क्या तू मेरी बात ना जाने – नन्दिनी मेहता

मैं ना कहूं तो क्या तू मेरी बात ना जाने

हर बात कहकर ही क्या कोई जाने

मैं ना कहूं तो क्या तू मेरी बात ना जाने

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बहुत सी बातें कही न जायें

बहुत सी कहनी न आयें

बहुत सी कहने लायक न पायें

मैं ना कहूं तो क्या तू मेरी बात ना जाने

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यों तो बहुत सी वातों में

कुछ बात होती नहीं

किंतु कभी कुछ नहीं में बहुत हो जाये

मैं ना कहूं तो क्या तू मेरी बात ना जाने

 .

मुख से चाहे मैं और कुछ कह जाऊं

फिर भी तू भीतर की असली जाने

तो मैं जानूं

मैं ना कहूं तो क्या तू मेरी बात ना जाने

 .

बात तो वह हुई

जो मैं न जानूं फिर भी तू जाने

मुझसे ज्यादा मुझसे आगे

तू मेरी जाने

तभी तू मुझसे मेरा अधिक माना जाये

मैं ना कहूं तो क्या तू मेरी बात ना जाने

 .

( नन्दिनी मेहता )

अब के खफा हुआ तो – निदा फाजली

अब के खफा हुआ तो है ईतना खफा भी हो

तू भी हो और तुझमें कोई दूसरा भी हो

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यूँ तो हर बीज की फितरत दरख्त है

खिलते हैं जिसमें फूल वो आबो-हवा भी हो

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आँखें न छीन मेरी नकामें बदलता चल

यूँ हो कि तू करीब भी हो और जुदा भी हो

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रिश्तों के रेगजार में हर सर पे धूप है

हर पाँव में सफर है मगर रास्ता भी हो

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दुनिया के कहने सुनने पे ईंसानियत न छोड

ईंसान है तो साथ में कोई खता भी हो

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( निदा फाजली )

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[ फितरत = प्रकृति, रेगजार = मरुस्थल ]

सुनिये – निदा फाजली

चाँद से फूल से या मेरी जबाँ से सुनिये

हर जगह आपका किस्सा है जहाँ से सुनिये

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सबको आता नहीं दुनिया को सजाकर जीना

जिन्दगी क्या है मुहब्बत की जबाँ से सुनिये

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क्या जरुरी है कि हर पर्दा उठाया जाये

मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिये

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मेरी आवाज ही पर्दा है मेरे चेहेरे का

मैं हूँ खामोश जहाँ मुझको वहाँ से सुनिये

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कौन पढ सकता है पानी पे लिखी तहरीरें

किसने क्या लिखा है ये आबे रवाँ से सुनिये

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चाँद में कैसे हुई कैद किसी घर की खुशी

ये कहानी किसी मस्जिद की अजाँ से सुनिये

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( निदा फाजली )

[ रवाँ = बहता पानी ]

पूछते चलो – साहिर लुधियानवी

अब आऐ या न आऐ ईधर पूछते चलो

क्या चाहती है उन की नजर पूछते चलो

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हम से अगर है तर्क-ए-तअल्लुक तो क्या हुआ

यारो, कोई तो उनकी खबर पूछते चलो

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जो खुद को कह रहे हैं कि मंजिल शनास हैं,

उनको भी क्या खबर है मगर पूछते चलो

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किस मंजिल-ए-मुराद की जानिब रवा हैं हम

ऐ रह-रवान-ए-खाक-ए-बसर पूछते चलो

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( साहिर लुधियानवी )

[ तर्क-ए-तअल्लुक = सम्ब न्ध टूटे हुए, शनास = जानने वाले, रवा = चलना, रह-रवान-ए-खाक-ए-बसर = रास्ते में पडे हुए ]

मुझी में खुदा था – निदा फाजली

मुझे याद है

मेरी बस्ती के सब पेड

पर्वत

हवाएँ

परिन्दे

मेरे साथ रोते थे

हँसते थे

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मेरे ही दुख में

दरिया किनारों पे सर पटकते थे

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मेरी ही खुशियों में

फूलों पे

शबनम के मोती चमकते थे

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यहीं

सात तारों के झुरमुट में

लाशक्ल सी

जो खुनक रोशनी थी

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वही जुगनुओं की

चरागों की

बिल्ली की आँखों की ताबन्दगी थी

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नदी मेरे अन्दर से होके गुजरती थी

आकाश…!

आँखों का धोका नहीं था

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ये बात उन दिनों की है

जब ईस जमीं पर

ईबादत घरों की जरुरत नहीं थी

मुझी में

खुदा था…!

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( निदा फाजली )

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[ लाशक्ल = बिना शक्ल, खुनक = ठण्डी ]

कौन करे – साहिर लुधियानवी

सुरमई रात के सितारे है

आज दोनों जहां हमारे है

सुबह का ईंतजार कौन करे !

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फिर यह रुत यह समां मिले न मिले

आरजू का चमन खिले न खिले

वक्त का एतबार कौन करे !

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ले भी लो हम को अपनी बाहों में

रुह बेचैन है निगाहों में

ईलतिजा बार बार कौन करे !

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( साहिर लुधियानवी )

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[ एतबार = भरोसा, रुह – आत्मा, ईलतिजा = विनती ]

जिस्म की जुस्तजू – निदा फाजली

सुनो तुम !

ये मेरा तुम्हारा

जो रिश्ता है

ईक रास्ता है

मैं तुमसे गुजर कर ही

तुम तक पहुँचने की रफ्तार हूँ

मेरा आगाज तुम

मेरा अंजाम तुम

तुम्हें देखकर मैं तुम्हें सोचता हूँ

तुम्हें पा के ही

मैं तुम्हें खोजता हूँ

तुम अपने बदन के समंदर में

सदीयों से पोशीदा

ईक ख्वाब हो

और मैं !!

खून की तेज गर्दिश में बनती हुई आँख हूँ

आँख और ख्वाब के दर्मियाँ

रोशनी तितलियाँ

नींद, बेदारियाँ

जिस्म से जिस्म तक

हर मिलन ईक सफर

हर सफर !

ख्वाब की आरजू

जिस्म की जूस्तजू !

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( निदा फाजली )

तब क्या होता – हरिवंशराय बच्चन

मौन रात ईस भांति कि जैसे

कोई गत वीणा पर बजकर

अभी-अभी सोई खोई-सी

सपनों में तारों पर सिर धर.

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और दिशाओं से प्रतिध्वनियॉ

जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,

कान तुम्हारी तान कहीं से यदि सुन पाते, तब क्या होता

मधुर प्रतीक्षा ही जब ईतनी, प्रिय तुम, आते तब क्या होता

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उत्सुकता की अकुलाहट में

मैंने पलक पॉवडे डाले

अंबर तो मशहूर कि सब दिन

रहता अपना होश सँभाले

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तारों की महफिल ने अपनी

ऑख बिछा दी किस आशा से

मेरी मौन कुटी को आते तुम दिख जाते, तब क्या होता

मधुर प्रतीक्षा ही जब ईतनी, प्रिय तुम, आते तब क्या होता

.

तुमने कब दी बात रात के

सुने में तुम आनेवाले,

पर एसे ही वक्त प्राण-मन

मेरे हो उठते मतवाले,

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सॉसे भूल-भूल फिर-फिर से

असमंजस के क्षण गिनती हैं

मिलने की घडियॉ तुम निश्चित कर जाते, तब क्या होता

मधुर प्रतीक्षा ही जब ईतनी, प्रिय तुम, आते तब क्या होता

.

बैठ कल्पना करता हूँ पग-

चाप तुम्हारी मग से आती

रग-रग से चेतनता खुलकर

आँसू के कण-सी झर जाती

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नमक डली-सा गल अपनापन

सागर में घुल-मिल-सा जाता

अपनी बांहो में भरकर, प्रिय कंठ लगाते, तब क्या होता

मधुर प्रतीक्षा ही जब ईतनी, प्रिय तुम, आते तब क्या होता

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( हरिवंशराय बच्चन )

कुछ भी नहीं

जिन्दगी आप की कुर्बत के सिवा कुछ भी नहीं

मौत क्या है ? गमे-फुर्कत के सिवा कुछ भी नहीं

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वो हकीकत है उन्हें ख्वाब में भी देखते है

यानी हर ख्वाब हकीकत के सिवा कुछ भी नहीं

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आप की याद है सहरा में गुलिस्ताँ की तरह

आप का जल्व: कयामत के सिवा कुछ भी नहीं

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बेकरारी को करार आता है रफ्ता रफ्ता

गम भी ईंसान की आदत के सिवा कुछ भी नहीं

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जख्म है ख्बाब है, यादें है परेशानी है

’नग्मा’ ये ईश्क मुसीबत के सिवा कुछ भी नहीं

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( रुपा ‘नग्मा’ )

[ कुर्बत=सामीप्य, गमे-फुर्कत=जुदाई का दु:ख, सहरा=मरुभूमि, गुलिस्ताँ=पुष्पोद्यान, कयामत=प्रलय, रफ्ता रफ्ता=धीरे धीरे ]

परम दु:ख-अक्कितम

कल आधी रात में बिखरी चाँदनी में

स्वयं को भूल

उसी में लीन हो गया मैं.

स्वत: ही

फूट-फूट कर रोया मैं

नक्षत्र-व्यूह अचानक ही लुप्त हो गया.

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निशीथगायिनी चिडिया तक ने

कारण न पूछा

हवा भी मेरे पसीने की बूँदे न सुखा पायी.

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पडोस के पेड से

पुराना पत्ता तक भी न झडा

दुनिया ईस कहानी को

बिल्कुल भी न जान सकी.

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पैर के नीचे की घास भी न हिली-डुली

फिर भी मैंने किसी से भी नहीं बतायी वह बात.

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क्या है

यह सोच भी नहीं पा रहा मैं

फिर ईस बारे में दूसरों को क्या बताऊँ मैं ?

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( अक्कितम, मूल कविता : मलयालम, अनुवाद : उमेश कुमार सिंह चौहान )