गजल कहनी पडेगी – ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र

गजल कहनी पडेगी झुग्गियों पर कारखानों पर

ये फन वरना मिलेगा जल्द रद्दी की दुकानों पर

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कलन कहता रहा संभावना सब पर बराबर है,

हमेशा बिजलियाँ गिरती रहीं कच्चे मकानों पर

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लडाकू जेट उडाये खूब हमने रात दिन लेकिन

कभी पहरा लगा पाये न गिद्धों की उडानों पर

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सभी का हक है जंगल पे कहा खरगोश ने जबसे

तभी से शेर, चीते, लोमडी बैठे मचानों पर

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कहा सबने बनेगा एक दिन ये देश नंबर वन

नतीजा देखकर मुझको हँसी आई रुझानों पर

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( ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र )

सूरज से… – सौरभ पाण्डेय

ये साँझ सपाट सही

ज्यादा अपनी है

 .

तुम जैसी नहीं

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इसने तो फिर भी छुआ है

भावहीन पडे जल को तरंगित किया है

बार-बार जिन्दा रखा है

सिन्दूरी आभा के गर्वीले मान को

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कितने निर्लिप्त कितने विकल कितने न-जाने-से तुम !

 .

किसने कहा मुठ्ठियाँ कुछ जीती नहीं ?

लगातार रीतते जाने के अहसास को

इतनी शिद्त से भला और कौन जीता है !

तुमने थामा.. ठीक

खोला भी ? .. कभी ?

मैं मुठ्ठी होती रही लगातार

गुमती हुई खुद में…

 .

कठोर !

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( सौरभ पाण्डेय )

साथ-साथ – डॉ. सूर्या बाली ‘सूरज’

बेघर हुए हैं ख्वाब धमाकों के साथ-साथ

बहशत भी जिंदा रहती है साँसों के साथ-साथ

 .

जब रौशनी से दूर हूँ कैसी शिकायतें

अब उम्र कट रही है अँधेरों के साथ-साथ

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दरिया को कैसे पार करेगा वो एक शख्श

जिसने सफर किया है किनारों के साथ-साथ

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वीरान शहर हो गया जब से गया है तू

हालांकि रह रहा हूँ हजारों के साथ-साथ

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पत्ता शजर से टूट के दरिया में जो गिरा

आवारा वो भी हो गया मौजों के साथ-साथ

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मुद्त हुई की नींद चुरा ले गया कोई

कटती है अब तो रात सितारों के साथ-साथ

 .

तन्हाइयों के दौर में तन्हा नहीं रह

‘सूरज’ सफर में तिरी यादों के साथ-साथ

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( डॉ. सूर्या बाली ‘सूरज’ )

સાધુ ઐસા ચાહિએ – હરકિસન જોષી

ગેરૂઆ વસ્તર નહીં, ભભૂત ભસ્મ નહીં અંગ

સાધુ ઐસા ચાહિએ એકલ ઔર નિ:સંગ

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ટીવી પર ચમકે નહીં આપે નહીં વ્યાખ્યાન

સાધુ ઐસા ચાહિએ માન નહીં સન્માન

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આશ્રમ નહીં આસન નહીં, નહીં ટ્રસ્ટ મઠ ધામ

સાધુ ઐસા ચાહિએ નહીં સ્થાન નહીં ઠામ

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તિલક છાપ ચંદન નહીં, છત્ર મુગટ નહીં દંડ

સાધુ ઐસા ચાહિએ, ફંદ નહીં કોઈ ફંડ

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નામ નહીં ઓળખ નહીં, નહીં બિરુદ ઇલ્કાબ

સાધુ ઐસા ચાહિએ નિર્મલ બહેતા આબ

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નહીં તસ્વીર નહીં મૂરતી, પૂજન દે નહીં પાંવ

સાધુ ઐસા ચાહિએ જૈસી તરુવર છાંવ

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લિંગ ભેદ વ્યાપે નહીં ઐસા ચેતન દેહ

સાધુ ઐસા ચાહિએ પવન ઉડાઈ ખેહ

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તન મન હરિ કો દે દિયા આપ હરિમે લીન

સાધુ ઐસા ચાહિએ જૈસી જલમે મીન.

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( હરકિસન જોષી )

अच्छी लगी – हनीफ साहिल

रास्तों में गुमरही अच्छी लगी

ये तलाशे-बेखुदी अच्छी लगी

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मैंने देखा है उसे बस एक बार

एक लडकी अजनबी अच्छी लगी

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सारा दिन तो शोर रहता है यहां

शाम होते ही गली अच्छी लगी

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गम से गेहरा कोई भी दुश्मन नहीं

गम से अपनी दोस्ती अच्छी लगी

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गमकदे में तीरगी जब बढ गई

खूने-दिलकी रौशनी अच्छी लगी

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एक बस तेरी कमी खलती रही

वरना हमको जिंदगी अच्छी लगी

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शायरी से क्या मिला तुमको हनीफ

हां मगर ये सरखुशी अच्छी लगी

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( हनीफ साहिल )

તારી ગુલાબી હથેળી – સર્વેશ્વરદયાલ સક્સેના

પહેલી વાર

મેં જોયું પતંગિયું

કમલમાં રૂપાંતરિત થતું

પછી કમળ પરિવર્તન પામ્યું

ભૂરા જળમાં

ભૂરું જળ

અસંખ્ય પંખીઓમાં

અસંખ્ય પંખીઓ

રંગીન લાલ આકાશમાં

અને આકાશ રૂપાંતરિત થયું

તારી ગુલાબી હથેળીમાં…

આમ ને આમ મેં અનેકવાર જોયાં આંસુઓ

સપનામાં રૂપાંતરિત થતાં…

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( સર્વેશ્વરદયાલ સક્સેના, અનુ. સુરેશ દલાલ )

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મૂળ : હિન્દી

प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का – हरिवंशराय बच्चन

प्यास होती तो सलिल में डूब जाती,

वासना मिटती न तो मुझको मिटाती,

पर नहीं अनुराग है मरता किसी का;

प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का.

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तुम मिलीं तो प्यार की कुछ पीर जानी,

और ही मशहूर दुनिया में कहानी,

दर्द कोई भी नहीं हरता किसी का;

प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का.

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पाँव बढते, लक्ष्य उनके साथ बढता,

और पल को भी नहीं यह क्रम ठहरता,

पाँव मंजिल पर नहीं पडता किसी का;

प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का.

 .

स्वप्न से उलझा हुआ रहता सदा मन,

एक ही इसका मुझे मालूम कारण,

विश्व सपना सच नहीं करता किसी का;

प्यार से, प्रिय, जी नहीं भरता किसी का.

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( हरिवंशराय बच्चन )

क्यों आंसु – चिनु मोदी ‘ईर्शाद’

क्यों आंसु की धारा है ?

छत पर टूटा तारा है.

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सुखे खेत को मालूम है

बादल है, आवारा है ?

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‘अमां, यहां हूं’, बोल न पाया

अल्ला है, बेचारा है.

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करीब आकर सिकूड गया

साया मारा मारा है.

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सांस की बाजी, मत खेलो;

जो भी जीता, हारा है.

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( चिनु मोदी ‘ईर्शाद’ )

छाई घटा – दुर्गेश उपाध्याय

छाई घटा घनघोर,

सखीरी सावन बरसे.

वीज चमकत है ठोर,

सखीरी तन-मन तरसे.

 .

मोरे पियु भये परदेश,

नाही को’ सार-संदेहा.

जीवतर लागै भार,

सखीरी सावन बरसे.

छाई घटा…

 .

मोर-पपीहा शोर मचावत,

बाल करत कलशोर.

भीतर गरजै घोर,

सखीरी तन-मन तरसे

छाई घटा…

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( दुर्गेश उपाध्याय )

बाँध दो बिखरे सुरों को-हरिवंशराय बच्चन

गीत ठुकराया हुआ, उच्छवास-क्रंदन,

मधु मलय होता उपेक्षित हो प्रभंजन,

बाँध दो तूफान को मुसकान में तुम;

बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम.

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कल्पनाएँ आज पगलाई हुई हैं,

भावनाएँ आज भरमाई हुई हैं,

बाँध दो उनको करुण आह्वान में तुम;

बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम.

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व्यर्थ कोई भाग जीवन का नहीं हैं,

व्यर्थ कोई राग जीवन का नहीं हैं,

बाँध दो सबको सुरीली तान में तुम;

बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम.

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मैं कलह को प्रीति सीखलाने चला था,

प्रीति ने मेरे हृदय को छला था,

बाँध दो आशा पुन: मन-प्राण में तुम;

बाँध दो बिखरे सुरों को गान में तुम.

 .

( हरिवंशराय बच्चन )