प्रात-मुकुलित – हरिवंशराय बच्चन

ठीक है मैंने कभी देखा अँधेरा,

किन्तु अब तो हो गया फिर से सबेरा,

भाग्य-किरणों ने छुआ संसार मेरा;

 प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा.

 .

तप्त आँसू से कभी मुख म्लान होता,

किन्तु अब तो शीत जल में स्नान होता,

राग-रस-कण से घुला संसार मेरा,

प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा.

 .

आह से मेरी कभी थे पत्र झुलसे,

किन्तु मेरी साँस पाकर आज हुलसे,

स्नेह-सौरभ से बसा संसार मेरा;

प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा.

 .

एक दिन मुझमें हुई थी मूर्त जडता,

किन्तु बरबस आज मैं झरता, बिखरता,

है निछावर प्रेम पर संसार मेरा;

प्रात-मुकुलित फूल-सा है प्यार मेरा.

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( हरिवंशराय बच्चन )

आज आओ – हरिवंशराय बच्चन

तापमय दिन में सदा जगती रही है,

रात भी जिसके लिए तपती रही है,

प्राण, उसकी पीर का अनुमान कर लो;

आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो.

 .

चाँद से उन्माद टूटा पड रहा है,

लो, खुशी का गीत फूटा पड रहा है,

प्राण, तुम भी एक सुख की तान भर लो;

आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो.

 .

धार अमृत की गगन से आ रही है,

प्यार की छाती उमडती जा रही है,

आज, लो, मादक सुधा का पान कर लो;

आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो.

 .

अब तुम्हें डर-लाज किससे लग रही है,

आँखे केवल प्यार की अब जग रही है,

मैं मनाना जानता हूँ, मान कर लो;

आज आओ चाँदनी में स्नान कर लो.

 .

( हरिवंशराय बच्चन )

 

 .

( हरिवंशराय बच्चन )

जानता हूँ प्यार – हरिवंशराय बच्चन

बाँह तुमने डाल दी ज्यों फूल माला

संग में, पर, नाग का भी पाश डाला,

जानता गलहार हूँ, जंजीर को भी;

जानता हूँ प्यार, उसकी पीर को भी.

 .

है अधर से कुछ नहीं कोमल कहीं पर,

किन्तु इनकी कोर से घायल जगत भर,

जानता हूँ पंखुरी, शमशीर को भी;

जानता हूँ प्यार, उसकी पीर को भी.

 .

कौन आया है सुरा का स्वाद लेने,

जोकि आया है हृदय का रक्त देने,

जानता मधुरस, गरल के तीर को भी;

जानता हूँ प्यार, उसकी पीर को भी.

 .

तीर पर जो उठ लहर मोती उगलती,

बीच में वह फाडकर जबडे निगलती

जानता हूँ तट, उदधि गंभीर को भी;

जानता हूँ प्यार, उसकी पीर को भी

 .

( हरिवंशराय बच्चन )

बचपन में – दीपक भास्कर जोशी

Moon

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बचपन में घर के पीछे की

अमराई में

एक छोटी सी नदी बहती थी

पूरनमासी के दिन

चांद उतर आता

था नदी के

आखरी मोड पर !

बचपन के नन्हें हाँथों

से मैं एक बार

चांदी की थाली सा चांद

नदी की परत से

उठा लाया था

और चिपका दिया था

कोने वाली दीवार पर !!

दिन में कहीं भी उसका

अस्तित्व

नहीं रहता था

लेकिन रात को

चमकता रहता

था

दीवार पर !

दादी की कही

चरखे वाली बूढी, खरगोश

सब दिखाई देते थे

नीलम परी के साथ

बचपन छूटा

गाँव की दीवार छूटी

नदी का मोड भी !

अब चांदी की थाली सा चांद

शहर की घनी बस्ती के

माथे पर दिखाई देता है

घर की दीवार पर नहीं दोस्त !

क्योंकि

घर के पीछे

न अमराई है

न उसके पीछे

आखरी मोड पर

मुडती नदी !

 .

( दीपक भास्कर जोशी )

कोई तो कमी होती – दीपक भास्कर जोशी

कोई तो कमी होती

गर तुम न साथ होती !

फूल मुरझाते

आँखों में बरसात होती

कोई तो कमी होती….

चांदनी रातों में

चांद भी

यूँ न खो गया होता

भीगी पलकों का

काजल भी यूँ न घुला-घुला होता

कोई तो कमी होती….

रिमझिम बादल भी यूँ न कभी बरसा होता

तितलियों के पंखों पर

न जुगनुओं की कहानी होती

कोई तो कमी होती….

गर तुम न तुम होती, मैं न मैं होता

न धडकनों में अपने-अपने चांद होते

कोई तो कमी होती….

 .

( दीपक भास्कर जोशी )

एक अनकही कहानी – दीपक भास्कर जोशी

मैं

जब भी संवेदन भार

से

उसके

कुछ और

करीब जाने के लिए

अपने

कदम बढाता हूँ,

तब

एक बिल्ली की

सधी उछाल की तरह

अपने प्रेमी के साथ गुजारी

चांद रातों की

कहानी सुनाने लगती है !

मानो मेरे बढते हुए कदम रोकना चाह रही हो !

तब मैं

मेरी कविताओं की डायरी

ताल के पानी पर

तैरते चांद के

प्रतिबिंब को

निशाना बना कर

फेंक देता हूँ

एक धीमी सी

डुबुक की आवाज होती है

और

कुछ नन्हे से पानी के बुलबुले

सतह पर आकर बिखर जाते है

सतह पर तैरते

चांद का प्रतिबिंब

बिखर जाता है……….!

मैं रुके हुए फैसले की तरह ताकता

रह जाता हूँ

बिखरे चांद के प्रतिबिंब

की ओर !

जब आखरी पानी का बुलबुला

सतह पर

आकर मिट जाता है

तब मैं अपने कदम

मोड लेता हूँ

उस दिशा में

जहाँ से मैं चला था.

 .

( दीपक भास्कर जोशी )

ભૂંસી નાખી – ઉર્વીશ વસાવડા

Stone in water

મળે આકાર એ પહેલાં જ માટીને ભૂંસી નાખી

મથ્યો જ્યાં નામ લખવા ત્યાં જ પાટીને ભૂંસી નાખી.

 .

સગડ મળશે નહીં તમને, તમે કોશિશ કરો તો પણ

અમારી જાત ઊંડે ખૂબ દાટીને ભૂંસી નાખી.

 .

ઉપાડી એક કંકર જળ મહીં ફેંક્યો વિના કારણ

યુગોથી સ્થિર જંપેલી સપાટીને ભૂંસી નાખી.

 .

હવે રોમાંચ કંપનમાં કે સ્પંદનમાં રહ્યો છે ક્યાં ?

ખબર પડતી નથી કોણે રુંવાટીને ભૂંસી નાખી.

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નયન વીંચ્યા હતાં, ચારે તરફના દ્રશ્યને નિરખીને

મૂકીને હાથ ખભ્ભે કમકમાટીને ભૂંસી નાખી.

 .

( ઉર્વીશ વસાવડા )

दो कवितायें – निदा फ़ाज़ली

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(1)

सोने से पहले

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हर लड़की के

तकिये के नीचे

तेज़  ब्लेड

गोंद की शीशी

और कुछ तस्वीरें होती है

सोने से पहले

वो कई तस्वीरों की तराश-ख़राश से

एक तस्वीर बनाती है

किसी की आँखे किसी के चेहरे पर लगाती है

किसी के जिस्म पर किसी का चेहरा सजाती है

और जब इस खेल से उब जाती है

तो किसी भी गोश्त-पोश्त के आदमी के साथ

लिपट कर सो जाती है

 .

(2)

सच्चाई

 .

वो किसी एक मर्द के साथ

ज़्यादा दिन नहीं रह सकती

ये उसकी कमज़ोरी नहीं

सच्चाई है

लेकिन जितने दिन वो जिसके साथ रहती है

उसके साथ बेवफ़ाई नहीं करती

उसे लोग भले ही कुछ कहें

मगर !!

किसी एक घर में

ज़िन्दगी भर झूठ बोलने से

अलग-अलग मकानों में सच्चाइयाँ बिखेरना

ज़्यादा बेहतर है

 .

( निदा फ़ाज़ली )

जादूगर – नन्दिनी मेहता

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आज उसे देखते ही मेरे आँसू निकल आये

स्वयं विधाता ही जैसे रुठ गये

कल तक हरा भरा पत्तियों से लदा था

आज बिलकुल सूखा ठूंठ रह गया था

उसके दुर्भाग्य पर आंसू बहाने

एक पत्ता तक नहीं था

 .

किसी जादूगर को आते मैंने नहीं देखा

किंतु एक दिन सबेरे बडा अजूबा देखा

हर सूखी डाल में निकल आयी

कोमल किसलय उंगलियां

प्रभात के स्वागत में जैसे

मेंहदी रची हथेलियां

डाली – डाली में उग आये असंख्य सुर्ख ओठ

नवजात शिशु से –

गुलाब की पंखुडी से –

छूने भर से कहीं लहू न टपक जायें ऐसे !

क्या इस जीव जगत को चूमने आये हैं

या जमाने के झमेलों में

इंसान के टूटते विश्वास को जगाने आये

सूखते प्राणों में नवजीवन भरने आये

 .

कभी सोचें सब खत्म हुआ

सब सूख गया

सब डूब गया

सब बिगड गया

सब टूट गया…

तब एक पुकार सुनी –

रुको, रुको…

उस जादूगर के आने की राह तो देखो !

 .

( नन्दिनी मेहता )

ત્રણ લઘુકાવ્યો-વી. પી. સિંહ

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(૧)

ગુમનામ

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એક દિવસ મારું નામ

મારાથી અલગ જઈને ઊભું રહ્યું

દુનિયાએ પૂછ્યું

‘આ બંનેમાં

તું કોણ છે ?’

મારા નામને જ

સાચું બતાવી

હું ખુદને નકારી ગયો

ત્યારથી

આ જગતમાં

હું એક અપરિચિત

ગુમનામ છું

.

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(૨)

ગ્રામોફોન રેકર્ડ

 .

કોતરી કાઢેલી અનુભૂતિઓનો

ચક્રવ્યુહ છું

એટલે જ

પીનની અણીથી વાગું છું

વેચાઉં છું

જે ચાહે મને નચાવી લે

વગાડી લે

પણ

ગીત એક જ ગાઉં છું

એ જ

જે મારી છાતી પર કોતરેલું છે

.

(૩)

મારી છબી

 .

જ્યારે પણ જુઓ

મારી છબી

મારા પર

હસે છે

છેવટે તો

મારો જ એક પોઝ છે

મારા દરેક પોઝને એ

બરાબર ઓળખે છે

મારા અંતિમ પોઝ પર પણ

એ હસવાની

કારણ હું તો જતો રહીશ

એ રહી જવાની

 .

( વી. પી. સિંહ, અનુ. હિતેન આનંદપરા )