

और अपनी उधड़ती हुई पीठ।

सुबह की धूप उन्हें ओढ़ाती है

चाँदी का कुनमुना दुशाला।

जब भूख नोचने लगती है पेट की आँतें;

वे पंक्तिबद्ध होकर हरी घास की खोज में

नरम-नरम क़दमों से

जा पहुँचते हैं किसी बुग्याल तक!

मेमनों की दुनिया एक-सी रहती है सदा;

पहाड़ी चरवाहे का बाड़ा हो या

दुनिया का सबसे बड़ा प्रजातंत्र,

श्रम हो या मुलायम क़ीमती पश्मीना

मज़दूर और भेड़ के लिए

उसका कोई अर्थ नहीं।

सुनेत्रा,

रक्तिम आकाश के नीचे

वे मेमने अब भी भटक रहे हैं

किसी स्नेहिल स्पर्श के लिए;

वे नहीं जानते हमारी दुनिया में,

मेमनों से कोई नहीं करता प्यार!

( राजेश्वर वशिष्ठ )

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|| ઘેટાં ||

હાડ ઠુંઠવતી રાત્રિમાં
ડાંખળી અને તણખલાંથી બનેલ ઝૂંપડીમાં
જ્યારે ગોવાળ ઓઢીને સુએ છે
ગરમ ઊનનો ધાબળો
બહાર વાડામાં કેદ બત્રીસ ઘેટાંનો આત્મા
ઠંડીથી થરથર કંપે છે

ઘેટાં જીવનભર બંધાયેલા રહે છે
પોતાની વાડાની ગંધ સંગે
એમના સપનામાં
કોઈ નથી આવતું પ્રેમ વહેંચવા
એ રોજ જુએ એક મોટી કાતર
અને પોતાની ઉતરડાઈ રહેલી પીઠ

સવારનો તડકો
એમને ઓઢાડે
ચમકતી મુલાયમ ચાદર
જ્યારે ભૂખથી વલોવાય એમના આંતરડાં
એ બધાં કતારબંધ
કૂણા ઘાસની તલાશમાં
હળવા પગલે
જઈ પહોંચે કોઈક ચરિયાણ લગી

ઘેટાંની દુનિયા એકસરખી જ રહે સદાય
પહાડી ગોવાળનો વાડો હોય કે
દુનિયાનું સૌથી મોટું લોકતંત્ર
શ્રમ હો કે મુલાયમ મૂલ્યવાન ઊન
મજૂર કે ઘેટા માટે એનો કોઈ અર્થ નથી

સુનેત્રા,
રક્તિમ આભ હેઠળ
જે ઘેટાં હજુ પણ ભટકે છે
કોઈ સ્નેહાળ સ્પર્શ માટે
એમને ખબર નથી

આપણી દુનિયામાં
ઘેટાંને નથી ચાહતું કોઈ…

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( રાજેશ્વર વશિષ્ઠ )

( હિન્દી પરથી અનુવાદ : ભગવાન થાવરાણી )

ઊર્ધ્વ દિશાએ-હિમાંશુ પટેલ

ધૂમ્ર પ્રસરશે ઊર્ધ્વ દિશાએ
જીવ નિકળશે ઊર્ધ્વ દિશાએ.

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ખળખળ જળ ભળવાનું દરિયે
પાછું ચડશે ઊર્ધ્વ દિશાએ.

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ચારે બાજુ ભટકો શાને ?
ઈશ્વર મળશે ઊર્ધ્વ દિશાએ.

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ખોટે ખોટાં ખાંખાખોળા
જીવન જડશે ઊર્ધ્વ દિશાએ.

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દુનિયા સજ્જડ કિલ્લા જેવી
દ્વાર ઊઘડશે ઊર્ધ્વ દિશાએ.

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મેલી ઘેલી ચાદર ફેંકો
વાન નિખરશે ઊર્ધ્વ દિશાએ.

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( હિમાંશુ પટેલ )

छठ पर्व : मनमीत के नौ शब्द चित्र

1.

अगले जन्म में

बिहारी बनाना प्रभु

अपनी मातृभूमि से दूर कमाने भेजना

ट्रेन में लद कर

बस में फंस कर

घर लौटने देना प्रभु

इतना पैसा मत देना

कि दिल्ली से उडूं

और पटना उतर जाऊं!

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2.

सूरज और पानी की दोस्ती का यह पर्व

मुझे बहुत अपना लगता है –

सीने में

दर्द का एक सूरज लिए

आँखों में आए आंसुओं को बुझाने का

पुराना खिलाड़ी रहा हूँ मैं!

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3.

आज जब पूर्वांचल की एक सुहागिन को

ठेठ मांग से लेकर

नाक तक केसरिया सिंदूर में देखा

तो मैंने अपनी पत्नी से कहा :

मत लगाया करो यह लिक्विड सिंदूर…

लाओ!

पिछली होली का ग़ुलाल बचा होगा

मैं तुम्हें मांग भरना सिखाता हूँ…

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4.

चाहे राजस्थान की सीमा मिश्रा हो

या आसाम का ज़ुबिन गर्ग

या बिहार की शारदा सिन्हा :

गीत वही हैं

बस कंठ बदल जाते हैं!

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5.

मैं

पानी में जब भी कमर तक डूबा

आत्महत्या की इच्छा सर उठाने लगी –

अगर बिहारियों को

पानी में कमर तक डूबकर

सूरज को अर्घ्य देते नहीं देखता

तो आत्महत्या की इस इच्छा में..

नाक तक डूब जाता!

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6.

“खरना” हो चाहे “परना” हो..

हे छठी मैया हमें तेरा सरणा हो!

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7.

आप दुनियादार लोग हैं

आप सूरज की पूजा करते हैं –

मैं एक कवि मन हूँ

मैं चाँद की पूजा करता हूँ –

रौशनी का आधा पुल

धूप से बनता है

और आधा चांदनी से!

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8.

एक घाट है

उस पर स्त्रियां हैं

फलों की टोकरियां हैं

सूरज है

पानी में उसकी किरणेँ हैं

अगरबत्तियों और दीपकों का धुआं है

गीत हैं

कंठ हैं

आभार है

भावुकता है

केवल यह भी बचा रहे

तो पूर्वांचल वाले

धरती पर प्रलय के बाद

नई सृष्टि बसा सकते हैं!

.

9.

बिहारियों को देखता हूँ

तो ऐसा लगता है

इन्होंने अपनी जड़ों को सींचकर

यह आकाश कमाया है

लेकिन

इतना कमज़ोर क्यों समझ लिया गया

जड़ों को सींचने वाले

इन महान धरती पुत्रों को?

कि इन्हें

घास बना दिया गया

जिस पर सौ-दो सौ रुपये दिहाड़ी चढ़ा कर

साला कोई मसल देना चाहता है!

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( मनमीत सोनी )