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सूनी सी ज़िन्दगी रही

बैठे-बिठाए आँसुओं का दरिया बहा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
झोंका जो नींद का कभी, आता तो ख़ाब देखते
दिल के मलाल का भी हम, तुझसे सवाल पूछते
बैठे-बिठाए बेबसी का, झोंका जगा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
जाने कहाँ तू खो गया, इतने बड़े जहान में
हमको शिक़स्त दे गया,दिल के ही इम्तहान में
बैठे-बिठाए आँसुओं का तमग़ा दिला गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
यूँ कमनसीब हम न थे, यूँ बदनसीब हम न थे
इतनी तादात में कभी, हासिल तो रंज-ओ-ग़म न थे
बैठे-बिठाए बेरुख़ी का, आलम सजा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
ऐसा न हो कि हम यूँ ही, दिल से ही हार मान लें
परवरदिगार से कभी अपनी ही मौत माँग लें
बैठे -बिठाए फ़ासलों को यूँ ही बढ़ा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
बैठे-बिठाए आँसुओं का दरिया बहा गया है तू
सूनी सी ज़िन्दगी रही, तनहा बना गया है तू
 ( निर्मला त्रिवेदी )
दरिया- सागर, समुद्र, बड़ी नदी
मलाल- दुःख, अफ़सोस
शिक़स्त- मात, हराना
गमज़दी  – उदासी
तमग़ा- मैडल,
बेरुख़ी- चिढ, नाराज़गी, ख़ीज दिखाना
परवरदीगार – अल्ला, ईश्वर
फ़ासलों को- दूरियों को

आहुति-उमा त्रिलोक

नहीं किसी ने खुशी में थाली पीटी
गली में नहीं बांटा गुड़
जब दाई ने कहा
” लक्ष्मी अाई है”

किसी ने नहीं दुलारा पुचकारा
मै होती रही बड़ी,
यूं ही,
रोती बिलखती किलकारती

शब्द सुना जो पहली बार
दादी ने कहा, ” कर्म जली ”
नहीं समझा जिसे,
लेकिन
थाली छीन ली जब यह कहकर,
” मत खा इतना, जल्दी बड़ी हो जाएगी ”
तो, मैं रो दी

मेंने सुना
बस चीखना मां का
” उठ, झाड़ू बुहारी सीख
चूल्हा चौका संभाल, तुझे जाना है अगले घर ”

छह साल की थी,
जब
मुन्ने को पकड़ा देती,
कहती,
” बर्तन मल कर रखना, कपड़े
सूखा देना
आती हूं मैं काम से घंटे भर में ”

न देखा बचपन मेंने
न देखी जवानी,
लेकिन
फिर भी
बड़ी हो गई

एक दिन खेत में पकड़ ली बांह
पिछवाड़े के कल्लू ने
खूब हुअा हंगामा
बहुत मचा शोर
गाव में
मारा पीटा दुत्कारा
फिर मैं
ब्याह दी
जल्दी में

सजा मिली
मुझे उस गुनाह की
जो मेंने किया ही नहीं

अब
हर बार सास बोल देती
मेरे उसको

” पेट में लड़की हुई तो गिरा देना
हमें तो बस पोता चाहिए ”

हुआ कई बार ऐसे ही

फिर तू अा गई
डाक्टरनी की भूल से

सुन
अगर तेरे जीवन में कुछ ऐसा हो
जो तुम्हे ना भाए
तो
तुम करना विरोध
दहाड़ना, दिखाना प्रतिरोध
जूझना
मत मानना

तुम बदल देना
रुख समय की धार का
सुने ना कोई
गर तेरी बात
तुम चीखना ज़ोर से
जो टकराए जाकर क्षितिज से
चीर दे जो सीना गगन का
तुम
लड़ना,झगड़ना
और
घसीट लाना समय को
परिवर्तन की ओर
चाहे खो जाए
तेरा सर्वस्व ही
क्यों कि
परिवर्तन मांगता है
आहुति

हां
आहुति

( उमा त्रिलोक )

खिड़कियाँ खोलो-कुँअर बेचैन

दिलों की साँकलें और ज़हन की ये कुंडियाँ खोलो
बड़ी भारी घुटन है घर की सारी खिड़कियाँ खोलो
कसी मुट्ठी को लेकर आये हो,  गुस्से में हो शायद
मिलाना है   जो हमसे हाथ तो ये मुट्ठियाँ    खोलो
नचाने को हमें   जो उँगलियों में   बाँध रक्खी   हैं
न कठपुतली बनेंगे हम, सुनो, ये  डोरियाँ   खोलो
तुम्हारे घर की रौनक   ने जो   बाँधी  हैं अँगोछे में
चलो, बैठो, पसीना पोंछो, और ये रोटियाँ   खोलो
तुम्हारे दोस्त ही    बैठे हैं  हाथों  में नमक   लेकर
किसी से कह न देना घाव  की ये पट्टियाँ   खोलो
तुम्हारे हर तरफ़ थी आग और तुम फूस के घर थे
तो फिर किसने कहा अंधे कुओं की आँधियाँ खोलो
किसी भी ज़ुल्म के आगे रहोगे मौन यूँ  कब तक
ज़ुबाँ जो बाँध रक्खी है उसे अब तो  मियाँ, खोलो
तुम्हारे ही सरों पर गर ये बारिश में  रहीं तो  क्या
मज़ा तो तब है जब औरों की ख़ातिर छतरियाँ खोलो
सुनो, ये खुदकशी भी बुज़दिली है, खुद को समझाकर
तुम अपने हाथ से अपने गले  की   रस्सियां  खोलो
अजब उलझन में हूँ उसने लिफ़ाफ़े पर लिखा है ये
कसम है ऐ कुँअर, जो तुम ये मेरी चिट्ठियाँ  खोलो
 ( कुँअर बेचैन )

भिक्षा पात्र-उमा त्रिलोक

अचानक
उस ने  सुना
” भिक्षा देहि, भिक्षा देहि “
पहचान लिया
उसने वह स्वर
मुठ्ठी भर अन्न के लिए
उसने पुकारा था
किसी अन्नपूर्णा को
वह सहमी खड़ी रही
सोचती, कि
इस घर में तो उसका
कुछ भी नहीं
एक दाना अन्न भी नहीं
यही बताने
वह  पहुंची द्वार पर
मगर
नहीं देख पाई हीर
अपने रांझा को
पड़ा था
केवल
देहरी पर
एक
भिक्षा पात्र
जिसे
भर दिया उसने
अपने व्हिविल
स्वप्न से
( उमा त्रिलोक )

कुछ कविताएँ-नायिरा वहीद

१)
मैने तुम्हें प्यार किया
क्योंकि
यह
ख़ुद को प्यार करने से ज़्यादा
आसान था
२)
‘नही’
वह शब्द है
जो उन्हें गुस्से में भर देगा
और तुम्हें
आज़ादी देगा
३)
उदासी का
उसी तरह इन्तज़ार करो
जैसे तुम
इन्तज़ार करते हो बारिश का
दोनों ही
चमकाते हैं हमें
४)
तुम्हारा
मुझे न चाहना
मेरे लिए
ख़ुद को चाहने की शुरुआत थी
तुम्हारा शुक्रिया !
५)
मुझे
हर महीने
रक्तस्राव होता है
मैं तब भी नही मरती
मैं कैसे मान लूँ कि
मैं कोई जादू नही ?
६)
मैं
इस बात को तवज्जो नही देती
कि दुनिया ख़त्म हो रही है
मेरे लिए तो यह
कई बार
ख़त्म हुई
और अगली सुबह
शुरू भी हुई
कई बार
७)
मुझे ख़ुद से प्यार है
और यह
अब तक की
सबसे शान्त
सबसे सरल
सबसे ताक़तवर
क्रान्ति थी
८)
बेशक तुम्हें कोई चाहता होगा
पर इसका मतलब यह नही
कि वे तुम्हारी कदर भी करते होंगे
इसे एक बार फिर पढ़ें
और इन शब्दों को अपने दिमाग में गूँजने दें
 –
९)
ये कैसी
चौंका देने वाली कैमिस्ट्री है
कि आप मेरी बाँह छूते हैं
और लपटें
मेरे दिमाग में उठने लगती हैं
१०)
इच्छा
एक ऐसी शय है
जो तुम्हें खा जाती है
वहीँ तुम्हें
भूखा भी छोड़ जाती है
 –
११)
यह
अपने दर्द के बारे में
ईमानदार होना ही है
जो मुझे अजेय बनाता है
 –
१२)
उन पर
कभी भरोसा मत करना
जो कहते हैं
कि उन्हें रंग नज़र नही आते
इसका मतलब है
कि उनके लिए
तुम अदृश्य हो
१३)
अगर कोई मुझे चाहेगा नही
तो दुनिया ख़त्म नही हो जाएगी
पर अगर मैं ख़ुद को नही चाहूँगी
तो दुनिया ज़रूर ख़त्म हो जाएगी
 –
१४)
“फूल का काम
आसान नहीं
लपटों के बीच
नरम बने रहने में
वक़्त लगता है ।”
 –
१५)
मेरे पास
प्रेम के लिए
सात अलग-अलग लफ्ज़ थे
तुम्हारे पास
सिर्फ़ एक
मेरी बात में वज़न है
मानोगे!?
( नायिरा वहीद, अनुवाद :  नीता पोरवाल )

कहीं न जाए खो-उमा त्रिलोक

देखना कहीं न जाए, खो

गरीब की रोज़ी का प्रावधान
नन्ही बच्ची की मुस्कान

लाचार हृदय में बस्ती आस
मन का प्रमोद और उल्लास

लावण्य जीवन का, उगती प्यास
सपनों से भरा भरा उजास

मां की ममता का विश्वास
वृद्धा के आशीष का न्यास

देखना कहीं न जाए खो

अन्न धन न दे पाओ जो
दे देना तुम
आदर अवसर
साहस आभार
दिला देना सुविधा और न्याय
रह न जाए कोई बिना उपाय

दे आना तुम सांत्वना उनको
भर झोली सद्भावना उनको
यह भी न कर पायो जो
रख लेना तुम दुआओं में उनको
रख लेना तुम दुआओं में उनको

( उमा त्रिलोक )

वज़ूद-अल्पा जोषी

क्या आप जानते हैं! ऐसी कोई स्त्री को
जो आपका जूठ पकड़ लेती हो
फिर भी अनजान सी रहती हो
क्या आप जानते हैं !ऐसी कोई स्त्री को
जो पहले से ही जवाब जानती हो
फिर भी आप से सवालात करती हो
क्या आप जानते हैं !ऐसी कोई स्त्री को
जो आपके खोखले दुलार को महसूस करती हो
फिर भी आप से प्यार करती हो
क्या आप जानते हैं !ऐसी कोई स्त्री को
जो आपकी गलतिया अपने आप से ही छिपाती हो
आपकी गलतियों पर नासमझी का पर्दा डाल देती हो
क्या आप जानते हैं ऐसी कोई स्त्री को
जो आपका इंतजार करती हो
आपको चाहती हो
बल्कि जानती ही हो की आपका वक्त उसका नही है
शायद आप ऐसी स्त्री को जानते ही होंगे।
पर,आप ऐसी स्त्री को नही जानते,
जिसके मन से आप उतर गऐ हो
फिर भी वह रिश्ता निभाती जाती हो
आप ऐसी स्त्री को नही जानते
जो खुद बिखरी हो ,पर फिर भी बंधी हो
आप ऐसी स्त्री को नही जानते
जो ख्वाहिशो को पानी की धारा में धो देती हो
क्या आप जानते हैं ऐसी कोई स्त्री को
जो खुद के लिए जीती हो
जिसका वक्त्त सिर्फ और सिर्फ उसका ही हो
जिसे किसी से सवालात न करने पड़े
जिसे किसी को जवाब न देने पड़े
जिसे अपना वज़ूद न ढूढ़ना पड़े
( अल्पा जोषी )

मैं स्त्री हूं-उमा त्रिलोक

दहेज में मिला है मुझे
एक बड़ा संदूक हिदायतों का
आसमानी साड़ी में लिपटा हुआ संतोष
सतरंगी ओढ़नी में बंधी सहनशीलता
गांठ में बांध दिया था मां ने
आशीष,
“अपने घर बसना और….
विदा होना वहीं से ”

फिर चलते चलते रोक कर कहा था
“सुनो,
किसी महत्वाकांक्षा को मत पालना
जो मिले स्वीकारना
जो ना मिले
उसे अपनी नियति मान लेना
बस चुप रहना
सेवा और बलिदान को ही धर्म जानना ”
और
कहा था

“तेरी श्रृंगार पिटारी में
सुर्खी की जगह
लाल कपड़े में बांध कर मैंने
रख दिया है
” मीठा बोल ”
बस उसे ही श्रृंगार मानना
और
चुप रहना

मां ने इतना कुछ दिया
मगर भूल गई देना मुझे
अन्याय से लडने का मंत्र
और
मैं भी पूछना भूल गई
कि
यदि सीता की तरह, वह मेरा
परित्याग कर दे
तो भी क्या मैं चुप रहूं
और यदि द्रौपदी की तरह
बेइज्जत की जाऊं
क्या, तो भी

क्या,
दे दूं उसे हक
कि
वह मुझे उपभोक्ता वस्तु समझे
लतादे मारे, प्रताड़े

क्या
उसके छल कपट को अनदेखा कर दूं
समझौता कर लूं
उस की व्यभिचारिता से
पायदान की तरह पड़ी रहूं
सहती सब कुछ
फिर भी ना बोलूं
अन्याय के आगे
झुक जायूं

मां
अगर ऐसा करूंगी तो फिर किस
स्वाभिमान से
अपने बच्चों को
बुरे भले की पहचान करवाऊंगी
किस मुंह से उन्हें
यातना और अन्याय के आगे
न झुकने का पाठ पढ़ाऊंगी

मां
“मुझे अपनी अस्मिता की
रक्षा करनी है”

“सदियों से
स्त्री का छीना गया है हक
कभी उसके होने का हक
कभी उसके जीने का हक
बस अब और नहीं”

अब तो उसने
विवशता के बंधनों से जूझते जूझते
गाड़ दिए हैं
अनेकों झंडे
लहरा दिए हैं
सफलताओं के कई परचम

मां
अब तो कहो मुझ से
कि कोशिश करूं मैं
सृष्टि का यह विधान

क्यों कि नहीं जीना है मुझे
इस हारी सोच की व्यथा के साथ
“मुझे जीना है
हंस ध्वनि सा
गुनगुनाता जीवन
गीत सा लहराता जीवन”

मैं स्त्री हूं

 

( उमा त्रिलोक )

लॉक डॉउन में-उमा त्रिलोक

अब रोज सुबह पांच बजे
नहीं होती भागम भाग
बच्चे मीठी नीद सोते है
उन्हें जगा कर अप्राधिन्न नहीं बनती

खिड़की से देख लेती हूं
रात को धीरे धीरे भोर बनते
और सूरज को विलंबित गति से उगते
चिड़ियों के संग संग गुनगुना भी लेती हूं

वैसे तो रोज़
ऐसा वैसा ही जल्दी में पका कर
ठूंस देती थी
उनके टिफिन बक्सों में
लेकिन अब
सोच समझ कर
पकवान बनाती हूं
उनकी पसंद के
जगाती हूं फिर प्यार से
और रिझा रिझा कर खिलाती हूं
हंस बोल भी लेती हूं
उनके संग
उनकी चुटकेबाजियों पर

अब नहीं पूछती उस से
पहले की तरह

” कैसे हो, दिन कैसे गया”
और रख दिया करती थी
उसके आगे , गरम चाय का प्याला
और बिना उसका जवाब सुने ही
भागते दौड़ते जुट जाती थी
रात का खाना बनाने में
बच्चों का होमवर्क करवाने में

लेकिन अब

दिन में कई कई बार
लेकर हाथों में उसका हाथ
पूछती हूं

“कैसे हो….
कहती हूं
” चिंता मत करना
सब ठीक हो जाएगा
कुदरत जानती है
कैसे रखना है उसने हमारा ख्याल”

जगाती हूं
संभालती हूं , संजोती हूं
एक विश्वास
कि सब ठीक हो जाएगा

इस लॉक डॉउन के बाद
मालूम नहीं भविष्य का क्या होगा
लेकिन लगता है
कुछ भी पहला सा नहीं रहेगा
सब तौर तरीके बदल जाएंगे
नए केद्र बिंदु उभरेंगे
जैसे हवा, नदियां, आसमान
बदले बदले से दिखाई देते हैं
वैसे ही
जीवन, नए जीवन की सुध लेगा

अब सब काम लौंग डिस्टेंस
ओनलाइन ही होगा
अगर रहेंगे
तो,
वो नहीं रहेंगे
जो चूहों की दौड़ में भाग रहे थे
यह जाने बिना
कि कहां जा रहें हैं

( उमा त्रिलोक )

प्रेम को-नरेश गुर्जर

१)
प्रेम को
उसी तरह आना चाहिए
जैसे नींद आती है
नवजात बच्चे को।
२)
प्रेम को
उतनी ही देर ठहरना चाहिए
जितनी देर ठहरती है
तितली फूल पर।
३)
प्रेम को
उसी तरह लौटना चाहिए
जैसे लौटती है आवाज
कहीं से टकरा कर।
( नरेश गुर्जर ‘नील’ )