ભૂંસી નાખી – ઉર્વીશ વસાવડા

Stone in water

મળે આકાર એ પહેલાં જ માટીને ભૂંસી નાખી

મથ્યો જ્યાં નામ લખવા ત્યાં જ પાટીને ભૂંસી નાખી.

 .

સગડ મળશે નહીં તમને, તમે કોશિશ કરો તો પણ

અમારી જાત ઊંડે ખૂબ દાટીને ભૂંસી નાખી.

 .

ઉપાડી એક કંકર જળ મહીં ફેંક્યો વિના કારણ

યુગોથી સ્થિર જંપેલી સપાટીને ભૂંસી નાખી.

 .

હવે રોમાંચ કંપનમાં કે સ્પંદનમાં રહ્યો છે ક્યાં ?

ખબર પડતી નથી કોણે રુંવાટીને ભૂંસી નાખી.

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નયન વીંચ્યા હતાં, ચારે તરફના દ્રશ્યને નિરખીને

મૂકીને હાથ ખભ્ભે કમકમાટીને ભૂંસી નાખી.

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( ઉર્વીશ વસાવડા )

दो कवितायें – निदा फ़ाज़ली

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(1)

सोने से पहले

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हर लड़की के

तकिये के नीचे

तेज़  ब्लेड

गोंद की शीशी

और कुछ तस्वीरें होती है

सोने से पहले

वो कई तस्वीरों की तराश-ख़राश से

एक तस्वीर बनाती है

किसी की आँखे किसी के चेहरे पर लगाती है

किसी के जिस्म पर किसी का चेहरा सजाती है

और जब इस खेल से उब जाती है

तो किसी भी गोश्त-पोश्त के आदमी के साथ

लिपट कर सो जाती है

 .

(2)

सच्चाई

 .

वो किसी एक मर्द के साथ

ज़्यादा दिन नहीं रह सकती

ये उसकी कमज़ोरी नहीं

सच्चाई है

लेकिन जितने दिन वो जिसके साथ रहती है

उसके साथ बेवफ़ाई नहीं करती

उसे लोग भले ही कुछ कहें

मगर !!

किसी एक घर में

ज़िन्दगी भर झूठ बोलने से

अलग-अलग मकानों में सच्चाइयाँ बिखेरना

ज़्यादा बेहतर है

 .

( निदा फ़ाज़ली )

जादूगर – नन्दिनी मेहता

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आज उसे देखते ही मेरे आँसू निकल आये

स्वयं विधाता ही जैसे रुठ गये

कल तक हरा भरा पत्तियों से लदा था

आज बिलकुल सूखा ठूंठ रह गया था

उसके दुर्भाग्य पर आंसू बहाने

एक पत्ता तक नहीं था

 .

किसी जादूगर को आते मैंने नहीं देखा

किंतु एक दिन सबेरे बडा अजूबा देखा

हर सूखी डाल में निकल आयी

कोमल किसलय उंगलियां

प्रभात के स्वागत में जैसे

मेंहदी रची हथेलियां

डाली – डाली में उग आये असंख्य सुर्ख ओठ

नवजात शिशु से –

गुलाब की पंखुडी से –

छूने भर से कहीं लहू न टपक जायें ऐसे !

क्या इस जीव जगत को चूमने आये हैं

या जमाने के झमेलों में

इंसान के टूटते विश्वास को जगाने आये

सूखते प्राणों में नवजीवन भरने आये

 .

कभी सोचें सब खत्म हुआ

सब सूख गया

सब डूब गया

सब बिगड गया

सब टूट गया…

तब एक पुकार सुनी –

रुको, रुको…

उस जादूगर के आने की राह तो देखो !

 .

( नन्दिनी मेहता )

ત્રણ લઘુકાવ્યો-વી. પી. સિંહ

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(૧)

ગુમનામ

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એક દિવસ મારું નામ

મારાથી અલગ જઈને ઊભું રહ્યું

દુનિયાએ પૂછ્યું

‘આ બંનેમાં

તું કોણ છે ?’

મારા નામને જ

સાચું બતાવી

હું ખુદને નકારી ગયો

ત્યારથી

આ જગતમાં

હું એક અપરિચિત

ગુમનામ છું

.

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(૨)

ગ્રામોફોન રેકર્ડ

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કોતરી કાઢેલી અનુભૂતિઓનો

ચક્રવ્યુહ છું

એટલે જ

પીનની અણીથી વાગું છું

વેચાઉં છું

જે ચાહે મને નચાવી લે

વગાડી લે

પણ

ગીત એક જ ગાઉં છું

એ જ

જે મારી છાતી પર કોતરેલું છે

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(૩)

મારી છબી

 .

જ્યારે પણ જુઓ

મારી છબી

મારા પર

હસે છે

છેવટે તો

મારો જ એક પોઝ છે

મારા દરેક પોઝને એ

બરાબર ઓળખે છે

મારા અંતિમ પોઝ પર પણ

એ હસવાની

કારણ હું તો જતો રહીશ

એ રહી જવાની

 .

( વી. પી. સિંહ, અનુ. હિતેન આનંદપરા )

रात की काली चादर – जावेद अख्तर

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रात की काली चादर ओढे

मुंह को लपेटे

सोइ है कब से

रुठ के सबसे

सुबह की गोरी

आँख न खोले

मुंह से न बोले

जब से कीसीने

कर ली है सूरज की चोरी

आओ

चल के सूरज ढूंढे

और न मिले तो

किरन किरन फिर जमा करें हम

और इक सूरज नया बनाये

सोई है कब से

रुठ के सब से

सुबह की गोरी

उसे जगायें

उसे मनायें

 .

( जावेद अख्तर )

इस जहाँ में – राजेश रेड्डी

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इस जहाँ में यूँ तो सब आसान है

मेरी मुश्किल बस मेरा ईमान है

 .

जाने कब इस जिस्म से छूटूँगा मैं

जाने किस तोते में मेरी जान है

 .

कर रहा है इक सदी का इंतज़ाम

चार दिन का जो यहाँ मेहमान है

 .

क्या अजब है मौत है राहत का नाम

और ग़मों का ज़िन्दगी उनवान है

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ग़मज़दा तो सब हैं गौतम की तरह

सबकी क़िस्मत में कहाँ निर्वान है

 .

( राजेश रेड्डी )

या खुदा ! – राजेश रेड्डी

या खुदा ! कैसे ज़माने आ गए

फ़ैसला क़ातिल सुनाने आ गए

 .

लोग जी लेते हैं कैसे ज़िन्दगी

होश अपने तो ठिकाने आ गए

 .

ढूँढने निकले थे हम तो इक ख़ुशी

हाथ में ग़म के ख़जाने आ गए

 .

हमने रोए जिनके आँसू उम्र भर

वो भी हम पर मुस्कुराने आ गए

 .

इक पुराने ग़म से हम निकले ही थे

कुछ नए ग़म आज़माने आ गए

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( राजेश रेड्डी )

जैसी है – निदा फाजली

ज़िन्दगी इंतजार जैसी है

दूर तक रहगुजार जैसी है

 .

चंद बेचेहरा आहटों के सिवा

सारी बस्ती मज़ार जैसी है

 .

रास्ते चल रहे हैं सदियों से

कोई मंजिल गुबार जैसी है

 .

कोई तन्हाई अब नहीं तन्हा

हर खामोशी पुकार जैसी है

 .

ज़िन्दगी रोज़ का हिसाब किताब

कीमती शै उधार जैसी है

 .

( निदा फाजली )

[ शै = वस्तु ]

पिया, खोलो किवाड – हरिवंशराय बच्चन

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पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

 .

बगिया में मरमर,

दुनिया में जगहर,

उतरी किरन की कतारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

 .

कलियों में गुन-गुन,

गलियों में रुन-झुन,

अम्बर से गाती बहारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

.

पतझर को भूली,

हर डाली फूली,

बीती को हम भी बिसारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

 .

गूंगी थीं घडियां,

गीतों की कडियां,

वीणा को फिर झनकारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

 .

माना कि दुख है,

बिधना विमुख है,

आओ उसे ललकारें.

पिया, खोलो किवाड,

पिया, खोलो किवाड,

कोयल की गूंजी पुकारें.

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( हरिवंशराय बच्चन )

मुझे अपनी आँखो पर – मुनि रुपचन्द्र

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मुझे अपनी आँखो पर विश्वास न हुआ

जब मैं ने देखा

कि मन्दिर के दालान में बैठे भक्त लोग

बडे ऊँचे स्वर में राम-धुन गा रहे हैं

जब कि उधर मन्दिर के पिछले दरवाजे से

भगवान उलटे पैरों भागे जा रहे हैं

चरण छू कर, काँपते हुए पूछा मैं ने,

भगवन ! आप का यह क्या हाल ?

तो उन्हों ने हाँफते-हाँफते कहा-

रोको मत मुझे,

यहाँ अधिक नहीं ठहर सकता अब मैं;

इन लोगों ने बिछा रखा है मेरे लिए पग-पग पर जाल

मैं दिग्भ्रमित सा बोला-

जाल कैसा ?

वे तो आप के नाम की रटन लगा रहे हैं

आप की मूरत पर ही वे अपना सर्वस्व चढा रहे हैं.

अव की बार वे झुँझला कर बोले-

हाँ, इस लिए ही तो

लोग उन से ईमानदारी-पूर्वक ठगे जा रहे हैं.

किन्तु मेरा अब निर्णय है

कि मैं उस नास्तिक के यहाँ भी रहना पसन्द करुंगा

जो अपने प्रति सच्चा है और शुद्ध है जिस का आचार

पर यहाँ मैं अब नहीं टिक सकता

जिन्होंने धर्म और ईश्वर के नाम पर

फैला रखा है इतना-इतना भ्रष्टाचार

सुनकर मैं अवाक रह गया

किन्तु फिर भी अपनी आँखों पर विश्वास न हुआ

और मैं ने ध्यान से देखा

कि मन्दिर के दालान में भक्त-लोग

बडे ऊँचे स्वर में राम-धुन गा रहे हैं

जब कि उधर मन्दिर के पिछले दरवाजे से

भगवान उलटे पैरों भागे जा रहे हैं

 .

( मुनि रुपचन्द्र )