झरोखे में बैठा उदास कबूतर – मुनि रुपचन्द्र

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झरोखे में बैठा उदास कबूतर

भीगी पलकों से

कभी बाहर झाँकता है, कभी भीतर झाँकता है.

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वह देख रहा है

कि भीतर की दुनिया उजाड दी गयी है

अब यह महल खण्डहर है, सुनसान है

और बाहर की दुनिया बस-बस कर भी उजड रही है

क्योंकि नींव खोखली है और आदमी बेजान है

पुराना मकान ढह रहा है, नया बन नहीं रहा है

ईस लिए ईन दो खम्भों के बीच

लटकते हुए तारों पर ही अपनी जिन्दगी बिताने को

वह कभी ईधर झाँकता है, कभी उधर झाँकता है.

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वह सोच रहा है

कि आदमियत वह चीज है

जो उजडे हुए को बसाना जानती है

और जो रास्ता भूलकर भटक गये हैं

उन्हें सीधी-सी पगडण्डी बताना अपना फर्ज मानती है

लेकिन आज जो आदमी है

वह आदमियत नहीं चाहता

खुद तो उजडा हुआ है ही

औरों को बसता हुआ भी देखना नहीं चाहता.

धरती खिसकती जा रही है, आकाश भागा जा रहा है,

वह बेचारा सहारे की टोह में

कभी नीचे झाँकता है, कभी उपर झाँकता है.

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शायद वह अपने नभलोक को छोड कर

आज मन ही मन पछता रहा है

और ईस आदम की डरावनी शक्लें देख कर

अपना घायल शरीर ढीला किये सुस्ता रहा है

पर वह उड नहीं सकता; क्योंकि यह मनुष्य-लोक है

यहाँ वे पाँखे तोड दी जाती है

जो उडने की कोशिश किया करती हैं

और वें आँखें फोड दी जाती हैं

जो ईस घरौंदे की सीमा को लाँघ कर

बढने की कोशिश किया करती हैं

ईस लिए वह लाचार

कभी आँखें मूंद कर झाँकता है, कभी खोल कर झाँकता है.

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( मुनि रुपचन्द्र )

Happy New Year

( १)

वर्ष नव,
हर्ष नव,
जीवन उत्कर्ष नव।

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नव उमंग,
नव तरंग,
जीवन का नव प्रसंग।

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नवल चाह,
नवल राह,
जीवन का नव प्रवाह।

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गीत नवल,
प्रीत नवल,
जीवन की रीति नवल,
जीवन की नीति नवल,
जीवन की जीत नवल!

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( हरिवंशराय बच्चन )

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Source : http://www.kavitakosh.org

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(२ )

नवल वर्ष, तेरा अभिनन्दन हो!
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नवल चेतना, नवल सृजन हो,
मंजुल मंगल परिवर्तन हो,
नवल वर्ष तेरी मधुर छाँव में
पुलकित प्रमुदित जन-जीवन हो!
नवल वर्ष, तेरा अभिनन्दन हो!
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नवल राह हो, नवल चाह हो,
नवल सोच हो, नव उछाह हो,
नवल भावना, नवल कामना
नवल कर्म, नव जागृत मन हो!
नवल वर्ष, तेरा अभिनन्दन हो!
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नव गिरि-कानन, गगन नवल हो,
नवल पवन हो, चमन नवल हो,
मानवता की नवल पौध हो,
और नवल जीवन-दर्शन हो!
नवल वर्ष, तेरा अभिनन्दन हो!

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(राजेश मिश्र )

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Source : http://www.openbooksonline.com

 

मैं तुम्हें फिर मिलूंगी – अमृता प्रितम

मैं तुम्हें फिर मिलूंगी

मैं तुम्हें फिर मिलूंगी

कहां ? किस तरह ? नहीं जानती

शायद तुम्हारे तख्यिल की चिनगारी बनकर

तुम्हारी कैनवस पर उतरूंगी

या शायद तुम्हारी कैनवस पर

रहस्यमय रेखा बनकर

खामोश तुम्हें देखती रहूंगी

 

या शायद सूरज की किरन बनकर

तुम्हारे रंगो में घुलूंगी

या रंगो की बांहो में बैठकर

तुम्हारी कैनवस को लिपटूंगी

पता नहीं कैसे-कहां ?

पर तुम्हें जरुर मिलूंगी

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या शायद एक चश्मा बनी होऊंगी

और जैसे झरनों का पानी उडता है

मैं पानी की बूंदे

तुम्हारे जिस्म पर मलूंगी

और ठंडक-सी बनकर

तुम्हारे सीने के साथ लिपटूंगी…

मैं और कुछ नहीं जानती

पर ईतना जानती हूं

कि वक्त जो भी करेगा

यह जन्म मेरे साथ चलेगा

यह जिस्म जब मिटता है

तब सब-कुछ खत्म हो जाता है

पर चेतना के धागे

कायनाती कणों के होते है

मैं उन कणों को चुनूंगी

धागों को लपेटूंगी

और तुम्हें मैं फिर मिलूंगी…

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( अमृता प्रितम )

बात किस से करे – ‘सागर’ बुरहानपुरी

बात किस से करे के मन भी नहीं

हमजबाँ कोई हमरुखन भी नहीं

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न तो कमरा है और न तनहाई

पहले जैसी वो अंजुमन भी नहीं

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अजनबी लोग अजनबी चहेरे

हम वतन में है बेवतन भी नहीं

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कितनी लाशों को दफन करना है

घर में दो गज कफन भी नहीं

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ले के जाउं कहां उन्हें ‘सागर’

अब तो अकबर के नौ रतन भी नहीं

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 ( ‘सागर’ बुरहानपुरी )

दीवारों-दर से – निदा फाजली

दीवारों-दर से उतर के परछाइंयाँ बोलती हैं

कोई नहीं बोलता जब तन्हाइयाँ बोलती हैं

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परदेस के रास्तों में रुकते कहाँ हैं मुसाफिर

हर पेड कहता है किस्सा, खामोशियाँ बोलती हैं

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मौसम कहाँ मानता है तहजीब की बंदिशों को

जिस्मों से बाहर निकल के अंगडाइयाँ बोलती हैं

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इक बार तो जिन्दगी में मिलती है सबको हुकूमत

कुछ दिन तो हर आईने में, शहजादियाँ बोलती हैं

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सुनने की मुहलत मिले तो आवाज है  पत्थरों में

उजडी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं

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( निदा फाजली )

अंजाम नहीं होता – मीनाकुमारी

आगाज तो होता है अंजाम नहीं होता

जब मेरी कहानी में वह नाम नहीं होता

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जब जुल्फ की कालिख में गुम जाए कोई राही

बदनाम सही लेकिन गुमनाम नहीं होता

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हंस-हंस के जवां दिल के हम क्यों न चुनें टुकडे

हर शख्स की किस्मत में ईनाम नहीं होता

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बहते हुए आंसू ने आंखों से कहा थम कर

जो मय से पिघल जाए वह जाम नहीं होता

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दिन डूबे हैं या डूबी बारात लिए कश्ती

साहिल पे मगर कोई कोहराम नहीं होता

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( मीनाकुमारी )

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[ आगाज = आरम्भ, अंजाम = अंत, मय = मदिरा ]

लगते हैं – राजेश रेड्डी

मिलते ही हमको समझाने लगते हैं

दीवानों को हम दीवाने लगते हैं

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किस पर तीर चलाऊँ किसको छोडूँ मैं

दुश्मन सब जाने-पहेचाने लगते हैं

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दिन भर जो ढोते हैं बोझ खामोशी का

नींदों में अकसर चिल्लाने लगते हैं

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झूठ को फैलने में लगते हैं बस कुछ पल

लेकिन सच को कई जमाने लगते हैं

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हम भी कितने नादाँ हैं, इक वादे पर

कैसे-कैसे ख्वाब सजाने लगते हैं

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तौबा तो करते हैं रोज गुनाहों से

रोज मगर उनको दोहराने लगते हैं

हाल अजब होता है दिल का गुरबत में

सीधे-सादे बोल भी ताने लगते हैं

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( राजेश रेड्डी )

बैरन हुयी बाँसुरी – गुलज़ार

કૃષ્ણવિયોગમાં રાધારાનીજી

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કૃષ્ણ જન્મની વધાઈ તો કાલે આપીશું. પણ તે પહેલા આજે કૃષ્ણ વિરહની ઠુમરી સાંભળીને માણીએ. શાયદ આ વિરહ વેદનાનો સાદ સાંભળીને સાચેસાચ કૃષ્ણ અવતરે….

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[audio:https://heenaparekh.com/wp-content/uploads/2011/08/005-Kanha-Thumri.mp3|titles=005 – Kanha (Thumri)]

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पवन उडावे बतियाँ हो बतियाँ, पवन उडावे बतियाँ

टीपो पे न लिखो चिठिया हो चिठिया, टीपो पे न लिखो चिठिया

चिट्ठियों के संदेसे विदेसे जावेंगे जलेंगी छतियाँ

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कान्हा आ.. बैरन हुयी बाँसुरी

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हो कान्हा आ आ.. तेरे अधर क्यूँ लगी

अंग से लगे तो बोल सुनावे, भाये न मुँहलगी कान्हा

दिन तो कटा, साँझ कटे, कैसे कटे रतियाँ

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पवन उडावे बतियाँ हो बतियाँ, पवन उडावे बतियाँ..

रोको कोई रोको दिन का डोला रोको, कोई डूबे, कोई तो बचावे रे

माथे लिखे मारे, कारे अंधियारे, कोई आवे, कोई तो मिटावे रे

सारे बंद है किवाड़े, कोई आरे है न पारे

मेरे पैरों में पड़ी रसियाँ

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कान्हा आ.. तेरे ही रंग में रँगी

हो कान्हा आ आ… हाए साँझ की छब साँवरी

साँझ समय जब साँझ लिपटावे, लज्जा करे बावरी

कुछ ना कहे अपने आप से आपी करें बतियाँ

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दिन तेरा ले गया सूरज, छोड़ गया आकाश रे

कान्हा कान्हा कान्हा…..

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फिल्म : वीर

संगीत : साज़िद वाज़िद

शब्द    : गुलज़ार

राग     : नंद

स्वर    : रेखा भारद्वाज

कोरस : शरीब तोशी और शबाब साबरी

खो गए – राजेश रेड्डी

डाल से बिछुडे परिन्दे आसमाँ में खो गए

इक हकीकत थे जो कल तक, दास्ताँ में खो गए

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जूस्तजू में जिसकी हम आए थे वो कुछ और था

थे जहाँ कुछ और है हम जिस जहाँ में खो गए

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हसरतें जितनी भी थीं सब आह बन करा उड गई

ख्वाब जितने भी थे सब अश्के-रवाँ में खो गए

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लेके अपनी अपनी किस्मत आए थे गुलशन में गुल

कुछ बहारों में खिले और कुछ खिजाँ में खो गए

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जिन्दगी, हमने सुना था चार दिन का खेल है

चार दिन अपने तो लेकिन ईम्तिहाँ में खो गए

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( राजेश रेड्डी )

जमीं से पहले – राजेश रेड्डी

जमीं से पहले खुले आसमान से पहले

न जाने क्या था यहाँ इस जहान से पहले

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हमें भी रोज ही मरना पडता है मौत आने तक

हमें भी जिन्दगी देनी है जान से पहले

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खयाल आते ही मंजिल से अपनी दूरी का

मैं थक सा जाता हूँ अक्सर थकान से पहले

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जो मेरे दिल में है उसके भी दिल में है, लेकिन

वो चाहता है कहूँ मैं जुबान से पहले

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हमें पता है हमारा जो हश्र होना है

नतीजा जानते हैं इम्तिहान से पहले

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( राजेश रेड्डी )