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उर्मिला-राजेश्वर वशिष्ठ

टिमटिमाते दियों से
जगमगा रही है अयोध्या
सरयू में हो रहा है दीप-दान
संगीत और नृत्य के सम्मोहन में हैं
सारे नगरवासी
हर तरफ जयघोष है —-
अयोध्या में लौट आए हैं राम!
अंधेरे में डूबा है उर्मिला का कक्ष
अंधेरा जो पिछले चौदह वर्षों से
रच बस गया है उसकी आत्मा में
जैसे मंदिर के गर्भ-गृह में
जमता चला जाता है सुरमई धुँआ
और धीमा होता जाता है प्रकाश!
वह किसी मनस्विनी-सी उदास
ताक रही हैं शून्य में
सोचते हुए — राम और सीता के साथ
अवश्य ही लौट आए होंगे लक्ष्मण
पर उनके लिए उर्मिला से अधिक महत्वपूर्ण है
अपने भ्रातृधर्म का अनुशीलन
उन्हें अब भी तो लगता होगा —-
हमारे समाज में स्त्रियाँ ही तो बनती हैं
धर्मध्वज की यात्रा में अवांछित रुकावट —
सोच कर सिसक उठती है उर्मिला
चुपके से काजल के साथ बह जाती है नींद
जो अब तक उसके साथ रह रही थी सहचरी-सी!
अतीत घूमता है किसी चलचित्र-सा
गाल से होकर टपकते आँसुओं में
बहने लगते हैं कितने ही बिम्ब!
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चिंतित हैं राजा जनक
रजस्वला हो गई हैं दोनों बेटियाँ
पर वे अब भी खेलती हैं बच्चों की तरह
पुरोहित से करते हैं विमर्श
उनके विवाह के लिए
पड़ौसी राजाओं की नज़र लगी है
परम सुंदरी सीता पर
अब सीता का विवाह करना ही होगा
खोजना होगा ऐसा वर
जो प्रत्यंचा तान दे शिव के धनुष की!
सोचती है उर्मिला—-
सच, परम सुंदरी हैं बहन सीता
पर क्या मुझमें कोई कमी है, ईश्वर?
काश, मैं भी पिता को मिली होती
किसी नदी, नाले या खेत खलिहान में
मेरे लिए भी आता
कोई शिव या किसी अन्य देवता का धनुष
मुझे भी चाहता कोई विशिष्ट धनुर्धर!
नहीं, पर यह कैसे होता,
मैं वीर्य-शुल्का जो नहीं थी
इसलिए मुझे भी
विदा कर दिया गया सीता के साथ
ताकि लक्ष्मण को मिल सके पत्नी
और मैं विवाह के बाद भी
सीता की सहचरी बनूँ
स्त्रियाँ स्नेह में भी बना दी जाती हैं दास
उस दिन मिथिला में
यही तय हुआ था उर्मिला के लिए!
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न वाल्मीकि बताएंगे न तुलसी
अयोध्या के महल में कैसे रहती थी उर्मिला?
चार बहनों में
श्रेष्ठ और ज्येष्ठ थी सीता
भोर की मलयानिल में हम पहुँच जाते थे सीता मंदिर
देर तक होता था वेदोच्चार
यज्ञ-धूम्र से महक जाता था सारा महल
और हम चरण छूकर आशीर्वाद लेते थे ऋषियों से
सभी राजकुमार साथ साथ चलते थे अपनी पत्नियों के
पर मैं सदा अकेली ही क्यों रही?
लक्ष्मण सदा ही चले राम और सीता के पीछे
हे दैव, बोलो उन क्षणों में कौन था उर्मिला के साथ?
बोलो दैव, रात को जब कई बार
बुझ चुकी होती थी दिए की बाती
प्रतीक्षा में अकड़ने लगता था मेरा शरीर
तब थक कर,
पिता और भाई के चरण दबा कर
लौटते थे मेरे पति
मैं स्नेह से सुला देती थी उन्हें पुत्रवत
और रात भर जलती थी बिना तैल की बाती सी
क्या आपने यही नियति तय की थी उर्मिला के लिए?
******************
राम जा रहे थे वनवास पर
विशद व्याकुलता के क्षण थे
महल में मचा था हाहाकार
सीता का आग्रह था वह जाएगी राम के साथ
मुझे तो अंत तक यह भी मालूम नहीं था
कि लक्ष्मण भी वन जाएंगे उन के साथ
मैं जड़वत खड़ी थी महल के द्वार पर
और लक्ष्मण ने आकर कहा —
सुनो, तुम मेरी अनुपस्थिति में
रखोगी मेरी सभी माताओं का ध्यान
यदि उन्हें कष्ट हुआ
तो हम नरक के भागी होंगे!
और वह बिना मुझे सांत्वना का
एक भी शब्द कहे दौड़ गए राम के पीछे
दैव, ऐसा तो कोई
अपनी परिचारिका के साथ भी नहीं करता
मैं तो अग्नि की साक्षी में उनकी पत्नी बनी थी!
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ये चौदह वर्ष कैसे काटे हैं उर्मिला ने
पूछो किसी व्रती से
पूछो किसी ऐसी स्त्री से
जिसे दण्ड मिला हो सुहाग का
जो वचनबद्ध होकर जी रही हो
किसी काल्पनिक पुरुष के लिए
सतयुग में भी यही जीवन था एक स्त्री का!
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दीपपर्व है आज
और मेरे मन में गहन अंधकार है
सच कहूँ तो मुझे प्रतीक्षा नहीं है लक्ष्मण की
मुझे प्रतीक्षा नहीं है अपने धर्म परायण पति की
उनका आना, आना है किसी शेषनाग का
जिसके फन पर पूरी पृथ्वी स्थापित है
जो फुंकार सकता है
भस्म कर सकता है पूरा ब्रह्मांड
पर अपने शीश को
प्रेयसी के वक्ष पर नहीं टिका सकता!
उर्मिला, मैं तुमसे क्षमा चाहता हूँ
बिना उस अपराधबोध से मुक्त हुए
जो पुरुष ने सदा ही दिया है स्त्री को
कुछ भी तो नहीं बदला आज तक
स्त्री तो स्त्री ही रही
इस सतयुग से कलयुग तक की यात्रा में!
.
( राजेश्वर वशिष्ठ )

याद रखना एक बात-निलाक्ष मिश्रा “अस्तित्व”

ठहरोगे
तो कुचल दिया जाएगा
तुम्हारी चेतना को..
.
दौड़ोगे तो
काट दिया जाएगा
तुम्हारी टांगों को..
.
तुम्हारी हँसी को
बेशर्म हँसी कहा जाएगा..
.
पर याद रखना एक बात
किसी के
एहसानों तले नहाने से बेहतर होगा
अपने रक्त से नहा लेना…
ऐसा करने से बच जाओगे
अपने मूँह पर थूके जाने से..
.
( निलाक्ष मिश्रा “अस्तित्व” )

॥ जानकी के लिए ॥-राजेश्वर वशिष्ठ

मर चुका है रावण का शरीर
स्तब्ध है सारी लंका
सुनसान है किले का परकोटा
कहीं कोई उत्साह नहीं
किसी घर में नहीं जल रहा है दिया
विभीषण के घर को छोड़ कर।
.
सागर के किनारे बैठे हैं विजयी राम
विभीषण को लंका का राज्य सौंपते हुए
ताकि सुबह हो सके उनका राज्याभिषेक
बार बार लक्ष्मण से पूछते हैं
अपने सहयोगियों की कुशल क्षेम
चरणों के निकट बैठे हैं हनुमान!
.
मन में क्षुब्ध हैं लक्ष्मण
कि राम क्यों नहीं लेने जाते हैं सीता को
अशोक वाटिका से
पर कुछ कह नहीं पाते हैं।
.
धीरे धीरे सिमट जाते हैं सभी काम
हो जाता है विभीषण का राज्याभिषेक
किंतु राम प्रवेश नहीं करते लंका में
बाहर ही ठहरते हैं एक ऊँचे टीले पर।
.
भेजते हैं हनुमान को अशोक-वाटिका
यह समाचार देने के लिए
कि मारा गया है रावण
और अब लंकाधिपति हैं विभीषण।
.
सीता सुनती हैं इस समाचार को
और रहती हैं खामोश
कुछ नहीं कहती
बस निहारती है रास्ता
रावण का वध करते ही
वनवासी राम बन गए हैं सम्राट?
.
लंका तक पहुँच कर भी भेजते हैं अपना दूत
नहीं जानना चाहते एक वर्ष कहाँ रही सीता
कैसे रही सीता?
नयनों से बहती है अश्रुधार
जिसे समझ नहीं पाते हनुमान
कह नहीं पाते वाल्मीकि।
.
राम अगर आते तो मैं उन्हें मिलवाती
इन परिचारिकाओं से
जिन्होंने मुझे भयभीत करते हुए भी
स्त्री की पूर्ण गरिमा प्रदान की
वे रावण की अनुचरी तो थीं
पर मेरे लिए माताओं के समान थीं।
.
राम अगर आते तो मैं उन्हें मिलवाती
इन अशोक वृक्षों से
इन माधवी लताओं से
जिन्होंने मेरे आँसुओं को
ओस के कणों की तरह सहेजा अपने शरीर पर
पर राम तो अब राजा हैं
वह कैसे आते सीता को लेने?
.
विभीषण करवाते हैं सीता का शृंगार
और पालकी में बिठा कर पहुँचाते है राम के भवन पर
पालकी में बैठे हुए सीता सोचती है
जनक ने भी तो उसे विदा किया था इसी तरह!
.
वहीं रोक दो पालकी,
गूँजता है राम का स्वर
सीता को पैदल चल कर आने दो मेरे समीप!
ज़मीन पर चलते हुए काँपती है भूमिसुता
क्या देखना चाहते हैं
मर्यादा पुरुषोत्तम, कारावास में रह कर
चलना भी भूल जाती हैं स्त्रियाँ?
.
अपमान और उपेक्षा के बोझ से दबी सीता
भूल जाती है पति मिलन का उत्साह
खड़ी हो जाती है किसी युद्ध-बंदिनी की तरह!
कुठाराघात करते हैं राम —- सीते, कौन होगा वह पुरुष
जो वर्ष भर पर-पुरुष के घर में रही स्त्री को
करेगा स्वीकार ?
मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ, तुम चाहे जहाँ जा सकती हो।
.
उसने तुम्हें अंक में भर कर उठाया
और मृत्यु पर्यंत तुम्हें देख कर जीता रहा
मेरा दायित्व था तुम्हें मुक्त कराना
पर अब नहीं स्वीकार कर सकता तुम्हें पत्नी की तरह!
.
वाल्मीकि के नायक तो राम थे
वे क्यों लिखते सीता का रुदन
और उसकी मनोदशा?
उन क्षणों में क्या नहीं सोचा होगा सीता ने
कि क्या यह वही पुरुष है
जिसका किया था मैंने स्वयंवर में वरण
क्या यह वही पुरुष है जिसके प्रेम में
मैं छोड़ आई थी अयोध्या का महल
और भटकी थी वन, वन!
.
हाँ, रावण ने उठाया था मुझे गोद में
हाँ, रावण ने किया था मुझसे प्रणय निवेदन
वह राजा था चाहता तो बलात ले जाता अपने रनिवास में
पर रावण पुरुष था,
उसने मेरे स्त्रीत्व का अपमान कभी नहीं किया
भले ही वह मर्यादा पुरुषोत्तम न कहलाए इतिहास में!
.
यह सब कहला नहीं सकते थे वाल्मीकि
क्योंकि उन्हें तो रामकथा ही कहनी थी!
.
आगे की कथा आप जानते हैं
सीता ने अग्नि-परीक्षा दी
कवि को कथा समेटने की जल्दी थी
राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौट आए
नगर वासियों ने दीपावली मनाई
जिसमें शहर के धोबी शामिल नहीं हुए।
.
आज इस दशहरे की रात
मैं उदास हूँ उस रावण के लिए
जिसकी मर्यादा
किसी मर्यादा पुरुषोत्तम से कम नहीं थी।
.
मैं उदास हूँ कवि वाल्मीकि के लिए
जो राम के समक्ष सीता के भाव लिख न सके।
आज इस दशहरे की रात
मैं उदास हूँ स्त्री अस्मिता के लिए
उसकी शाश्वत प्रतीक जानकी के लिए!
.
( राजेश्वर वशिष्ठ )

ઘણી ખમ્મા!-હર્ષા દવે

શિખર ઉપર દીવો પ્રગટાવનારાને ઘણી ખમ્મા!
તળેટીનો ખૂણો અજવાળનારાને ઘણી ખમ્મા!
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હલેસા મારવાનાં જોમથી વાકેફ થવાયું છે,
મને મઝધાર માં છોડી જનારાને ઘણી ખમ્મા!
.
પગરખાં પહેરવા મળતા નથી – સંજોગવશ જેને,
બધાં એ સ્થિર ડગલાં માંડનારાને ઘણી ખમ્મા!
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છતાં કઠપૂતળીને લાગતું કે મુક્ત છે પોતે,
ચીવટથી એમ દોરી બાંધનારાને ઘણી ખમ્મા!
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હતો વાકેફ તો મારી થનારી હારથી એ પણ,
અહો! છેવટ સુધી પડકારનારાને ઘણી ખમ્મા!
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( હર્ષા દવે )

आषाढस्य प्रथम दिवसे-લાલજી કાનપરિયા

વરસે કોના સ્મરણોનો વરસાદ રે આ आषाढस्य प्रथम दिवसे?
જળથી લથબથ કોણ પાડતું સાદ રે આ आषाढस्य प्रथम दिवसे?

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મોરપીંછના રંગો પહેરી બાળાવેશે કોણ આંગણે આવે પાછું?
ભીના ભીના ટહુકાની છાબ ભરીને કોણ આંગણે લાવે પાછું?
મનને ચડતો હરિયાળો ઉન્માદ રે આ आषाढस्य प्रथम दिवसे..
વરસે કોના સ્મરણોનો વરસાદ રે આ आषाढस्य प्रथम दिवसे?

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હસ્તરેખાઓ બધીય જળના રેલા થઈને વહી જાય અચાનક આજે
મેઘધનું શી રંગીન વાતો પવન કાનમાં કહી જાય અચાનક આજે..
લોહી સોંસરો ઉઠે છે એક નાદ રે આ आषाढस्य प्रथम दिवसे?
વરસે કોના સ્મરણોનો વરસાદ રે આ आषाढस्य प्रथम दिवसे?

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( લાલજી કાનપરિયા )

અષાઢસ્ય પ્રથમ દિવસે-નિશિ સિંહ

ચાર ચાર મહિના તર ગાજે !
બીજ અષાઢી ભીતર ગાજે !

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ગાજે મેઘાડંબર ગાજે !
મેઘદૂતમ તણા જર ગાજે !

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ઓકળીયું અકળાય સજનવા,
વીજલડીનાં મંતર ગાજે !

.

કાલિદાસીય ખંડકાવ્યનાં,
શૃંગારોની જંતર ગાજે !

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ઊંઘુ – જાગું, જાગું – ઊંઘુ,
ગૂંથી વેણીનાં સ્વર ગાજે !

.

મેઘ મલ્હાર, ઘટા ઘનઘોર,
પાંખે પંખીની ડર ગાજે !

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શામળિયો તો ગોકુળિયે ને,
નખશિખ મોરે હરિવર ગાજે !

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( નિશિ સિંહ )

મને ચડી ગઈ-દાન વાઘેલા

મને ચડી ગઈ રોમ-રોમ ટાઢ !

ગાજ નહીં, વીજ નહીં, પૂનમ કે બીજ નહીં-

ઓચિંતો ત્રાટક્યો આષાઢ !

મને ચડી ગઈ…

.

ઘરમાંથી ઉંબરાની મર્માળી ઠેસ

છતાં ચાલી હું મીણ જેમ પીગળી !

માઝમની રાતે આ મન એવું મૂંઝાણું:

જાણે કે વીંંટળાતી વીજળી !

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કોને ખબર છે કે ગામ આખું કોરું

પણ ડૂબ્યાં આ મેડી ને માઢ !

મને ચડી ગઈ…

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દરિયાનાં મોજાં તો માપી શકાય

અરે ! ફળિયાની ફાળ કેમ માપવી ?

સોળ-સોળ ચોમાસાં સંઘરેલી છતરીને

શેરીમાં કોને જઈ આપવી ?

.

રુદિયામાં ફુવારા ફૂટે છે

જાણે કે પિલાતો શેલડીનો વાઢ !

મને ચડી ગઈ…

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( દાન વાધેલા )

बच्चा हुआ है-मनमीत सोनी

कुछ महीनों पहले तक
जब भी कहीं आस-पास थाली बजती थी
माँ दौड़कर जाती थी छत पर
और नीचे आकर हम सबसे कहती थी
“उनके यहाँ बच्चा हुआ है”
माँ की ख़ुशी में
कम से कम मैं तो शरीक़ नहीं होता था
मुझे यही लगता था
“बच्चा ही तो पैदा हुआ है”
अब जब मुहल्ले के
हर दूसरे-तीसरे घर में मातम पसरा है
मैं अकेला छत पर खड़ा रहता हूँ
एक अदद थाली की आवाज़ सुनने के लिए
मैं
थाली की आवाज़ सुनकर
नीचे वाले कमरे में जाना चाहता हूँ
और माँ को बताना चाहता हूँ
“उनके यहाँ बच्चा हुआ है”

मैं कविताएँ क्यों लिखता हूँ-

मैं जानता हूँ श्रीमान
मेरी कविताएँ वैसी नहीं है जैसी हुआ करती हैं
इनमें प्रकृति का चित्रण नहीं
इनमें स्त्रियों का सौंदर्य नहीं
इनमें जीवन का दर्शन नहीं
इनमें वह तैयारी नहीं जैसी मंझे हुए कवि करते हैं
.
लेकिन मैं क्या करूँ श्रीमान
मैं जब सुबह सो कर उठता हूँ
तो इस दुनिया को देखकर मेरे दिल में एक हूक-सी उठती है
अगर पाँच हज़ार बरसों में यहीं तक पहुंचना था तो नंगे-असभ्य-निरक्षर भले थे हम
.
लेकिन मैं क्या करूँ श्रीमान
सुबह से शाम तक आते-आते
कितनी बुरी तरह थक जाते हैं मेरे आस-पास के लोग
ये मरना चाहते हैं लेकिन सोचते हैं मरने में कष्ट होगा
इससे बेहतर है जिये जाते हैं
मैं इन्हें झिंझोड़ना चाहता हूँ लेकिन मैं होता कौन हूँ
.
लेकिन मैं क्या करूँ श्रीमान
इस दुनिया की रात तो अंधेरे से भी काली है
प्रेमियों-स्त्रियों-बुजुर्गों के दुःख कितने भयानक हैं
भूखों के उनसे भी अधिक दारुण और डरवाने
मैं इन सबका साक्षी हूँ श्रीमान
.
तब मैं डायरी उठाकर
उसके पीछे अपना काला मुँह छिपा लेता हूँ
आड़ी-तिरछी लकीरें खींचता हूँ
और उन लकीरों को बिना किसी खास तैयारी के
कविताओं के बहुत बड़े डस्टबिन में बिना किसी अफसोस के फेंक देता हूँ श्रीमान
.
कुछ नहीं हो सकता
कुछ नहीं हो सकेगा
जैसी बातें करते-करते
कब मेरी आँख लग जाती है
मुझे ख़ुद ही पता नहीं चलता श्रीमान
.
फिर सुबह
वही दुनिया वही दुख
वही शाम वही थकन
वही रात और वही काला अंधेरा
कविता मुझ मजबूर की मजबूरी है
जैसे जीवन को घसीटना इस दुनिया की
मैं जानता हूँ श्रीमान
मेरी कविताएँ वैसी नहीं हैं जैसी हुआ करती हैं..!
.
( मनमीत सोनी )

कोरोना-समय में एक मृतक की अनलिखी कविताएँ-मनमीत सोनी

1.

मृतक भी तो चाहता होगा

अंतिम बार देख ले उन्हें

जिन्हें वह हर दिन देखता था!

.

2.

फूंको मत

जलाओ मत-

.

अग्नि दो मुझे!

.

3.

बंद शीशों वाली एम्बुलेंस में

सीधे श्मशान घाट ले गए मुझे!

.

अहा!

.

वह मेरा बरामदा

वह चार कंधों का झूला

वह पुराने बाज़ार का आख़िरी चक्कर

वह रोना जो आज के दिन सिर्फ़ मेरे हिस्से का था

.

अब टीस बनकर रह गया है!

.

4.

जब राख हो जाऊँगा

तब इन्फेक्टेड नहीं कहलाऊंगा-

.

गंगा में बहूँगा

कलमुँही बीमारी को चिढ़ाते हुए!

 

5.

संसारियो!

तुम्हारा मृत्यु-बोध मर चुका था

.

मैंने असमय मर कर

उसे फिर से जीवित कर दिया है..!

.

6.

एक मेला था

जिसमें सब लोग जी रहे थे

नाच रहे थे, खा रहे थे, पी रहे थे-

फिर एक सच्ची अफ़वाह उड़ी

भगदड़ मची और मैं

उसमें कुचलकर मर गया!

.

( मनमीत सोनी )