दस्तक दे कर वापिस आया,
नकली था घर वापिस आया.
.
एक अजुबा हमने देखा,
पानी अकसर वापिस आया.
.
मयखाने में मुल्लाजी थे,
गंगा तट पर वापिस आया.
.
चारो ओर तबाही देखी,
कटा कटा सर वापिस आया.
.
( चिनु मोदी )
दस्तक दे कर वापिस आया,
नकली था घर वापिस आया.
.
एक अजुबा हमने देखा,
पानी अकसर वापिस आया.
.
मयखाने में मुल्लाजी थे,
गंगा तट पर वापिस आया.
.
चारो ओर तबाही देखी,
कटा कटा सर वापिस आया.
.
( चिनु मोदी )
आज फिर उग आई है
खयालों की जमीन पर वो याद
जिस शाम मिले थे
हम तुम पहली बार
और मौसम की
पहली पर तेज बारीश भी तो
हुई थी उसी रोज
चाय की इक छोटी सी थडी में
ढूँढी थी हमने जगह बारिश से बचने को
ठीक वैसे ही
कहीं न कहीं हम बचते रहे
कहने से मन की बात
और चाहते भी रहे इक दूजे को
कितनी पाकीजा होती थी ना तब मुहब्बतें
देह से परे
सिर्फ रुहें मिला करती थी
और मोहताज भी नहीं थी शब्दों की
हाँ पूर्णता कभी मोहताज नहीं होती
ना शब्दों की ना देह की
वो अनछुए अहसास आज भी जीती हूँ
बरसा-बरस बाद
तुम भी जीते होओगे ना
वो लम्हे आज भी
ठीक मेरी ही तरह
हाँ जेते तो होगे जरुर
तुम भी तो ठहरे मेरी ही पीढी के
तब की पीढियाँ नहीं बदला करती थी
रोज-रोज महब्ब्त के नाम पर देह के लिबास
.
( आशा पाण्डेय ओझा )
उगते सूरज से लेकर
डूबती रात तक
बता कोई लम्हा
जो खाली रहा हो
मेरे दिल में कभी
तेरे खयाल से
यह कहाँ का न्याय
मुहब्ब्त का रिश्ता
शुरु तूने किया
निभा रही हूँ मैं
जितनी परेशानी नहीं
तेरे भूल जाने की
आदत से
उतनी परेशान हूँ
जालिम
अपनी याद रहने की
इस आदत से
.
( आशा पाण्डेय ओझा )
अब तक संजोए था
अपना आकाश
और एक धरती
.
लेकिन जाने कहाँ से
तुम आ गए जीवन में
तोडकर सारे मिथक
औए वे झरोखे बंद हो गए
जहाँ से देखता था
आकाश
टूट गए वो पैमाने
जिनसे नापता था धरती
.
तुम्हारे प्रेम में
कुछ और विस्तार पा गया मेरा आकाश
तुम्हारे स्पर्श ने
दे दी असीमता मेरी धरा को
.
तुम्हारा आना
एक इत्तेफाक हो सकता है
लेकिन तुम्हारा होना
अब मेरी आवश्यकता है
.
( बृजेश नीरज )
रंगो के साथ खेल
हो रहा था
कि तू आ गयी
अपने रंगो मिला कर खेलने…
.
खयालों के खाके
तस्वीरें बनने लग गये
और जिन्दगी अपने आप कविता
और कविता अपने आप
जिन्दगी हो कर
खयालों के साथ
आ मिली…
.
( ईमरोज )
प्यार के रिश्ते
बने बनाए नहीं मिलते
जैसे माहिर बुत तराश को
पहली नजर में ही अनगढ पत्थर में से
संभावना दिख जाती है-मास्टर पीस की
मास्टर पीस बनाने के लिए
बाकी रह जाती है सिर्फ तराश तराश तराश
.
उसी तरह
दो इन्सानों को भी पहली नजर में
एक दूसरे में संभावना दिख जाती है-
प्यार की-जीने योग्य रिश्ते की
बाकी रह जाती है-तराश तराश तराश-
बोलते सुनते भी
खामोशी में भी
और एक दूसरे को देखते हुए भी
और न देखते हुए भी
.
बुततराश की तराश तो
एक जगह पर आकर खत्म हो जाती है
जब उसका मास्टर पीस मुकम्मल हो जाता है
जैसे प्यार के रिश्ते की
तराश भी खत्म होती नहीं
सिर्फ उम्र खत्म होती है…
.
ये जिन्दगी का रिश्ता दिलकश रिश्ता
एक रहस्यमय रिश्ता
ना ये रिश्ता खत्म होता है
और ना ही इसकी तराश तराश…
.
( ईमरोज )
चलते चलते एक दिन
पूछा था अमृता ने-
तुमने कभी वुमैन विद माईंड (woman with mind)
पेंट की है ?
चलते चलते मैं रुक गया
अपने भीतर देखा अपने बाहर देखा
जवाब कहीं नहीं था
चारों ओर देखा-
हर दिशा की और देखा और किया इंतजार
पर न कोई आवाज आई, न कहीं से प्रतिउत्तर
जवाब तलाशते तलाशते
चल पडा और पहुंच गया-
पेटिंग के क्लासिक काल में
अमृता के सवाल वाली औरत
औरत के अंदर की सोच
सोच के रंग
न किसी पेटिंग के रंगो में दिखे
न किसी आर्ट ग्रंथ में मुझे नजर आए
उस औरत का, उसकी सोच का जिक्र तलाशा
हां
हैरानी हुई देख कर
किसी चित्रकार ने औरत को जिस्म से अधिक
न सोचा लगता था, न पेंट किया था
संपूर्ण औरत जिस्म से कहीं बढकर होती है
सोया जा सकता है औरत के जिस्म के साथ
पर सिर्फ जिस्म के साथ जागा नहीं जा सकता
अगर कभी चित्रकारों ने पूर्ण औरत के साथ जागकर
देख लिया होता
और की और हो गई होती चित्रकला-अब तलक
माडर्न आर्ट में तो कुछ भी साबुत नहीं रहा-
न औरत, न मर्द और न ही कोई सोच…
गर कभी मर्द ने भी औरत के साथ जाग कर देख लिया होता,
बदल गई होती जिन्दगी हो गई होती जीने योग्य-जिन्दगी
उसकी और उसकी पीढी की भी…
.
( ईमरोज )
सोचता हूँ
क्या होगा
नीले आकाश के पार
.
कुछ होगा भी
या होगा शून्य
.
शून्य
मन जैसा खाली
जीवन सा खोखला
आँखों सा सूना
या
रात जैसा स्याह
.
कैसा होगा सब कुछ
होगी गौरैया वहाँ ?
देह पर रेगेंगी चींटियाँ ?
.
या होगा सब
इस पेड की तरह
निर्जन और उदास;
सागर में बूँद जितना
अकल्पनीय
जाए बिन
जाना कैसे जाए
और जाने को चाहिए
पंख
पर पंख मेरे पास तो नहीं
.
चलो पंछी से पूछ आएँ-
गरुड से
.
ढूँढते हैं गरुड को
.
( बृजेश नीरज )
फिर घिर आये
याद के बादल
फिर हरिया उठा
पीड का पलाश
फिर झरी
मन की छत पर
गीली-चाँदनी ख्वाबों की
हल्की-हल्की बयार ने
फिर खोली आज
चाहत के दिनों से
जोडी हुई
सुरभिमय अहसास की
वो रंग-बिरंगी शीशियाँ
जो दबा रखी है
मन की तहों के नीचे
सबसे छुपकर मैंने
और शायद
तुमने भी
.
( आशा पाण्डेय ओझा )
मेरे अंतर को
अपने अंतर में ढालो
हे इतिवृत्तहीन
अकल्मष !
मेरे अंतस के दोषों में
श्रम प्रसूति स्पर्धा दो
बनूँ मैं पूर्ण इकाई जीवन की
गूंजे तेरा निनाद उर में हर क्षण
विश्वनुराक्त !
तम दूर करो इस मन का
अंतर्पथ कंटक शून्य करो
हरो विषाद दो आह्लाद
मैं बलाक्रांत, भ्रांत, जडमति
विमुक्ति, नव्यता, ओज मिले
परिणीत करो मेरा तन-मन
मैं नित-नत पद प्रणत
नि:स्व
तुम्हारी शरणागत !
.
( राहुल देव )