लम्हें लम्हें पर-चिनु मोदी

लम्हें लम्हें पर तुम्हारा नाम था
मैं सफर में इस तरह बदनाम था

जूस्तजू थी, जूस्तजू थी, जूस्तजू,
तैरती मछली का अब भी काम था

मौत को आवाज दे कर भी बुला,
अब शिकस्ता जिन्दगी का जाम था

बंद दरवाजे पर दस्तक रात-दिन
साँस का यह आखरी पैगाम था

मैंकदे मैं बैठकर पीते रहे
इस तरह ‘इर्शाद’ भी खैयाम था

( चिनु मोदी )

दो कविता-चिनु मोदी

(१)
पुराना सा हो गया है
यह मकान-
अब पहेले सी शान नहीं-
बीच बीच में
बत्तियां गुल हो जाती है
टूटी खिडकीयों से
बारिश अंदर आ जाती है
परछांईसे भी दीवार
बैठ जाने का डर लगता है
यह मकान दुरस्त नहीं हो सकता,
मालिक !
ईसे जमीनदोस्त करने का हुकम दो
वर्ना यह अपनेआप
कभी भी बैठ जायेगा
और मैं
निंद निंद में
दब जाउंगा !

(२)
सांस में सन्नाटा सा
महेसूस किया है ?
बारुद के ढेर पर बैठे
परींदो को
गाता सूना है ?
कभी ईधर
कभी उधर
आवारा हवा को देख कर
तुम याद आती हो
तो
सांस फूलती है
बारुद फटता है
और
परींदा-

( चिनु मोदी )

तोड देती है-खलील धनतेजवी

तोड देती है मशक्कत, काम के अंजाम तक,
बोल उठती है बदन की हड्डीयां भी शाम तक !

ऐ हवा, मेरे चिरागों से अदब से बात कर,
अब भी शरमिन्दा है मुजसे गर्दिशे-ऐयाम तक.

चल बता साकी वो तेरे मयकदे का क्या हुआ ?
क्यूं नजर आते नहीं हैं टूटेफूटे जाम तक !

गूंज उठती हैं फिझाऐं उन के लब हिलने पे भी,
और मेरा बे असर साबित हुआ कोहराम तक !

हम खलील अब तक सलामत हैं, गनीमत है यही,
बात छोटी सी चली जाती है कत्ले-आम तक !

( खलील धनतेजवी )

चार दीवारों में-खलील धनतेजवी

चार दीवारों में रेह कर तुमने घर देखे नहीं,
मैंने अपने घर में छत, दीवारो-दर देखे नहीं.

यूं दरख्तों पर नजर पडते ही पागल हो गई,
जैसे आंधीने भी पहेले शजर देखे नहीं.

क्यूं सुनाते हो उन्हें केहरे-कफस की दास्तां,
जिन परिन्दोने अभी तो बालो-पर देखे नहीं.

उम्रभर का साथ तो अब सोचना भी है फुजुल,
ख्वाब जैसे ख्बाब भी अब रात भर देखे नहीं.

एक मोहलत बस, कि दिल से गुफ्तगू कर लूं जरा,
तुम खलील उन से कहो, दो पल ईधर देखे नहीं.

( खलील धनतेजवी )

[ दरख्तों-વૃક્ષો, शजर-વૃક્ષ, केहरे-कफस की-પિંજરની યાતના, बालो-पर-પીંછા-પાંખ ]

लाख मिल जाऐंगे-खलील धनतेजवी

लाख मिल जाऐंगे चहेरे को सजाने वाले,
ढूंढ कर लाईए आईना दिखाने वाले.

फल गिरेंगे तो चले आऐंगे खाने वाले,
हम तो हैं पेड की शाखों को हिलाने वाले.

कुछ तो अच्छों में भी होती है बुराई, माना,
सब से बदतर हैं मगर दिलको दुखाने वाले.

घर तो है, घर का पता भी है, मगर कया कीजे,
घर पे होते ही नहीं घर पे बुलाने वाले.

किसने देखी है खलील ऐसे घरों की हालत,
जेल में होते हैं जिस घर के कमाने वाले !

( खलील धनतेजवी )

मचल जाने दिया होता-खलील धनतेजवी

समन्दर, ऐहले साहिल को मचल जाने दिया होता,
तेरा पानी जरा सा और उछल जाने दिया होता.

राजर जो तुमने कटवाया, हरा हो भी तो सकता था,
फकत पतझड का ये मोसम बदल जाने दिया होता.

जरा मौका तो देना था, मेरे रेहमो-करम वालो,
मुझे खुद ही संभलना था, संभल जाने दिया होता.

तेरे ऐहसान से तो आग के शोले ही बेहतर थे,
मेरा घर जल रहा था, काश जाने दिया होता.

तुम्हें तर्के-तअल्लुक की जरुरत ही न पेश आती,
फकत इजहार करना था, अमल जाने दिया होता.

यहां यूं बेसबब मेरी गिरफतारी नहीं होती,
मुझे करफ्यू से पहले ही निकल जाने दिया होता.

खलील अबतक किसी शोला बदन सांसों की गरमी से,
तेने अंदर के पथ्थर को पिघल जाने दिया होता.

( खलील धनतेजवी )

[ राजर-વૃક્ષ, तअल्लुक-સંબંધ વિચ્છેદ, इजहार-જાહેર ]

तलाश करता है-खलील धनतेजवी

न जाने किस का कबीला तलाश करता है,
फकीर शहेर का नकशा तलाश करता है !

मिटा के रात की तारीकियां ये सूरज भी,
जमीं पे अपना ही साया तलाश करता है !

बना के खन्दकें हर सिम्त अपने हाथों से,
अजीब शख्स है रस्ता तलाश करता है !

मैं जानता हुं, मेरी प्यास पर तरस खा कर,
वो मेरी आंख में दरिया तलाश करता है !

खलील आज वो आईने बेचने वाला,
कूएं में झांक कर चहेरा तलाश करता है !

( खलील धनतेजवी )

[ तारीकियां-અંધકાર, सिम्त-ખાઈઓ, खन्दकें-દિશા ]

मुजे वापस दे दो-खलील धनतेजवी

मेरी नींदो का उजाला मुजे वापस दे दो,
कल जो टूटा है वो सपना मुजे वापस दे दो !

तुम से पाई हुई ईज्जत तुम्हें लौटा दूंगा,
मेरा छीना हुआ रुत्बा मुजे वापस दे दो !

जाओ मत दो मेरी महेनत का सीला भी मुज को !
तुम मेरा खूनपसीना मुजे वापस दे दो !

खुद मेरे गांव के लोगों ने पहेचाना मुजे,
शहेरवालो, मेरा चहेरा मुजे वापस दे दो !

फिर नया चांद पहाडों से उतारुंगा खलील,
मेरे माझी का अंधेरा मुजे वापस दे दो !

( खलील धनतेजवी )

જમરૂખી-જયદેવ શુક્લ

વાડાની દીવાલની
બન્ને બાજુ,
ભર ઉનાળે
જમરૂખી અને ટગરીની છાયા
તૂટેલી સાઈકલને,
પડેલા ભંગારને,
મને
ટાઢક આપે.

બાળપણમાં
કાણાંવાળી જર્જરિત ચાદર
ઓઢતો
એવું ઘણી વાર
છાયા નીચે લાગે.

અગાશીમાં જાઉં ત્યારે
જમરૂખીનાં પાન
માથે, શરીરે અડે…
ને યાદ આવે
દાદીમાનો હાથ.

સફેદમાં સહેજ પીળો નાખ્યો હોય
એવાં જમરૂખીનાં ફૂલો
જોતાં
મોમાં ફુવારા છૂટે.

પતંગિયાં ને મધામખીને
ઊડાઊડ સાથે
મધ ચૂસતાં જોઈ થાય :
જમરૂખની મીઠાશ
લૂંટી લે છે કે શું ?

મને ભાવતા
ન કાચાં, ન પાકાં જમરૂખનાં
સપનાં
કાળી વરસાદી રાતે
જગાડી મૂકે.

ધીમે ધીમે મોટા થતા જમરૂખના
મીઠા ગરને
રોજ મનોમન
ચગળ્યા કરું
છાયા નીચે

ચાર દિવસના પ્રવાસ પછી
બપોરે આવી
જોઉં છું :
વાડામાં
કેવળ અજવાળું અજવાળું…

( જયદેવ શુક્લ )

ઘટના-દિનેશ ડોંગરે ‘નાદાન’

નિહાળ્યું સ્વપ્ન રાતે, પ્રાત:કાળે અંત આવ્યો છે,
અધૂરી એક ઈચ્છાનો અકાળે અંત આવ્યો છે.

શિયાળું પ્હોરમાં ફૂલો ઉપર ઓસબિંદુની-
હતી ઝાકળ સમી ઘટના ઉનાળે અંત આવ્યો છે.

સતત આરંભથી છેવટ સુધી આમ જ ઝઝૂમીને,
પ્રણયના એક કિસ્સાનો વચાળે અંત આવ્યો છે.

મહાભારતની એ ગાથા અને ગૌરવભર્યા પાત્રો,
બધાનો એક પાછળ એક હિમાળે અંત આવ્યો છે.

હટાવી લક્ષ્યથી દ્રષ્ટિ હવે અટવાય છે ‘નાદાન’,
પડ્યો છે કાફલો રસ્તે, ઉચાળે અંત આવ્યો છે.

( દિનેશ ડોંગરે ‘નાદાન’ )