उस पार – बृजेश नीरज

सोचता हूँ

क्या होगा

नीले आकाश के पार

 .

कुछ होगा भी

या होगा शून्य

.

शून्य

मन जैसा खाली

जीवन सा खोखला

आँखों सा सूना

या

रात जैसा स्याह

 .

कैसा होगा सब कुछ

होगी गौरैया वहाँ ?

देह पर रेगेंगी चींटियाँ ?

 .

या होगा सब

इस पेड की तरह

निर्जन और उदास;

सागर में बूँद जितना

अकल्पनीय

जाए बिन

जाना कैसे जाए

और जाने को चाहिए

पंख

पर पंख मेरे पास तो नहीं

.

चलो पंछी से पूछ आएँ-

गरुड से

 .

ढूँढते हैं गरुड को

 .

( बृजेश नीरज )

याद के बादल – आशा पाण्डेय ओझा

फिर घिर आये

याद के बादल

फिर हरिया उठा

पीड का पलाश

फिर झरी

मन की छत पर

गीली-चाँदनी ख्वाबों की

हल्की-हल्की बयार ने

फिर खोली आज

चाहत के दिनों से

जोडी हुई

सुरभिमय अहसास की

वो रंग-बिरंगी शीशियाँ

जो दबा रखी है

मन की तहों के नीचे

सबसे छुपकर मैंने

और शायद

तुमने भी

 .

( आशा पाण्डेय ओझा )

अपने अंतर में ढालो ! – राहुल देव

मेरे अंतर को

अपने अंतर में ढालो

हे इतिवृत्तहीन

अकल्मष !

मेरे अंतस के दोषों में

श्रम प्रसूति स्पर्धा दो

बनूँ मैं पूर्ण इकाई जीवन की

गूंजे तेरा निनाद उर में हर क्षण

विश्वनुराक्त !

तम दूर करो इस मन का

अंतर्पथ कंटक शून्य करो

हरो विषाद दो आह्लाद

मैं बलाक्रांत, भ्रांत, जडमति

विमुक्ति, नव्यता, ओज मिले

परिणीत करो मेरा तन-मन

मैं नित-नत पद प्रणत

नि:स्व

तुम्हारी शरणागत !

 .

( राहुल देव )

गजल कहनी पडेगी – ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र

गजल कहनी पडेगी झुग्गियों पर कारखानों पर

ये फन वरना मिलेगा जल्द रद्दी की दुकानों पर

 .

कलन कहता रहा संभावना सब पर बराबर है,

हमेशा बिजलियाँ गिरती रहीं कच्चे मकानों पर

 .

लडाकू जेट उडाये खूब हमने रात दिन लेकिन

कभी पहरा लगा पाये न गिद्धों की उडानों पर

 .

सभी का हक है जंगल पे कहा खरगोश ने जबसे

तभी से शेर, चीते, लोमडी बैठे मचानों पर

 .

कहा सबने बनेगा एक दिन ये देश नंबर वन

नतीजा देखकर मुझको हँसी आई रुझानों पर

.

( ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र )

सूरज से… – सौरभ पाण्डेय

ये साँझ सपाट सही

ज्यादा अपनी है

 .

तुम जैसी नहीं

 .

इसने तो फिर भी छुआ है

भावहीन पडे जल को तरंगित किया है

बार-बार जिन्दा रखा है

सिन्दूरी आभा के गर्वीले मान को

 .

कितने निर्लिप्त कितने विकल कितने न-जाने-से तुम !

 .

किसने कहा मुठ्ठियाँ कुछ जीती नहीं ?

लगातार रीतते जाने के अहसास को

इतनी शिद्त से भला और कौन जीता है !

तुमने थामा.. ठीक

खोला भी ? .. कभी ?

मैं मुठ्ठी होती रही लगातार

गुमती हुई खुद में…

 .

कठोर !

 .

( सौरभ पाण्डेय )

साथ-साथ – डॉ. सूर्या बाली ‘सूरज’

बेघर हुए हैं ख्वाब धमाकों के साथ-साथ

बहशत भी जिंदा रहती है साँसों के साथ-साथ

 .

जब रौशनी से दूर हूँ कैसी शिकायतें

अब उम्र कट रही है अँधेरों के साथ-साथ

 .

दरिया को कैसे पार करेगा वो एक शख्श

जिसने सफर किया है किनारों के साथ-साथ

 .

वीरान शहर हो गया जब से गया है तू

हालांकि रह रहा हूँ हजारों के साथ-साथ

 .

पत्ता शजर से टूट के दरिया में जो गिरा

आवारा वो भी हो गया मौजों के साथ-साथ

 .

मुद्त हुई की नींद चुरा ले गया कोई

कटती है अब तो रात सितारों के साथ-साथ

 .

तन्हाइयों के दौर में तन्हा नहीं रह

‘सूरज’ सफर में तिरी यादों के साथ-साथ

 .

( डॉ. सूर्या बाली ‘सूरज’ )

Found the secret – Andre Breton

You pretend not to notice I am watching you

Marvellously I am no longer sure you know

Your idleness fills my eyes with tears

A swarm of interpretations surrounds

each one of your gestures

It is the hunt for honey dew

There are rocking-chairs on a deck

there are branches that could scratch you

in the forest there are

In a shop-window in the rue

Notre-Dame-de-Lorette

Two beautiful crossed legs in long stockings

That flare out in the centre of a great

white clover

There is a silken ladder unrolled in the ivy

There is

Only the need for me to lean over the precipice

Of the hopeless fusion of your presence

and your absence

I have found the secret

Of loving you

Always for the very first time

 .

( Andre Breton )

 .

( French )

બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે – નીરજ મહેતા

રાતો ગજવામાં મૂકે છે, બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે

ક્યાં કાન ધરે કોઈ શું કે’ છે, બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે

 .

બધ્ધા ઉપર તાડૂકે છે, નજરુંનું અમરત ડૂકે છે

સમજણની ગાય વસૂકે છે, બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે

 .

કોઈ માટે સન્માન નથી, શું બોલે છે-કૈં ભાન નથી

કડવીવખ વાણી થૂંકે છે, બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે

 .

સ્મરણોનાં વાદળ વીખરાયાં, એકલતાના બસ પડછાયા

કોઈ ક્યાં પાસે ઢૂંકે છે, બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે

 .

ફૂલોનો આસવ અધરો પર-ને વાત હવે પાછી ના કર

સોડમ પીવાનું ચૂકે છે, બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે

 .

ત્યાંથી નીચે બસ ખાઈ હશે-એ વાત નહીં સમજાઈ હશે

ઘનઘોર નશાની ટૂંકે છે, બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે

 .

ભીતરનું જંતર રણઝણતું, એ જાય હવે તો આથમતું

ભંડાર ભર્યા સંદૂકે છે… બીડીમાં દિવસો ફૂંકે છે

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( નીરજ મહેતા ‌)