जैसी है – निदा फाजली

ज़िन्दगी इंतजार जैसी है

दूर तक रहगुजार जैसी है

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चंद बेचेहरा आहटों के सिवा

सारी बस्ती मज़ार जैसी है

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रास्ते चल रहे हैं सदियों से

कोई मंजिल गुबार जैसी है

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कोई तन्हाई अब नहीं तन्हा

हर खामोशी पुकार जैसी है

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ज़िन्दगी रोज़ का हिसाब किताब

कीमती शै उधार जैसी है

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( निदा फाजली )

[ शै = वस्तु ]

पिया, खोलो किवाड – हरिवंशराय बच्चन

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पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

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बगिया में मरमर,

दुनिया में जगहर,

उतरी किरन की कतारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

 .

कलियों में गुन-गुन,

गलियों में रुन-झुन,

अम्बर से गाती बहारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

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पतझर को भूली,

हर डाली फूली,

बीती को हम भी बिसारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

 .

गूंगी थीं घडियां,

गीतों की कडियां,

वीणा को फिर झनकारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

 .

माना कि दुख है,

बिधना विमुख है,

आओ उसे ललकारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

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( हरिवंशराय बच्चन )

मुझे अपनी आँखो पर – मुनि रुपचन्द्र

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मुझे अपनी आँखो पर विश्वास न हुआ

जब मैं ने देखा

कि मन्दिर के दालान में बैठे भक्त लोग

बडे ऊँचे स्वर में राम-धुन गा रहे हैं

जब कि उधर मन्दिर के पिछले दरवाजे से

भगवान उलटे पैरों भागे जा रहे हैं

चरण छू कर, काँपते हुए पूछा मैं ने,

भगवन ! आप का यह क्या हाल ?

तो उन्हों ने हाँफते-हाँफते कहा-

रोको मत मुझे,

यहाँ अधिक नहीं ठहर सकता अब मैं;

इन लोगों ने बिछा रखा है मेरे लिए पग-पग पर जाल

मैं दिग्भ्रमित सा बोला-

जाल कैसा ?

वे तो आप के नाम की रटन लगा रहे हैं

आप की मूरत पर ही वे अपना सर्वस्व चढा रहे हैं.

अव की बार वे झुँझला कर बोले-

हाँ, इस लिए ही तो

लोग उन से ईमानदारी-पूर्वक ठगे जा रहे हैं.

किन्तु मेरा अब निर्णय है

कि मैं उस नास्तिक के यहाँ भी रहना पसन्द करुंगा

जो अपने प्रति सच्चा है और शुद्ध है जिस का आचार

पर यहाँ मैं अब नहीं टिक सकता

जिन्होंने धर्म और ईश्वर के नाम पर

फैला रखा है इतना-इतना भ्रष्टाचार

सुनकर मैं अवाक रह गया

किन्तु फिर भी अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ

और मैं ने ध्यान से देखा

कि मन्दिर के दालान में भक्त-लोग

बडे ऊँचे स्वर में राम-धुन गा रहे हैं

जब कि उधर मन्दिर के पिछले दरवाजे से

भगवान उलटे पैरों भागे जा रहे हैं

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( मुनि रुपचन्द्र )

झरोखे में बैठा उदास कबूतर – मुनि रुपचन्द्र

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झरोखे में बैठा उदास कबूतर

भीगी पलकों से

कभी बाहर झाँकता है, कभी भीतर झाँकता है.

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वह देख रहा है

कि भीतर की दुनिया उजाड दी गयी है

अब यह महल खण्डहर है, सुनसान है

और बाहर की दुनिया बस-बस कर भी उजड रही है

क्योंकि नींव खोखली है और आदमी बेजान है

पुराना मकान ढह रहा है, नया बन नहीं रहा है

ईस लिए ईन दो खम्भों के बीच

लटकते हुए तारों पर ही अपनी जिन्दगी बिताने को

वह कभी ईधर झाँकता है, कभी उधर झाँकता है.

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वह सोच रहा है

कि आदमियत वह चीज है

जो उजडे हुए को बसाना जानती है

और जो रास्ता भूलकर भटक गये हैं

उन्हें सीधी-सी पगडण्डी बताना अपना फर्ज मानती है

लेकिन आज जो आदमी है

वह आदमियत नहीं चाहता

खुद तो उजडा हुआ है ही

औरों को बसता हुआ भी देखना नहीं चाहता.

धरती खिसकती जा रही है, आकाश भागा जा रहा है,

वह बेचारा सहारे की टोह में

कभी नीचे झाँकता है, कभी उपर झाँकता है.

 .

शायद वह अपने नभलोक को छोड कर

आज मन ही मन पछता रहा है

और ईस आदम की डरावनी शक्लें देख कर

अपना घायल शरीर ढीला किये सुस्ता रहा है

पर वह उड नहीं सकता; क्योंकि यह मनुष्य-लोक है

यहाँ वे पाँखे तोड दी जाती है

जो उडने की कोशिश किया करती हैं

और वें आँखें फोड दी जाती हैं

जो ईस घरौंदे की सीमा को लाँघ कर

बढने की कोशिश किया करती हैं

ईस लिए वह लाचार

कभी आँखें मूंद कर झाँकता है, कभी खोल कर झाँकता है.

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( मुनि रुपचन्द्र )

Happy New Year

( १)

वर्ष नव,
हर्ष नव,
जीवन उत्कर्ष नव।

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नव उमंग,
नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।

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नवल चाह,
नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।

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गीत नवल,
प्रीत नवल,
जीवन की रीति नवल,
जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!

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( हरिवंशराय बच्चन )

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Source : http://www.kavitakosh.org

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(२ )

नवल वर्ष, तेरा अभिनन्दन हो!
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नवल चेतना, नवल सृजन हो,
मंजुल मंगल परिवर्तन हो,
नवल वर्ष तेरी मधुर छाँव में
पुलकित प्रमुदित जन-जीवन हो!
नवल वर्ष, तेरा अभिनन्दन हो!
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नवल राह हो, नवल चाह हो,
नवल सोच हो, नव उछाह हो,
नवल भावना, नवल कामना
नवल कर्म, नव जागृत मन हो!
नवल वर्ष, तेरा अभिनन्दन हो!
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नव गिरि-कानन, गगन नवल हो,
नवल पवन हो, चमन नवल हो,
मानवता की नवल पौध हो,
और नवल जीवन-दर्शन हो!
नवल वर्ष, तेरा अभिनन्दन हो!

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(राजेश मिश्र )

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Source : http://www.openbooksonline.com

 

मैं तुम्हें फिर मिलूंगी – अमृता प्रितम

मैं तुम्हें फिर मिलूंगी

मैं तुम्हें फिर मिलूंगी

कहां ? किस तरह ? नहीं जानती

शायद तुम्हारे तख्यिल की चिनगारी बनकर

तुम्हारी कैनवस पर उतरूंगी

या शायद तुम्हारी कैनवस पर

रहस्यमय रेखा बनकर

खामोश तुम्हें देखती रहूंगी

 

या शायद सूरज की किरन बनकर

तुम्हारे रंगो में घुलूंगी

या रंगो की बांहो में बैठकर

तुम्हारी कैनवस को लिपटूंगी

पता नहीं कैसे-कहां ?

पर तुम्हें जरुर मिलूंगी

 .

या शायद एक चश्मा बनी होऊंगी

और जैसे झरनों का पानी उडता है

मैं पानी की बूंदे

तुम्हारे जिस्म पर मलूंगी

और ठंडक-सी बनकर

तुम्हारे सीने के साथ लिपटूंगी…

मैं और कुछ नहीं जानती

पर ईतना जानती हूं

कि वक्त जो भी करेगा

यह जन्म मेरे साथ चलेगा

यह जिस्म जब मिटता है

तब सब-कुछ खत्म हो जाता है

पर चेतना के धागे

कायनाती कणों के होते है

मैं उन कणों को चुनूंगी

धागों को लपेटूंगी

और तुम्हें मैं फिर मिलूंगी…

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( अमृता प्रितम )

बात किस से करे – ‘सागर’ बुरहानपुरी

बात किस से करे के मन भी नहीं

हमजबाँ कोई हमरुखन भी नहीं

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न तो कमरा है और न तनहाई

पहले जैसी वो अंजुमन भी नहीं

 .

अजनबी लोग अजनबी चहेरे

हम वतन में है बेवतन भी नहीं

 .

कितनी लाशों को दफन करना है

घर में दो गज कफन भी नहीं

 .

ले के जाउं कहां उन्हें ‘सागर’

अब तो अकबर के नौ रतन भी नहीं

 .

 ( ‘सागर’ बुरहानपुरी )

दीवारों-दर से – निदा फाजली

दीवारों-दर से उतर के परछाइंयाँ बोलती हैं

कोई नहीं बोलता जब तन्हाइयाँ बोलती हैं

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परदेस के रास्तों में रुकते कहाँ हैं मुसाफिर

हर पेड कहता है किस्सा, खामोशियाँ बोलती हैं

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मौसम कहाँ मानता है तहजीब की बंदिशों को

जिस्मों से बाहर निकल के अंगडाइयाँ बोलती हैं

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इक बार तो जिन्दगी में मिलती है सबको हुकूमत

कुछ दिन तो हर आईने में, शहजादियाँ बोलती हैं

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सुनने की मुहलत मिले तो आवाज है  पत्थरों में

उजडी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं

 .

( निदा फाजली )

अंजाम नहीं होता – मीनाकुमारी

आगाज तो होता है अंजाम नहीं होता

जब मेरी कहानी में वह नाम नहीं होता

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जब जुल्फ की कालिख में गुम जाए कोई राही

बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता

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हंस-हंस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकडे

हर शख्स की किस्मत में ईनाम नहीं होता

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बहते हुए आंसू ने आंखों से कहा थम कर

जो मय से पिघल जाए वह जाम नहीं होता

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दिन डूबे हैं या डूबी बारात लिए कश्ती

साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता

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( मीनाकुमारी )

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[ आगाज = आरम्भ, अंजाम = अंत, मय = मदिरा ]

लगते हैं – राजेश रेड्डी

मिलते ही हमको समझाने लगते हैं

दीवानों को हम दीवाने लगते हैं

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किस पर तीर चलाऊँ किसको छोडूँ मैं

दुश्मन सब जाने-पहेचाने लगते हैं

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दिन भर जो ढोते हैं बोझ खामोशी का

नींदों में अकसर चिल्लाने लगते हैं

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झूठ को फैलने में लगते हैं बस कुछ पल

लेकिन सच को कई जमाने लगते हैं

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हम भी कितने नादाँ हैं, इक वादे पर

कैसे-कैसे ख्वाब सजाने लगते हैं

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तौबा तो करते हैं रोज गुनाहों से

रोज मगर उनको दोहराने लगते हैं

हाल अजब होता है दिल का गुरबत में

सीधे-सादे बोल भी ताने लगते हैं

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( राजेश रेड्डी )