मेरी आवश्यकता – बृजेश नीरज

अब तक संजोए था

अपना आकाश

और एक धरती

 .

लेकिन जाने कहाँ से

तुम आ गए जीवन में

तोडकर सारे मिथक

औए वे झरोखे बंद हो गए

जहाँ से देखता था

आकाश

टूट गए वो पैमाने

जिनसे नापता था धरती

 .

तुम्हारे प्रेम में

कुछ और विस्तार पा गया मेरा आकाश

तुम्हारे स्पर्श ने

दे दी असीमता मेरी धरा को

 .

तुम्हारा आना

एक इत्तेफाक हो सकता है

लेकिन तुम्हारा होना

अब मेरी आवश्यकता है

.

( बृजेश नीरज )

મારો નશો – ફરીઉદ્દીન અત્તર

જે શાંત સૌમ્ય માણસો છે એને મારો નશો કદી નહીં સમજાય

એ લોકો કદી મારા કાર્યને સમજી નહીં શકે

દુનિયાદારીના માણસો તો દેવળમાં જાય છે

તેઓ કદી સમજી નહીં શકે

નશાબાજ માણસના હૃદયની ગમગીની

જે લોકો ગૌરવ અને અહંકાર પહેરીને ફરે છે એ લોકો કદીયે

મારા રહસ્યના પડદાની પાછળ જોઈ નહીં શકે

જે લોકો કદી પોતાના પ્રિયતમથી વિખૂટા નથી થયા

એ લોકો કદીયે નહીં સમજી શકે મારા પ્રિયતમ વિનાની રાત્રિને

હું તો મારા ઘરમાં બંદીવાન મારા પ્રિયતમ વિના

ઘરમાં એટલા માટે કે બહારના માણસો મારી વેદના ન જોઈ શકે

બુલબુલની બેચેની, કળીના ઝુરાપાને

કેવળ બગીચાનું ફૂલ જ સમજી શકે

જે લોકો કદીયે પ્રેમની યાતનામાં પડ્યા નથી

તેઓ કદીયે ‘અત્તર’ની વ્યથાને ઓળખી ન શકે.

 .

( ફરીઉદ્દીન અત્તર, અનુ. સુરેશ દલાલ )

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મૂળ : પર્શિયન

પ્રભુના મહિમાના સ્વીકારની પ્રાર્થના – ઇયાન્લા વાન્ઝાન્ટ

વહાલા પ્રભુ,

હું સ્વીકારું છું તમે ઉદાત્ત છો, તમે અદ્દભુત છો, આશ્ચર્ય અને વિસ્મયથી ભરેલા છો.

પ્રભુ, તમે મને દરેક જગ્યાએ મદદ અને સંરક્ષણ આપવા હંમેશ તત્પર હો છો.

દરેક પરિસ્થિતિમાં તમે કેટલા શક્તિશાળી અને સામર્થ્યવાન છો એનો મને પૂરેપૂરો પરિચય થાય છે.

તમે ચતુર, કુનેહબાજ છો. તમે સ્વસ્થ મધ્યસ્થી છો, તમે કાબેલ અને નિપુણ છો, એ હું બરાબર જાણું છું.

પ્રભુ, હું પૂર્ણપણે સ્વીકારું છું કે તમે મને દરેક સંજોગોમાં માર્ગ સુઝાડો છો અને પ્રતિકૂળ પરિસ્થિતિથી દૂર રાખો છો.

હું તમારા પ્રેમથી ગદ્દગદ છું.

હું તમારા જ્ઞાન અને શાણપણને વંદન કરું છું.

હું તમારી કરુણાથી ભાવવિભોર બનું છું.

અને તમારી કૃપાથી હું ભીંજાઉં છું.

તમે મારી દરેક સમસ્યાનું નિરાકરણ આપો છો.

મારા દરેક પ્રશ્નનો ઉત્તર તમે જ છો.

જ્યારે હું તોફાનમાં સપડાઉં છું ત્યારે તમે મને શાંતિ આપો છો.

પ્રભુ, મારા હૃદયમાં અને મનમાં હું તમારી સંનિધિનો, તમારી શક્તિનો અનુભવ કરું છું.

તમારી અદ્દભુત શક્તિ અને સામર્થ્યને કારણે હું ખૂબ જ બહાદુરીથી, હિંમતથી અને સ્વસ્થતાથી અડગ રહી શકું છું.

મારા જીવન અને અંતરાત્મામાં બધું જ સરળ અનુભવું છું.

એમ જ હોવું જોઈએ અને એમ જ છે.

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( ઇયાન્લા વાન્ઝાન્ટ, અનુ. આશા દલાલ )

खेल – ईमरोज

रंगो के साथ खेल

हो रहा था

कि तू आ गयी

अपने रंगो मिला कर खेलने…

 .

खयालों के खाके

तस्वीरें बनने लग गये

और जिन्दगी अपने आप कविता

और कविता अपने आप

जिन्दगी हो कर

खयालों के साथ

आ मिली…

 .

( ईमरोज )

तराश ही तराश – ईमरोज

प्यार के रिश्ते

बने बनाए नहीं मिलते

जैसे माहिर बुत तराश को

पहली नजर में ही अनगढ पत्थर में से

संभावना दिख जाती है-मास्टर पीस की

मास्टर पीस बनाने के लिए

बाकी रह जाती है सिर्फ तराश तराश तराश

 .

उसी तरह

दो इन्सानों को भी पहली नजर में

एक दूसरे में संभावना दिख जाती है-

प्यार की-जीने योग्य रिश्ते की

बाकी रह जाती है-तराश तराश तराश-

बोलते सुनते भी

खामोशी में भी

और एक दूसरे को देखते हुए भी

और न देखते हुए भी

 .

बुततराश की तराश तो

एक जगह पर आकर खत्म हो जाती है

जब उसका मास्टर पीस मुकम्मल हो जाता है

जैसे प्यार के रिश्ते की

तराश भी खत्म होती नहीं

सिर्फ उम्र खत्म होती है…

 .

ये जिन्दगी का रिश्ता दिलकश रिश्ता

एक रहस्यमय रिश्ता

ना ये रिश्ता खत्म होता है

और ना ही इसकी तराश तराश…

 .

( ईमरोज )

संपूर्ण औरत – ईमरोज

चलते चलते एक दिन

पूछा था अमृता ने-

तुमने कभी वुमैन विद माईंड (woman with mind)

पेंट की है ?

चलते चलते मैं रुक गया

अपने भीतर देखा अपने बाहर देखा

जवाब कहीं नहीं था

चारों ओर देखा-

हर दिशा की और देखा और किया इंतजार

पर न कोई आवाज आई, न कहीं से प्रतिउत्तर

जवाब तलाशते तलाशते

चल पडा और पहुंच गया-

पेटिंग के क्लासिक काल में

अमृता के सवाल वाली औरत

औरत के अंदर की सोच

सोच के रंग

न किसी पेटिंग के रंगो में दिखे

न किसी आर्ट ग्रंथ में मुझे नजर आए

उस औरत का, उसकी सोच का जिक्र तलाशा

हां

हैरानी हुई देख कर

किसी चित्रकार ने औरत को जिस्म से अधिक

न सोचा लगता था, न पेंट किया था

संपूर्ण औरत जिस्म से कहीं बढकर होती है

सोया जा सकता है औरत के जिस्म के साथ

पर सिर्फ जिस्म के साथ जागा नहीं जा सकता

अगर कभी चित्रकारों ने पूर्ण औरत के साथ जागकर

देख लिया होता

और की और हो गई होती चित्रकला-अब तलक

माडर्न आर्ट में तो कुछ भी साबुत नहीं रहा-

न औरत, न मर्द और न ही कोई सोच…

गर कभी मर्द ने भी औरत के साथ जाग कर देख लिया होता,

बदल गई होती जिन्दगी हो गई होती जीने योग्य-जिन्दगी

उसकी और उसकी पीढी की भी…

 .

( ईमरोज )

उस पार – बृजेश नीरज

सोचता हूँ

क्या होगा

नीले आकाश के पार

 .

कुछ होगा भी

या होगा शून्य

.

शून्य

मन जैसा खाली

जीवन सा खोखला

आँखों सा सूना

या

रात जैसा स्याह

 .

कैसा होगा सब कुछ

होगी गौरैया वहाँ ?

देह पर रेगेंगी चींटियाँ ?

 .

या होगा सब

इस पेड की तरह

निर्जन और उदास;

सागर में बूँद जितना

अकल्पनीय

जाए बिन

जाना कैसे जाए

और जाने को चाहिए

पंख

पर पंख मेरे पास तो नहीं

.

चलो पंछी से पूछ आएँ-

गरुड से

 .

ढूँढते हैं गरुड को

 .

( बृजेश नीरज )

याद के बादल – आशा पाण्डेय ओझा

फिर घिर आये

याद के बादल

फिर हरिया उठा

पीड का पलाश

फिर झरी

मन की छत पर

गीली-चाँदनी ख्वाबों की

हल्की-हल्की बयार ने

फिर खोली आज

चाहत के दिनों से

जोडी हुई

सुरभिमय अहसास की

वो रंग-बिरंगी शीशियाँ

जो दबा रखी है

मन की तहों के नीचे

सबसे छुपकर मैंने

और शायद

तुमने भी

 .

( आशा पाण्डेय ओझा )

अपने अंतर में ढालो ! – राहुल देव

मेरे अंतर को

अपने अंतर में ढालो

हे इतिवृत्तहीन

अकल्मष !

मेरे अंतस के दोषों में

श्रम प्रसूति स्पर्धा दो

बनूँ मैं पूर्ण इकाई जीवन की

गूंजे तेरा निनाद उर में हर क्षण

विश्वनुराक्त !

तम दूर करो इस मन का

अंतर्पथ कंटक शून्य करो

हरो विषाद दो आह्लाद

मैं बलाक्रांत, भ्रांत, जडमति

विमुक्ति, नव्यता, ओज मिले

परिणीत करो मेरा तन-मन

मैं नित-नत पद प्रणत

नि:स्व

तुम्हारी शरणागत !

 .

( राहुल देव )

गजल कहनी पडेगी – ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र

गजल कहनी पडेगी झुग्गियों पर कारखानों पर

ये फन वरना मिलेगा जल्द रद्दी की दुकानों पर

 .

कलन कहता रहा संभावना सब पर बराबर है,

हमेशा बिजलियाँ गिरती रहीं कच्चे मकानों पर

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लडाकू जेट उडाये खूब हमने रात दिन लेकिन

कभी पहरा लगा पाये न गिद्धों की उडानों पर

 .

सभी का हक है जंगल पे कहा खरगोश ने जबसे

तभी से शेर, चीते, लोमडी बैठे मचानों पर

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कहा सबने बनेगा एक दिन ये देश नंबर वन

नतीजा देखकर मुझको हँसी आई रुझानों पर

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( ‘सज्जन’ धर्मेन्द्र )